नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ नाट्यशास्त्रम्
रथ पर आरोहण करने वाले पात्र की गति सामान्य डगों ( चूर्णपद )
द्वारा प्रदर्शित की जाए। वह समपादस्थान के द्वारा ( दोनों पैरों को
समान रूप से पृथ्वी पर टिकाते हुए ) रथ की गति को सूचित करे । वह
एक हाथ में धनुष तथा दूसरे में रथ का डण्डा (कूबर) सम्हाले रहे । ( इसी
प्रकार ) इसका सारथि भी चाबुक तथा लगाम के सम्हालने में व्यस्त रहे ।
इसके वाहन भी रथ की स्थिति के अनुसार विभिन्न प्रकार के स्वरूप वाले
प्रदर्शित किये जाएँ तथा वह द्रुत गति में सामान्य डगों को भरते हुए
रङ्गमञ्च पर प्रवेश करे ॥ ८८-६० ॥
विमानावरोहण गति —
विमानस्थस्य कर्तव्या ह्येषैवं स्यन्दनी गतिः ।
आरोदुमुद्वहेद्गात्रं किञ्चित्स्यादुन्मुखस्थितम् ॥ ९१ ॥
अस्यैव वैपरीत्येन कुर्याच्चाप्यवरोहणम् ।
अधोऽवलोकनैश्चैव मण्डलावर्तनेन च ॥ ९२ ॥
रथ पर चढ़ने की गति का ही विमान पर अधिरोहण करते समय भी
अनुसरण किया जाए जिसमें केवल शरीर ऊपर की ओर रखते हुए स्थित रहे
तथा अवतरण (आकाश से नीचे उतरने) की दशा में अधिरोहण के विरुद्ध
कार्यों का प्रदर्शन करे ( अर्थात् शरीर को झुकाकर नीचा मुँह किये रहे ) ॥
आकाश गति—
आकाशगमने चैव कर्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः ।
स्थानेन समपादेन तथा चूर्णपदैरपि ॥ ९३ ॥
व्योम्नश्चावतरेद्यस्तु तस्यैतां कारयेद्गतिम् ।
ऋज्वायतोन्नततनैः कुटिलावर्तितैरथ ॥ ९४ ॥
१. समपाद-स्थान में दोनों पैर पृथ्वी पर टिकाकर रथ के मार्ग पर
या रथ से चलने का अभिनय किया जाता है परन्तु कथकलि में एक पैर को
पृथ्वी पर टिका कर ही रथस्थ रथी का अभिनय करने की परम्परा है । (सम्पा०)
१. गती रथगतोपमा—क० ।
२. स्यादुन्मुखस्तथा—क०, उन्मुखस्थितः—ख० ।
३. अधोऽवलोकनेनैव—क० ।
४. कर्त्तव्यं गतिचेष्टितम्—क० । ५. पदैरथ—क० ।
६. स्तंववतरेद्यस्तु—क० । ७. रुद्धायतोन्नुतननै—ख० ।