नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० नाट्यशास्त्रम्
शकार की गति अहंकार पूर्ण तथा साधारण डगों ( चूर्णपाद ) वाली
होती है। यह चलते समय अपने वस्त्र तथा अलंकारों को छूता या बार-बार
कभी-कभी देखता हुआ चलता है। यह अस्वाभाविकता से अपने अंगों को
उठा कर तथा लटकने वाली अपनी माला तथा वस्त्रों को फटकारता
हुआ चलता है ॥ १४८-१५० ॥
नीचपात्र गति—
जात्यो¹ नीचेषु योक्तव्या² विलोकनपरा गतिः ॥ १५० ॥
असंस्पर्शाच्च³ लोकस्य स्वाङ्गानि विनिगूह्य च ।
नीच कुल में उत्पन्न पात्रों की गति चारों ओर आँखों को घुमाते हुए
तथा दूसरों से शरीर को सिकुड़ा कर स्पर्श न करते हुए चलने वाली
रखना चाहिए ॥ १५०-१५१ ॥
म्लेच्छ गति—
म्लेच्छानां जातयो यास्तु पुलिन्दैः⁴शबरादयः ॥ १५१ ॥
तेषां देशौनुरूपेण कार्ये गतिविचेष्टितम्⁶ ।
म्लेच्छों तथा ( इसी प्रकार ) पुलिन्ध्र, शबर आदि जातियों की गति
उनके आचार, जाति, स्वभाव तथा देश के अनुसार रखनी चाहिए ॥१५१॥
पशु-पक्षी गति—
पक्षिणां श्वापदानाञ्च पशूनाञ्च द्विजोत्तमाः ॥ १५२ ॥
स्वस्वजातिसमुत्थेन स्वभावेन⁷ गतिर्भवेत् ।
पक्षियों, हिंस्र जानवरों तथा चौपायों की गति उनकी अपनी प्रकृति
तथा चेष्टाओं के अनुसार प्रदर्शित की जाए ॥ १५२-१५३ ॥
सिंहर्क्षवानराणाञ्च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ १५३ ॥
या कृता नरसिंहेन विष्णुना प्रभविष्णुना ।
सिंह, रीछ तथा वानर जैसे पात्रों की गति को—जो भगवान् विष्णु
द्वारा नरसिंह अवतार में की गई थी—इस प्रकार प्रदर्शित करना चाहिए ॥
आलीढं⁸ स्थानकङ्कृत्वा गात्रन्तस्यैव चानुगम् ॥ १५४ ॥
जानूपरि करं ह्येकमपरं⁹ वक्षसि स्थितम् ।
१. जातिनीचेषु—क० । २. कर्त्तव्या—क० । ३. अत्यस्पर्शाच्च—ग० ।
४. पुलिन्दाद्याः द्विजोत्तमाः—क० । ५. गतिविचारेण—क०, ग० ।
६. विचेष्टितैः—क० । ७. स्वभावे प्रतियोजयेत्—क० ।
८. आलीढस्थानकं—क०, ग० । ९. चैकमपरं—ग० ।