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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

त्रयोदशोऽध्यायः १५५
नानाचीरधरश्चैव रथ्यास्वनियतालयः ।
उन्मत्तो भवति ह्येवं¹ तस्यैतां²ङ्कारयेद् गतिम् ॥ १२७ ॥
स्थित्वा नूपुरपादेन दण्डपादं प्रसारयेत् ।
बद्धां³चारीन्तथा चैवङ्कृत्वा स्वस्तिकमेव च ॥ १२८ ॥
अनेन चारीयोगेन परिभ्राम्यं⁴तु मण्डलम् ।
बाह्यं⁵भ्रमरकञ्चैव रङ्गकोणे प्रसारयेत् ॥ १२९ ॥
त्रिकं सु⁶र्वलितङ्कृत्वा लताख्यं हस्तमेव च ।
विपर्ययगतैर्हस्तैः पद्भ्यां⁷ सह गतिर्भवेत् ॥ १३० ॥
उन्मत्त (पागल) पात्र की गति में पैरों को अनियन्त्रित दशा में
(रखते हुए) लोक क्रियाओं के अनुकरण पर अनेक चारी को प्रदर्शित करते
हुए रखना चाहिए। इस पात्र के बाल रूखे तथा बढ़े हुए, तथा शरीर
धूल से सना हुआ होता है। अकारण ही यह बोलने तथा अप्राकृतिक
प्रकार से चिल्लानेवाला होता है। यह कभी गाता और कभी हँसता है।
इसे किसी का साथ नहीं सुहाता । (तथा बार-बार रोता है—पाठान्तर से
अर्थ) । यह कभी प्रसन्न होकर नाचता है, कभी कुछ बजाने लगता है।
कभी जोर से दौड़ता, कभी ठहर जाता है। कभी बैठा रहता तथा कभी
लेट जाता है। यह अनेक वस्त्र पहिने हुए रहता है। उन्मत्त पात्र का यही
स्वरूप होता है। इसकी गति निम्न विधि के अनुसार रहे—जिसमें सर्वप्रथम
यह 'नूपुरपाद' पैर में स्थित होकर फिर उसे 'दण्डपादा' दशा में फैला दे
फिर 'बद्धा' चारी को प्रदर्शित कर पैरों को 'स्वस्तिक' दशा में रखे। इसी
प्रकार चारों दिशाओं में घूमकर 'मण्डल' बनाकर अभिनय करे (अर्थात्
एक चक्करदार घुमाव ले ले) और फिर पीठ को चारों ओर घुमाते हुए लता
हस्तों का अव्यवस्थित रूप में पैरों की गति के साथ हाथों को हिलाते
हुए प्रदर्शन करे ॥ १२३-१३० ॥
१. उन्मत्ताभिनयस्त्वेवं तस्येमां कारयेद् गतिम्—क० ।
२. तस्य तां कारयेद्—क० ।
३. कृत्वा चारीं तथोद्धामथ स्वस्तिकमेव च—क० ।
४. परिक्रम्य चतुर्दिशम्—ग० ।
५. वक्रन्तु भ्रमणञ्चैव रङ्गकोणेषु योजयेत्—क० ।
६. सल्लितं—क; सुललितं—ग० । ७. पादैहंसगतिं व्रजेत्—क० ।