नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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लिए) रखना, शरीर को झुका लेना, दाँत और ओठों का फड़काना, ठुड्डी का
धुजाना धीरे-धीरे कार्य करना आदि प्रदर्शित करना चाहिये । इस शीता-
भिनय की दशा में गति अत्यन्त धीमी (स्थित लय में) रखना चाहिए ॥
भयानक-रस गति—
तथा भयानके चैव गतिः कार्या विचक्षणैः ॥ ७० ॥
स्त्रीणां कापुरुषाणाञ्च ये चान्ये सत्ववर्जिताः ।
विस्फारिते चले नेत्रे विधुतञ्च शिरस्तथा ॥ ७१ ॥
भयसंयुक्तया दृष्ट्या पार्श्वयोश्च ³विलोकितैः ।
द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव बद्ध्वा हस्तं कपोतकम् ॥ ७२ ॥
प्रवेपितशरीरश्च शुष्कोष्ठः स्खलितं व्रजेत् ।
एषानुसरणे कार्या तर्जने त्रासने तथा ॥ ७३ ॥
सत्त्वञ्च विकृतं दृष्ट्वा श्रुत्वा च विकृतं रवम् ।
एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या ¹⁰नृणामाक्षिप्तविक्रमा ॥ ७४ ॥
क्वचिदासन्नपतितैर्विकृष्टपतितैः क्वचित् ।
एलकाक्रीडितैः पादैरुपर्युपरि पतितैः ॥ ७५ ॥
एषामेवानुगैर्हस्तैर्गति¹¹ भीतेषु योजयेत् ।
भयानकरस में स्त्री तथा ( उन ) अधम पात्रों की—जो डरपोक या
कमजोर (सत्वहीन) हों—प्रकृति के अनुसार सहज गति रखनी चाहिए ।
भयानक रस की दशा में इनके नेत्र खुले तथा धूजते हुए, मस्तक 'विधुत'
(ना० शा० ८।२२) मुद्रा में तथा भययुक्त दृष्टि में क्रमशः बगलों को देखना
प्रदर्शित करना चाहिए । इसमें गति द्रुत तथा 'चूर्णपद' लक्षण की, हाथों
को 'कपोत' मुद्रा में, शरीर को कम्पित तथा ओठों को सूखते हुए रखे
यह 'धैर्यविभासित' गति है जो भयानक रस में संयोजित की जाती है ।
१. विस्फारितचलन्नेत्रो विधून्वन् स्वशिरस्तथा—क० ।
२ भयाकुलितचित्तत्वात् पार्श्वानि च विलोकयन्—क० ।
३.-विलोकनैः—ग० । ४. पूर्णपदैश्चैव—ख० ।
५. कृत्वा—क० । ६. प्रलेपितशरीरस्तु शुष्कोष्ठश्च स्खलन् व्रजेत्—क० ।
७. एषानुकरणे—ख०, ग० । ८. कलहे—क० ।
९. विकृतं स्वरम्—क०, विकृतस्वरम्—ग० ।
१०. नृणाञ्च क्षिप्तविक्रमा—क०, नृणाञ्चावक्षिप्त—ख०, ग० ।
११. गतिर्भीतेषु—क० ।