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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 668 में से

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पृष्ठ 262

त्रयोदशोऽध्यायः १५१
विटगति—
विटस्यापि च कर्तव्या ¹गतिर्ललितविभ्रमा² ।
पादै³राकुञ्चितैः⁴ किञ्चित्तालभ्यन्तरपातितैः ॥ ११० ॥
स्वैरसौष्ठवसमायुक्तौ⁵ तथा हस्तौ⁶ पदानुगौ ।
खटकावर्धमानौ तु कृत्वा विटंगतिं⁷ व्रजेत् ॥ १११ ॥
विट¹ पात्र की गति 'ललित विलासित' होती है। विट की गति को
अभिनेता 'कुंचित' पाद को एक ताल के अन्दर से रखते हुए
'खटकावर्धमानक' हाथों तथा सौष्ठवयुक्त अंगों द्वारा पैरों की गति के
अनुसार हाथों को गतिशील हुए अभिनीत करे ॥ ११०-१११ ॥
कञ्चुकी-गति—
कञ्चुकीयस्य कर्तव्या वयोऽवस्था विशेषतः ।
अवृद्धस्य⁹ प्रयोगज्ञो गतिमेवं⁸ प्रयोजयेत् ॥ ११२ ॥
अर्द्धतालोत्थितैः पादैर्विष्कम्भैरृजुभिस्तथा¹⁰ ।
समुद्वहन्निवाङ्गानि¹¹ पङ्गुलन्न इव¹² व्रजेत् ॥ ११३ ॥
'कञ्चुकी'² (अन्तःपुर रक्षक) की गति उसकी अवस्था तथा स्थिति
१. विट—कलाविद् तथा वेशोपचार कुशल व्यक्ति जो राजा या राजपरिवार
का प्रच्छन्न सेवक (और कभी यह खलनायक का सेवक) भी होता है।
२. कञ्चुकी—कञ्चुकी का कार्य अन्तःपुर-रक्षण, कवच आदि लाना ले
जाना तथा वेत्रधारण करना होता है। कंचुकी का लक्षण भावप्रकाशन में उसके
उपर्युक्त स्वरूपानुसार प्राप्त होता है—
अकामा ब्राह्मणाश्चैव कंचुकोष्णीषवेत्रिणः ।
ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्ना कञ्चुकीया स्मृता बुधैः ॥
(भा० प्र० बड़ौदा सं० पृ० २९२)
१. गतीर्ललितविक्रमाः—क०। २. विक्रमा—ख०।
३. किञ्चिदाकुञ्चितैः पादैः—क०। ४. राकुञ्चिता—क०।
५. रङ्गसौष्ठवसंयुक्तं तथा—क०। ६. कटिस्थितौ—क०।
७. कार्या विटे गतिः—क०। ८. गतिः काञ्चुकिनी प्रोक्ता—क०।
९ वृद्धे वा मध्यमे वापि तथा चैव कनीयसि—क०।
१०. तदा—क०।
११. उद्वहन्निव गात्राणि—क; समुद्वहंस्तथाङ्गानि—ख०।
१२. व्रजन्—क०।