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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

त्रयोदशोऽध्यायः १४३
यही गति शत्रु द्वारा पीछा करने, डराने या दुःख देने की स्थिति में
भी प्रदर्शित करना चाहिए। किसी भयंकर प्राणी को देखने या किसी
भयानक आवाज को सुनने की स्थिति में भी इसी गति की योजना
की जाए। तथा डरपोक पुरुष-स्त्री पात्रों में भी इसी गति की संयोजना की
जाए (पर पुरुष पात्र में थोड़ी धैर्य या पराक्रम प्रदर्शन (आक्षत विक्रमा)
की वृत्ति का संमिश्रण रखते हुए उक्त गति रहे।) भयभीत पुरुष की गति
में 'एलकाक्रीडित' चारी (ना० शा० ११।२०) में पैरों को शीघ्रता
से ऊपर रखते हुए या कभी वहीं टिकाकर या एक-दूसरे से बहुत दूर
रखकर तथा हाथों को पैरों की गति के अनुसार रखते हुए रहना
चाहिए ॥ ७०-७६ ॥१
(विविध-पात्र-गति)—
वणिक् तथा मन्त्रिगण की गति—
वणिजां सचिवानाञ्च१ गतिः कार्या स्वभावजा ॥ ७६ ॥
अतिक्रान्तैः पदैर्विप्रा द्वितालान्तरगामिभिः ।
कृत्वा नाभितटे हस्तमुत्तानं३ खटकामुखम् ॥ ७७ ॥
आद्यं चारालमुत्तानं कुर्यात्४ पार्श्वे तथान्तरे ।
न निष्पण्णं न च स्तब्धं नै५ चापि परिवाहितम् ॥ ७८ ॥
कृत्वा गात्रं तथा६ गच्छेत्तेन चैव क्रमेण तु ।
वणिक् तथा सचिव गण की गति उनकी प्रकृति के अनुकूल
रखनी चाहिए (अर्थात् यह मध्यमगति में रहना चाहिए। क्योंकि
ये मध्यमपात्र हैं) इन्हें 'अतिक्रान्ताचारी' में दो ताल के प्रमाणवाली
डग भरना चाहिए। इनका बायाँ हाथ 'कटकामुख' मुद्रा में हथेली
१. ७०-७६ श्लोक के उपरान्त ना० शा० में शान्तरसगति का निरूपण नहीं
है। अभिनव गुप्त के अनुसार (तथा अन्य नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार)
शान्तरस में 'अचंचल या स्थिर गति' रहती है। जिसकी योजना स्थित-प्रज्ञ या
शांत-प्रकृति के योगी जैसे पात्र में रखनी चाहिए।
१. मन्त्रिणाञ्चैव—क०। २. अतिक्रान्तपदैः सा तु—क० ।
३. हस्तमुत्थानं—क०, हस्तं मुक्ताङ्गकटका—ख०, ग० ।
४. कुर्यात् पार्श्वस्तनान्तरे—क०, कुर्यात् पार्श्वं तदन्तरे—क०, ख० ।
५. न ततो—क०; न चैव—ग०। ६. ततो—क० ।