नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १६५
नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यञ्च कटकामुखम् ॥ १७२ ॥
ततः सललितं पादं तालं¹मात्रसमुत्थितम् ।
दक्षिणं वामपादस्य बाह्य²पार्श्वे विनिक्षिपेत् ॥ १७३ ॥
तेनैव सम³कालञ्च लताख्यं वामकं भुजम् ।
दक्षिणं विन⁵मेत्पार्श्वं न्यसेन्नाभितटे ततः ॥ १७४ ॥
नितम्बे दक्षिणङ्कृत्वा हस्तञ्चोद्वेष्ट्य वामकम्⁴ ।
ततो वामपदं दद्याल्लता⁶हस्तञ्च दक्षिणम् ॥ १७५ ॥
लीलयोद्वाहितेनाथ शिरसाँ⁷नुगतेन च ।
किञ्चिन्नतेन गात्रेण⁸ गच्छेत्पञ्चपदीं ततः ॥ १७६ ॥
(युवती स्त्री की गति में क्रमशः स्थान एवं कार्यों को इस प्रकार
प्रदर्शित करते हैं), सर्व प्रथम 'अवहत्थ' स्थान को प्रदर्शित कर बांयी
भुजा (बाएँ हाथ) को नीचे की ओर हाथ वाली रखे और दाहिना हाथ
'कटकामुख' मुद्रा में नाभि पर रखे। फिर दाहिने 'ललित-संचर' पाद को
एक ताल के प्रमाण पर उठाए और उसे बायें पैर के बगल में रखे, फिर
बाएं हाथ को उसी समय 'लता' मुद्रा में नाभि पर रखकर दाहिनी कोख
को झुकावे, फिर दाहिने हाथ को नितम्ब पर तथा बाएँ हाथ को 'उद्वेष्टित'
मुद्रा में करे। फिर बाएं पैर को आगे बढ़ाए और दाहिने हाथ को 'लता'
मुद्रा में रखे (इस प्रकार स्थान तथा क्रियाओं के प्रदर्शनोपरान्त) फिर
शरीर को थोड़ा झुका कर तथा मस्तक को 'उद्वाहित' मुद्रा में रखते
हुए पांच कदम चले ॥ १७२–१७६ ॥
यो⁹ विधिः पुरुषाणान्तु रङ्गपीठपरिक्रमे ।
स एव प्रमदानां वै कर्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः ॥ १७७ ॥
रंग मंच पर पुरुष पात्रों के चलने की जो विधि है वही स्त्रियों के लिए
भी समझना चाहिए ॥ १७७ ॥
षट्कलन्तुं¹⁰ न कर्तव्यं तथाष्टकलमेव च ।
१. तालमात्रं समु—क०। २. बाह्ये पार्श्वे—क०।
३. समतालाख्यं—क०। ४. वामपादकम्—क०।
५. च नयेत् पार्श्व—क; विनयेत्—क० (म०)।
६. लतापादञ्च—क०। ७. शिरसोऽनुगतेन च—ख०; ग०।
८. चाङ्गेन—क०। ९. सार्धः श्लोकः ख०ग०पुस्तकर्योर्नास्ति।
१०. षट्कलं तत्तु कर्तव्यं—क०; षट्कलं न प्रयोक्तव्यं—क० (भ)।