नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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के अनुकूल रखना चाहिए। यदि कंचुकी युवक हो तो उसकी गति अर्ध
ताल पर उठने वाले सीधे पैरों से साधारण गति रखनी चाहिए। वह
अपने शरीरावयवों को कीचड़ से सने व्यक्ति की तरह बतलाते हुए
अपनी गति प्रदर्शित करे ॥ ११२-११३ ॥
अथ वृद्धस्य कर्त्तव्या गतिः कम्पितदेहिका ।
विष्कम्भनकृतप्राणा$^{१}$ मन्दोत्क्षिप्तपदक्रमा ॥ ११४ ॥
यदि वह वृद्ध हो तो शरीर को घुमाते हुए तथा धीरे-धीरे पैरों को
उठाते हुए लकड़ी पर शरीर को टिकाकर (प्रत्येक) कदम रखे ॥ ११४ ॥
कृश, व्याधिग्रस्त तथा श्रान्त गति—
कृशस्यापि हि कर्तव्या गतिर्मन्दपरिक्र॑मा$^{२}$ ।
व्याधिग्रस्ते ज्वरार्ते च तपःश्रान्ते क्षुधान्विते ॥ ११५ ॥
विष्कम्भनकृतप्राणः कृशः क्षामोदरस्तथा$^{५}$।
क्षामस्वरक॑पोलश्च दीन॑नेत्रस्तथैव च$^{६}$ ॥ ११६ ॥
शनैरुत्क्षेपणञ्चैव कर्तव्यं हस्तपादयोः$^{७}$ ।
कम्पनञ्चैव गात्राणां क्ले॑शनञ्च तथैव हि$^{८}$ ॥ ११७ ॥
कञ्चुकी का वृद्ध होना आवश्यक नहीं क्योंकि नाट्यरचनाओं में उसके दोनों
स्वरूप प्राप्त हैं। अवृद्ध कञ्चुकी का प्रतिमा, स्वप्न, वासवदत्त आदि अविमारक,
आदि में तथा वृद्ध कंचुकी का शाकुन्तलं, वेणीसंहार आदि नाटकों में उल्लेख
मिलता है। अतः वृद्धावस्था में कंचुकी—पद दिये जाने का कोई नियम नहीं है
तथा सभी नाट्यरचनाओं में सम्प्राप्त उक्तियों के आधार पर इसकी नियुक्ति
अवृद्धावस्था या वृद्धावस्था में होने की पुष्टि भी होती है।
१. विष्कम्भितगतिप्राणा—क; विष्कम्भेन कृतप्राणा—ख०; ग० ।
२. कृशाङ्गानां तु—क०; कृशस्याप्यभिनेया वै—ख०, ग० ।
३. मन्दपदक्रमा—ग० ।
४. व्याधिग्रस्तो ज्वरार्त्तश्च तपःश्रान्तः क्षुधान्वितः—क०; व्याधिस्त्रस्तस्य
च तथा तपः शान्तस्य चैव हि—ग० ।
५. विष्टम्भनगतप्राणस्तथा क्षामोदरस्तथा—क० ।
६. सन्नगात्रस्तथैव च—क० ।
७. हस्तपादसमुत्क्षेपं शनैस्तत्र प्रयोजयेत्—क० ।
८. इलथनञ्चैव योजयेत्—क० ।