नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १६१
१अवलोक्य दिशः सर्वा२श्चिबुकं बाहुमस्तके ॥ १५५ ॥
गन्तव्यं विक्रमै३र्विप्राः पञ्चतालान्तरोत्थितैः ।
(इसमें) आलीढ़ स्थान को प्रदर्शित कर शरीर को उसी गति के
अनुसार रखे। एक हाथ को घुटने पर तथा दूसरे को वक्षस्थल पर रखकर
चारों ओर एक बार ठुड्डी को कन्धे पर रखते हुए तथा क्रूर दृष्टि से देखते
हुए एवं पैरों को पाँच ताल के अन्तर से रखते हुए चले ॥ १५४-१५६ ॥
नियुद्धसमये चैव रङ्गावतरणे तथा ॥ १५६ ॥
सिंहादीनां प्रयोक्तव्या गतिरेषा प्रयोक्तृभिः ।
सिंह आदि (पात्रों) की यही गति रंगमंच पर प्रवेश तथा उनके
युद्ध के समय भी प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ १५६-१५७ ॥
शेषाणामर्थयोगेन गतिं स्थानै६श्च योजयेत्७ ॥ १५७ ॥
वाहनार्थप्रयोगेषु रङ्गावतरणेषु च।
शेष प्राणियों की गति तथा स्थानों की योजना उनके मंच पर
अवतरित होने, पीठ पर किसी वस्तु के ढोने, चढ़ाने आदि अर्थों के
प्रदर्शन में उपयुक्त स्वरूप के अनुसार करनी चाहिए ॥ १५७-१५८ ॥
एवमेताः प्रयोक्तव्या नराणाङ्गतयो९ बुधैः ॥ १५८ ॥
नोक्ता१० या या मया ह्यत्र ग्राह्यास्तास्ताश्च लोकतः।
अतः परं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां गति विचेष्टितम् ॥ १५९ ॥
इस प्रकार विभिन्न प्राणियों की ये गतियाँ चतुर पात्रों द्वारा अभिनीत
की जाएँ। जिन प्राणियों की गति मेरे द्वारा इस प्रसंग में न बतलाई जा
सकी हो उन्हें स्वयं बुद्धि द्वारा लोक व्यवहार को देखते हुए प्रदर्शित किया
जाए। अब मैं स्त्रियों की गति तथा चेष्टाओं का वर्णन करता हूँ।
१. विलोलितं शिरः कृत्वा—क०।
२. दिशः कृत्वा चिबुकं—ग० घ०।
३. विक्रमैश्चैव पञ्चतालान्तरस्थितैः—क०।
४. नियुद्धे संशये चैव—क०। ५. च योक्तव्या—क०।
६. स्थानान्यपि च कारयेत्—क०। ७. स्थाने च—ग०।
८. अतः परं गजवाजिरथादींस्तु चिह्नमात्रेण कारयेदित्यधिकम्—क० पुस्तके।
९. नृणान्तु गतयो बुधैः—क०।
१०. अत्र नाभिहिता यास्तु विज्ञेया शास्त्रलोकतः—क०; नोक्ताश्च या मया
ह्यत्र ग्राह्यास्ता अपि लोकतः—ग० घ०।
११ ना० शा० द्वि०