नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १६३
छल-कपट करने ( अवहित्य ) में की जाए । इसी प्रकार रंगमंच पर
सर्वप्रथम प्रवेश करने, रंगमंच पर पुष्पाञ्जलि बिखेरने, ईर्ष्यायुक्त प्रणय
(दर्शाने) में क्रोध करने तथा तर्जनी के ऐंठने (या मुड़ाव करने) (मोटनम्);
निषेध, गर्व, गम्भीरता, मौन तथा मान ( प्रणय कोप ) धारण करने तथा
क्षितिज ( दिगन्तर ) के अवलोकन में भी इसी स्थान की योजना
की जाए ॥ १६२-१६५ ॥
संमो१ यत्र स्थितो वामस्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ।
संमुन्नतकटिर्वामस्तव्वहित्थन्तु तद्भवेत् ॥ १६५ ॥
अवहित्थ ( स्थान ) - बांयाँ पैर 'सम', दाहिना पैर तिरछा होकर
एक बाजू में रखा हुआ तथा कमर बायीं ओर उठी हुई रखने पर 'अवहित्थ'
स्थान होता है ॥ १६५ ॥
स्त्रीणां३मेतत्स्मृतं स्थानं संल्लापे तु स्वभावजे ।
निश्चये परितोषे च वितर्के लज्जिते तथा ॥ १६६ ॥
विलास४ लीलाबिव्वोक शृङ्गारात्मै५निरूपणे ।
स्थानमेतत्प्रयोक्तव्यं भर्तृ६मार्गावलोकने ॥ १६७ ॥
इस स्थान की योजना स्त्रियों के स्वाभाविक संताप ( पारस्परिक
संभाषण ), निश्चय, अतिहर्ष, वितर्क (या संयोग), लज्जायुक्त होने, विलास,
लीला, बिब्बोक, शृङ्गार तथा इसी सदृश अन्य रसों के प्रदर्शित करने तथा
प्रियतम की बाट जोहने में की जानी चाहिए ॥ १६६-१६७ ॥
पाँदः समुत्थितश्चैक एकश्चाग्रतलाञ्चितः ।
१. समस्थितो वामपादस्त्र्यश्रतान्तरतोऽपरः—क० ।
२. वामोन्नतं त्रिकं यस्मिन्नवहित्थं तु—क० । क० ग०—पुस्तकयोरवहित्थ-
स्थानस्यापरं लक्षणमपि दृश्यते—
पुरो विचलितस्त्र्यश्रस्तदन्योऽपसृतः समः ।
पादस्तालान्तरन्यस्तस्त्रिकमीषत्समुन्नतम् ॥
पाणिर्लताख्यो यत्रैकस्तदन्यस्तु नितम्बगः ।
अवहित्थं समाख्यातं स्थानमागमभूषणैः ॥
३. स्थानमेतत्त नारीणां—क० ।
४. विवाहलीलालावण्ये—ग० विलासलीलालावण्ये--घ० ।
५. शृङ्गारादिनिरूपणे—ग० । ६. तथा मार्गाव—ग० घ० ।
७. एकः समस्थितः पाद एकस्त्वत्र तलाञ्चितः—क० ।