नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १५७
सर्वसङ्कुचिताङ्गा¹ च वामने गतिरिष्यते ।
न तस्य² विक्रमः कार्यों विक्षेपश्चरणस्य च ॥ १३६ ॥
सोद्वाहिता³ चूर्णपदे सा कार्या कुहकात्मिका ।
पंगु पात्र की गति 'अग्रतलसंचर' तथा अंचितपाद कर बैठे हुए तथा
जंघा को मोड़कर चलते हुए बतलाई जाती है ।
वामन (बौने) पात्र की गति में सारे अंग सिकुड़े हुए रखते हैं,
पैर शीघ्रता से बड़ी डग नहीं भर पाते तथा जोर से पृथ्वी पर पटके नहीं
जाते । यह साधारण चाल में उचक कर चलते हुए दर्शकों को हँसाता है ॥
विदूषक गति—
विदूषकस्यापि गतिर्हास्यत्रयविभूषिता⁴ ॥ १३७ ॥
अङ्गै⁵काव्यकृतं हास्यं हास्यं नेपथ्यजं स्मृतम् ।
दन्तुरः⁶ खलतिः कुब्जः खञ्जश्च विकृताननः ॥ १३८ ॥
यदीदृशः⁷ प्रवेशः स्यादङ्गहास्यन्तु तद्भवेत् ।
यदा तु बकवद् गच्छेदूल्लोकितविलोकितेः ॥ १३९ ॥
अत्यायतपदत्त्वाच्च⁸ अङ्गहास्यो भवेत्तु⁹ सः ।
इसी प्रकार विदूषक की गति भी (हास्य उत्पन्न करने के लिए)
साधारण प्रकार की रखना चाहिए, जिसमें तीन प्रकार के हास्य रहते
हों । ये हास्य अंगों के विकार से होने वाले, (उच्चारित वाक्यों के) शब्दों
द्वारा (काव्यकृत) होने वाले तथा वेश से (नेपथ्यजं) होने वाले होते हैं ।
इन हास्यों में यदि विदूषक भद्दे और बड़े दाँतवाला (दन्तुर), गंजा,
कुबड़ा, लँगड़ा तथा बदसूरत हो तो शरीर के द्वारा उत्पन्न हास्य होने से
ऐसा हास्य 'अंगजहास्य' कहलाता है । यदि यही ऊपर-नीचे (तथा दाँएँ-
बाँएँ) देखते हुए बगुले के समान चले और लम्बी-लम्बी डग भरे तो उसे
भी 'अंगहास्य' कहते हैं ॥ १३७-१४० ॥
१. सङ्कोचिताङ्गी च—क०; २. न तस्यातिक्रमः कार्यों—क० ।
३. उद्वाहिता चूर्णपदैः—क० । ४. समन्विता—ग० ।
५ अङ्गहास्यं कार्यहास्यं हास्यं नेपथ्यजं तथा—क०; अङ्गवाक्यकृतं
हास्यं—ग० ।
६ कुब्जः खञ्जोऽथ खलतिर्दन्तुरो विकृताननः—क० ।
७. यत्तादृशो भवेद् विप्राः अङ्गहास्यन्तु तद्भवेत्—क० ।
८. पदत्वाच्चाप्यङ्गहास्यो—क० । ९. भवेत् स तु—ग० ।