नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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जो नपुंसक पात्र हैं उनमें पुरुष पात्र से विलग कर 'स्त्री' पात्र की
'गति' की योजना करनी चाहिए ॥ १८८ ॥
भूमिका परिवर्तन में पात्रों की गति—
१विपर्ययः प्रयोक्तव्यः पुरुषस्त्रीनपुंसकैः ।
स्वभावमात्मनस्त्यक्त्वा २तद्भावगमनादिह ॥ १८९ ॥
पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक पात्रों ने यदि अपना स्वरूप परिवर्तन कर जिस
वेष को धारण किया हो उसी के अनुरूप तब उन्हें 'गति' का प्रदर्शन
करना चाहिए ॥
३व्याजेन क्रीडया वापि तथा भूयश्च वञ्चनात् ।
स्त्री पुंसः प्रकृतिं कुर्यात् स्त्रीभावं पुरुषोऽपि च ॥ १९० ॥
धैर्यादौदार्येण सत्त्वेन बुद्ध्या तद्वच्च कर्मणा ।
स्त्री पुमांसं त्वभिनयेद् वेषवाक्यविचेष्टितैः ॥ १९१ ॥
पुरुष स्त्री का तथा स्त्री पुरुष का वेष (परिवर्तन) व्याज, क्रीडा तथा
धोखा देने के लिए करें। स्त्री पुरुष का अभिनय करते समय धैर्य, औदार्य,
सत्व, बुद्धि और उपयुक्त वेष, वचन तथा कार्यों का प्रदर्शन करें ॥१९०-१९१॥
स्त्रीवेषभाषितैर्युक्तैः ६प्रेक्षितांप्रेक्षितैस्तथा७।
मृदुसंन्नतगतिश्चैव पुमान् स्त्रीभावमाचरेत् ॥ १९२ ॥
इसी प्रकार पुरुष स्त्री का अभिनय करते समय स्त्री के वेष तथा भाषण,
उसी के अनुसार कभी किसी वस्तु के देखने तथा न देखने की क्रियाओं
द्वारा कोमल तथा मन्द गति का प्रदर्शन करे ॥ १९२ ॥
नीचजाति की स्त्रियों की गति—
जातिहीनाश्च या नार्यः पुलिन्दशबराङ्गनाः ।
याश्चापि तासां कर्तव्या तज्जातिसदृशी गतिः ॥ १९३ ॥
जो नीच कुल में उत्पन्न या पुलिन्द, भील आदि अनार्यजाति की स्त्रियां
हों उनकी अपनी जाति के अनुकूल स्वाभाविक 'गति' रखनी चाहिए ॥
१. विपर्यस्तप्रयोगस्तु पुरुषस्त्रीनपुंसके—क० ।
२. परभावेन योजयेत्—क० ।
३. निजां प्रकृतिमुत्सृज्य क्रीडयावञ्चनेन वा—क० ।
४. सौष्ठवेनाथ सत्वेन—क०; धैर्यादारेण—क० । ५. युक्तं—क० ।
६. प्रेषिताप्रेषितैस्तथा—ख०; ग० । ७. स्मितैः—क० ।
८. मृदु मन्दगति—ख०; ग० ।