नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १६७
नपुंसक गति—
अर्धनारीगतिः कार्या स्त्रीपुंसाभ्यां विमिश्रिता ।
उदात्तललितैर्गात्रैः १पादैर्लीलासमन्वितैः ॥ १८४ ॥
नपुंसक पात्र की गति में पुरुष तथा स्त्री पात्र की मिश्रित 'गति'
रहनी चाहिए। ये शरीर को उदात्त तथा ललित हलचल में रखते हुए
लालित्यपूर्ण डग भरें ॥ १८४ ॥
यो^२ पूर्वमेवाभिहिता ह्युत्तमानाङ्गतिर्मया^३ ।
स्त्रीणां कापुरुषाणाञ्च त^४तोऽर्धार्धन्तु योजयेत् ॥ १८५ ॥
पहिले मैंने उत्तम पुरुष तथा स्त्री पात्रों की गति में जो समय बतलाया
उसका आधा भाग स्त्रियों (दासी आदि स्त्रियों) तथा उसका भी आधा
भाग नपुंसकपात्र की गति के लिए रखा जाए ॥ १८५ ॥
^५मध्यमोत्तमनीचानां नृणां यद्गतिचेष्टितम् ।
स्त्रीणान्तदेव कर्तव्यं ललितैः ^६पदविक्रमैः ॥ १८६ ॥
उत्तम, मध्यम, तथा अधम पुरुष पात्रों की जो 'गति' बतलाई गई
वही गति (उत्तम, मध्यम तथा अधम) स्त्रीपात्र की भी होती है केवल
स्त्री पात्र के डग 'ललितसंचरपाद' स्थिति में रखे जाते हैं ॥ १८६ ॥
बालगति—
बालानामपि कर्तव्या स्वच्छन्दपदविक्रमा।
न त^७स्यां सौष्ठवं कार्यं न ^८प्रमाणं प्रयोक्तृभिः ॥ १८७ ॥
बालकों की गति उनके इच्छानुसार रखी जाए। इसमें न सौष्ठव और
न समय-प्रमाण (तालानुसारिता आदि) रहता है ॥ १८७ ॥
नपुंसक (अथवा स्त्री-पुरुष-लक्षणधारी पात्र) गति—
तृतीया प्रकृतिः कार्या नाग्ना चैव नपुंसका^९।
नरस्वभावमुत्सृज्य स्त्रीगतिं तत्र योजयेत् ॥ १८८ ॥
१. पदैर्लीला—ख० ।
२. या मयाभिहितापूर्वं—क०; या पूर्वमेव विहिता—घ० ।
३. गतिर्बुधाः—क० ( म० )। ४. तदर्धेन तु—क० ।
५. उत्तमाधममध्यानां—क० । ६. गतिविक्रमा—ख; ग० ।
७. तस्याः—ख; ग० । ८ न प्रमाणं तथाविधम्—क० ।
९. नपुंसके—क० ।