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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

१५६ नाट्यशास्त्रम्
खंज ( लँगड़ा ), पंगु ( लूला ) तथा वामन ( बौने ) पात्रों की गति-
त्रिविधौ १ तु गतिः कार्या खञ्जपङ्गु३कवामनैः ।
विकं२लाङ्गप्रयोगेण कुहँ३काभिनयं प्रति ॥ १३१ ॥
एकैः४ खञ्जगतौ नित्यं५ स्तब्धो वै चरणो भवेत् ।
तथा द्वितीयः कार्यस्तु पादोऽग्रतलसञ्चरः ॥ १३२ ॥
स्तब्धेनो६त्थापनं कार्यमङ्गस्य चरणेन तु ।
गमनेनै७ निष्षण्णः स्यादन्येनै चरणेन तु ॥ १३३ ॥
इतरेण निषीदेच्च क्रमेणानेन वै व्रजेत् ।
एषा१० खञ्जगतिः कार्या तलशल्यक्षतेषु च ॥ १३४ ॥
अवयवों की विकलता ( कमी या दोष ) के द्वारा हास्य उत्पन्न करने
के लिए लँगड़े, लूले तथा बौने पात्र की गति तीन प्रकार ( की स्थितियों
वाली ) रखी जाती है । (प्रथम प्रकार की दशा में) लँगड़े पुरुष की गति में
एक पैर स्तब्ध रहता है । (दूसरे प्रकार की स्थिति में) दूसरे पैर को 'अग्रत-
लसंचर' कर उससे डग भरी जाए तथा स्तब्ध पैर पर शरीर का भार रहे ।
(तीसरी बार की स्थिति में) शरीर को उसी के सहारे आगे बढ़ाते हुए दूसरे
पैर से बैठा या चला जाए । लँगड़े पात्र के चलने-बैठने में यही क्रम रखा
जाए । किसी पात्र के पैर तले चोट, कील या काँटा लगने पर भी इसी
गति का प्रदर्शन करना चाहिए ॥ १३१-१३४ ॥
११ पादेनाग्रतलस्थेन १२ गतिः कार्याऽञ्चितेन तु ।
१३ निष्षण्णदेहा पङ्गोस्तु नतजङ्घा तथैव च ॥ १३५ ॥
१ हासे त्वथगतिः कार्या तथा खञ्जनवामने—क० (भ); विविधानुगतिः—क० ।
२. द्विकलाधंप्रयोगेषु—क० । ३. कुहना—क० ।
४. खञ्जे गतिस्तु कर्त्तव्या स्तब्धैकचरणाश्रया—क० ।
५. नित्यः स्तब्धो—क० । ६. नोन्नमनं—क०; नोद्वाहनं—ख ।
७. गमने च निष्षण्णः—क० । ८. विषण्णः—ग० ।
९. दन्यो न चरणेन तु—ग० ।
१०. एष खञ्जप्रयोगेषु तलशल्यक्षते तथा—क० ।
११. पादेनाग्रतलेनाथ—क० । १२. अञ्चितेन व्रजेत्तथा—ग० ।
१३. निष्षण्णदेहा कर्त्तव्या—क० ।