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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 668 में से

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पृष्ठ 256

त्रयोदशोऽध्यायः १४५
यति, श्रमण, तपस्वी तथा नैष्ठिकब्रह्मचारी जैसे पात्रों की गति में
चतुर अभिनेता नेत्रों को स्थिर (अलोलचक्षु) तथा चार हाथ आगे
(सामने) की भूमि को देखते हुए रखे, वह अपना चित्त स्थिर तथा अपने
पन्थ का स्वरूप या धर्म-चिह्न धारण करे। इसका वेष विनीत तथा भगवां
कपड़े वाला (या अपने सम्प्रदायानुसार पीला, सफेद वस्त्रधारी आदि भी)
रहना चाहिए।
यह ‘समपाद’ चारी तथा समपाद स्थान में स्थित होकर दोनों हाथों
को ‘चतुर’ मुद्रा में रखकर एक को फैला दे। वह अपना मुँह प्रसन्न तथा
प्रयोग के अनुसार रखते हुए स्वाभाविक गति में ‘अतिक्रान्ता’ चारी में चले।
यह गति उत्तम यतियों की तथा महाव्रतचारी या इसी कोटि के
साधुओं आदि की होती है शेष साधुजन जो इनसे गुणों से हीन या विपरीत
लक्षण वाले हों, जो उन्मत्त, शान्त प्रकृति (उदात्त) या दयालु (निभृत)
स्वभाव के हों, या पाशुपतसम्प्रदाय के शैव संन्यासी हों तो उन्हें ‘शकटास्या’
तथा ‘अतिक्रान्ता’ चारी में उद्धत डग भरते हुए रखा जाए ॥ ७९-८६ ॥
(अन्धकार में स्थित या) अन्धे पात्र की गति—
अन्धकारेऽथ याने च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ।
भूमौ विसर्पितैः पादैर्हस्तैर्मार्गप्रदर्शिभिः ॥ ८७ ॥
अन्धेरे में चलने वाले या अन्धे पात्र की गति पैरों को पृथ्वी पर
रगड़ते हुए तथा हाथों से रास्ता टटोलते हुए रखना चाहिए ॥ ८७ ॥
रथावरोही पात्र की गति—
रथस्थस्यापि कर्तव्या गतिश्चूर्णपदैरथ ।
समपादं तथा स्थानङ्कृत्वा रथगतिं व्रजेत् ॥ ८८ ॥
धनुर्गृहीत्वा चैकेन तथा चैकेन कूबरम् ।
सूतश्चास्य भवेदेवं प्रतोदप्रग्रहाकुलः ॥ ८९ ॥
वाहनानि विचित्राणि कर्तव्यानि विभागशः ।
द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव गन्तव्यं रङ्गमण्डले ॥ ९० ॥
१. अन्धस्येव गतिं कुर्यादन्धकारेषु योगवत्—क०, अन्धयाने च—ग० ।
२. हस्तदर्शितमार्गभिः—क०; हस्तैर्मार्गप्रदर्शितैः—ग० ।
३. चूर्णपदक्रमा—क०, तूर्णपदैरथ—ख० ।
४. धनुरेकेन हस्तेन गृहीत्वान्येन सायकम्—क० ।
५. करणानि विचित्राणि—क० । ६. रङ्गमण्डलम्—क० ।
१० ना० शा० द्वि०