नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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( कथावस्तु के कारण ) रहती है । प्रासाद पर चढ़ने ( के अभिनय ) में
'अतिक्रान्ता' चारी के पैरों द्वारा शरीर को उपर उठाते हुए सीढ़ी पर चढ़े
तथा प्रासाद से उतरने ( की दशा में ) में शरीर को थोड़ा झुकाते हुए एक
पैर को 'अतिक्रान्ता' चारी तथा दूसरे को 'अंचित' गति में रखते हुए
चलना चाहिए ॥ ९६-९८ ॥
प्रासादारोहणं यत्तु तदेवाद्रिषु कारयेत् ।
केवलं तच्चै² निक्षेपमङ्घ्रिपक्ष्णं भवेदथ ॥ ९९ ॥
द्रुमे चारोहणङ्कार्यमतिक्रान्तोत्थितैः³ पदैः ।
सूचीविद्धैरपक्रान्तैः पार्श्वक्रान्तैस्तथैव च ॥ १०० ॥
मैंने प्रासादारोहण में जिस 'गति' का प्रदर्शन बतलाया पर्वतारोहण में
भी वही गति रखे, केवल पर्वतारोहण की दशा में पैर के पंजों पर अंग को
ऊपर उठाए रखना ( पाठान्तर से अर्थ—मस्तक को ऊपर-नीचे उठाकर
तथा हाथ का सहारा पैर को देते हुए रखना ) चाहिए। वृक्ष पर चढ़