नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ नाट्यशास्त्रम्
पादस्य पातनं तज्ज्ञैः खेदनं११ तद्भवेत् स्त्रियाः ॥ १७८ ॥
स्त्रियों की डग छः या आठ कला के प्रमाण वाली नहीं रखनी चाहिए
क्योंकि ऐसी डग स्त्रियों को थका देती है तथा प्रदर्शन करने में भी बड़ा
आयास करना होता है ॥ १७८ ॥
सयौवनानां नारीणामेवं कार्या गतिर्बुधैः ।
स्थोनीया१ या स्त्रियस्तासां सम्प्रवक्ष्याम्यहं गतिम् ॥ १७९ ॥
युवती स्त्रियों की गति इसी प्रकार की रहनी चाहिए। अब मैं मध्या
( प्रौढ़ा ) स्त्रियों की गति बतलाता हूँ ॥ १७९ ॥
प्रौढ़ास्त्री गति—
कृत्वाऽवहित्थं स्थानन्तु वामं न्यस्य कटीतटे ।
आद्यञ्चारालमुत्तानं कुर्यान्नाभिस्तनान्तरे ॥ १८० ॥
न निषण्णं न च स्तब्धन्न चापि परिवाहितम् ।
कृत्वा गात्रं ततो गच्छेत्तेनैवेहं३ क्रमेण तु ॥ १८१ ॥
ये ‘अवहित्थ’ स्थान को बाएं हाथ को कटि पर तथा दाहिने हाथ
को ‘अराल’ मुद्रा में ऊपर की ओर मुंह करते हुए नाभि तथा स्तनों के
मध्य रखते हुए प्रदर्शित करने के पश्चात् शरीर को ढीला, स्थिर और न
हिलाते डुलाते हुए ( उसी प्रकार ) चलें ॥ १७९-१८१ ॥
दासी ( प्रेष्या ) की गति—
प्रेष्याणामपि कर्तव्या गतिरु४द्भ्रान्तगामिनी ।
किञ्चिदुन्नमितैर्गात्रैराविद्धै५र्भुजविक्रमा ॥ १८२ ॥
स्थानङ्कृ२त्वावहित्थञ्च वामञ्चाधोमुखं भुजम् ।
नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यञ्च खटकामुखम् ॥ १८३ ॥
दासियों की ‘गति’ भ्रान्ति के कारण ऊपर देखते हुए रखी जाए। वे
शरीर को थोड़ा तान कर भुजाओं को घुमाती हुई रहें। ( अर्थात् भुजाओं
को ‘आविद्ध’ दशा में रखें )। ये ‘अवहित्थ स्थान’ को बाएँ हाथ को
नीचे तथा दाहिने हाथ को ‘कटकामुख’ मुद्रा में रखते हुए प्रदर्शित करते
हुए ( उपर्युक्त नियमानुसार ) चलें ॥ १८२-१८३ ॥
११. खेदने—क० ।
१. स्थवीयसीनामेता