नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १५९
इस पात्र की स्वाभाविक अवस्था में रहने वाली 'गति' में बाएँ
हाथ में 'कुटिलक' (दण्डकाष्ठ जो टेढ़ा होता है) का धारण तथा दाहिने
हाथ से 'चतुर' मुद्रा का प्रदर्शन होता है। इसके अतिरिक्त वह अपनी
एक कोख, मस्तक तथा हाथ-पैरों को लय तथा ताल के अनुसार
झुकाता हुआ चलता है ॥ १४३-१४५ ॥
स्वभावजा तु तस्यैषा गतिरन्या विकारजा ॥ १४५ ॥
अलभ्यलाभाद्भुक्तस्य स्तब्धा तस्य गतिर्भवेत् ।
इस स्वाभाविक गति के अतिरिक्त (इसकी) दूसरी विकारज गति
भी होती है। इस गति का अलभ्य भक्ष्य (लड्डू आदि पक्वान्न) के या
मूल्यवान् वस्तु के प्राप्त होने पर स्तब्ध होकर प्रदर्शन किया जाता है ॥
दासादि गति—
कार्या चैव हि नीचानां चेटादीनां परिक्रमात् ॥ १४६ ॥
अधमा इति ये ख्याता नानाशीलाश्च ते पुनः ।
पार्श्वमेकं शिरश्चैव करैः सचरणस्तथा ॥ १४७ ॥
गतौ नमेत चेतानां दृष्टिश्श्वार्थविचारिणी ।
नीच तथा चेट आदि अनेकविध स्वभाव के अधम पात्रों को गति का
प्रदर्शन करना चाहिए। सेवकों की गति चारों ओर घूमते हुए एक
कोख, सिर, हाथ या पैर झुकते हुए और उनकी आँखें विभिन्न वस्तुओं पर
टिकने वाली (चंचल) रखना चाहिए ॥ १४६-१४८ ॥
शकारगति—
शकारस्यापि कर्तव्या गतिश्चञ्चलदेहिका ॥ १४८ ॥
वस्त्राभरणसंस्पर्शैर्मुहुर्मुहुरवेक्षितैः ।
गात्रैर्विकारविक्षिप्तैर्लम्बवस्त्रस्रजा तथा ॥ १४९ ॥
सगर्विता चूर्णपदा शकारस्य गतिर्भवेत् ।
१. स्वभावजाता—क० ।
२. लाभे तथा च भुक्तस्य तुष्टे चापि गतिर्भवेत्—क० ।
३. कार्या चैव तु हीनानां चेष्टादीनां द्विजोत्तमाः—क० ।
४. नानाशीलाः कुवृत्तयः—क० । ५. करं चरणमेव च—क० ।
६. नामयेत्तद्गतौ किञ्चित्कुजन्मा चेटसंज्ञितः—क० ।
७. वस्त्राभरणसंस्पर्श—क० । ८. वस्त्रस्रजस्तथा—ग० ।
९. चूर्णपादस्य—क; चूर्णपादा—ग० ।