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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 668 में से

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पृष्ठ 260

त्रयोदशोऽध्यायः १४९
(के अभिनय) में पानी की गहराई के अनुसार तैरने की गति रखना
चाहिए। यदि उथला (थोड़ा) जल हो तो कपड़ों को उठाते हुए तथा गहरा
होने पर शरीर को झुकाकर हाथों को हिलाते हुए (जिससे पानी काटने
का भाव या तैरने की क्रिया की अभिव्यक्ति हो) अभिनय करना चाहिए।
(तैरने का अभिनय करते समय हाथों को 'पताक' या सर्पशीर्ष मुद्रा में
रखना चाहिए) ॥ १०१-१०३ ॥
प्रसार्य बाहुमेकैकं मुहुर्वारिविकर्षणैः ॥ १०३ ॥
तिर्यक्प्रसारिता चैव ह्रियमाणा च वारिणा ।
अशोषाङ्गाकुलापूरे¹वदना गतिरिष्यते ॥ १०४ ॥
यदि नदी के बहाव को पार करने का अभिनय करना हो तो हाथों
को फैलाकर बार-बार पानी को काटने, थपथपाने तिरछा होकर हाथों
को फैलाते हुए सम्पूर्ण शरीर को तैरने में लगे हुए और मुँह को पानी भर
जाने के कारण बन्द रखते (या हिलाते हुए—पाठान्तर से अर्थ) हुए
बतलाना चाहिए ॥ १०३-१०४ ॥
नौका-यात्रा में गति—
नौस्थस्यापि प्रयोक्तव्या द्रुतै²श्चूर्णपदैर्गतिः ।
अनेनैव विधानेन कर्तव्यं गतिचेष्टितम् ॥ १०५ ॥
संज्ञामात्रेण कर्त्तव्यान्येतानि विधिपूर्वकम् ।
³कस्मान्मृत इति प्रोक्ते किं मर्तव्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १०६ ॥
अङ्कुशग्रहणाच्चाङ्गं खलीन⁵ग्रहणाद्धयम् ।
प्रग्रह⁴ग्रहणाच्चानमेवमेवापरेष्वपि ॥ १०७ ॥
नौका से यात्रा करने वाले पात्र की गति शीघ्रतापूर्वक डग भरते
हुए (द्रुतैः चूर्णपदैः) बतलाना चाहिए। इसी प्रकार विभिन्न गति तथा
क्रियाओं को प्रदर्शित करना चाहिए। ये सभी कार्य निर्दिष्ट लक्षणानुसार
इंगितों से प्रदर्शित करे। (क्योंकि ये कार्य यथार्थ में तो रहते नहीं केवल
अनुकरण भर रहता है) जैसे किसी पात्र का मरण प्रदर्शित करने पर
अभिनेता नहीं मरता (केवल मरने का अभिनय करता है।) यह
१. कुलाधूतवदना—क०।
२. द्रुतैस्तूर्णैः पदै—क०, गतिश्चूर्णपदैर्गतैः—ग०।
३. तस्मान्मृत—क०, ग०। ४. प्रग्रहग्रहणाद् रथम्—क०।
५. खलीनग्रहणादश्वम्—क०।