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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 668 में से

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पृष्ठ 281

१७० नाट्यशास्त्रम्
स्वस्थ दशा में (विश्रामावस्था में) (स्वस्थे) बैठने पर दोनों पैरों को
वैशाखस्थान में फैलाकर सुन्दरता से रखे, पीठ थोड़ी तनी हुई और दोनों
हाथ ऊपर और पिंडली पर (रखे) रहना चाहिए ॥ १६७ ॥
विचारावस्था में उपवेशन-विधि—
१पादः प्रसारितः किञ्चिदेकश्चैवासनाश्रयः ।
२शिरः पार्श्वानतञ्चैव सचिन्त उपवेशने ॥ १९८ ॥
यदि कोई पुरुष गहरे विचार में बैठा हो तो उसे (स्वस्थ दशा के
स्वरूप में) अपना एक पैर कुछ फैला कर रखना तथा दूसरा पैर किसी
आसन पर टिकाते हुए मस्तक को एक ओर झुका हुआ रखना चाहिए ॥
शोकावस्था में उपवेशन-विधि—
चिबुकोपाश्रितौ३ हस्तौ बाहुशीर्षानतं शिरः ।
सम्प्रणष्टेन्द्रियमना ४भवेच्छोकोपवेशने ॥ १९९ ॥
यदि पुरुष गहरे शोक में हो तो (स्वस्थ दशा के स्वरूप में) अपनी
ठुड्डी को दोनों हाथों पर रखे या उसका मस्तक दोनों भुजाओं के सहारे
टिका रहे तथा मन और इन्द्रियां अपनी दशा को खोये से रहें ॥ १९९ ॥
मूर्च्छा आदि में उपवेशन—
प्रसार्य बाहू शिथिलौ तथा ५चौपाश्रयाश्रितः ।
७मूर्च्छामदभ्रमग्लानिविषादेषूपवेशयेत्६ ॥ २०० ॥

१. एकः प्रसारितः किञ्चित्पादोऽन्यस्त्वासनाश्रितः—क० ।
२. शिरः पार्श्वगतञ्चैव स्थानं मन्दालसं तु तत् ।
चिन्तायाञ्च तदौत्सुक्ये निर्वेदे विरहे तथा ।
विवादादिषु चाधेयं स्थानमेतत् प्रयोक्तृभिः ॥
इति सार्धश्लोकमधिकम् क० पुस्तके ।
३. चिबुकोपाश्रयौ हस्तौ बाहुशीर्षाश्रयं शिरः ।
सम्प्रनष्टेन्द्रियमना विज्ञेयं क्लान्तमासनम् ॥
बलेन निगृहीतस्य रिपुणा खण्डितस्य च ।
शोकग्लानस्य चौत्सुक्ये स्थानमेतद्विनिर्दिशेत् ॥ इति क० पुस्तके पाठः ।
४. शोकोत्सुक्योपवेशने—ग० घ० ।
५. चोपाश्रयाश्रितः—ख०, ग० घ० ।
६. श्रमग्लानिविषादेषु मदे चोपविशेद् बुधः—क० ।
७. क० (भ०) पुस्तके एतस्य स्थाने—