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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 668 में से

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पृष्ठ 264

त्रयोदशोऽध्यायः १५३
कृशपात्र की गति धीरे-धीरे पैर उठाकर चलते हुए प्रदर्शित की जाए।
रुग्ण (व्याधिग्रस्त) ज्वरार्त, तपः क्लेशित तथा क्षुधाग्रस्त पात्र की गति में
उसे किसी लकड़ी के सहारे चलने वाला, कृशकाय, खाली पेट (या
सिकुड़े हुए पेट) वाला क्षीणस्वर, पिचके गाल तथा डबडबायी आँखोंवाला
बतलाना चाहिए। यह अपने हाथ और पैरों को धीरे-धीरे उठाता हुआ
चले। इसका शरीर घूमता हुआ तथा डग भरते समय प्रत्येक कदम
पर साँस लेता हुआ प्रदर्शित किया जाए ॥ ११५-११७ ॥
पथिक—(लम्बी यात्रा करने वाले पात्र की) गति—
दूरोऽध्वानं गतस्यापि गतिर्मन्द^२परिक्रमा।
विकू^३णनञ्च गात्रस्य जानुनोश्च विमर्दनम् ॥ ११८ ॥
यात्रा पर निकले हुए या बहुत दूर चल कर आए हुए व्यक्ति की गति
धीरे-धीरे डग भरते, शरीर को झुकाते तथा जंघाओं को दबाते हुए प्रदर्शित
करनी चाहिए ॥ ११८ ॥
स्थूल-गति—
स्थूलस्यापि हि कर्त्तव्या गतिर्द्देहानुकर्षिणी ।
स^४मुद्वहनभूयिष्ठा मन्दोत्क्षिप्तपदक्रमा ॥ ११९ ॥
विष्क^५म्भगामी च भवेन्निश्वासबहुलस्तथा ।
श्रम^६स्वेदाभिभूतश्च व्रजेच्चू^७र्णपदैस्तथा ॥ १२० ॥
स्थूल या मोटे पुरुष की गति धीरे-धीरे पैर रखकर बहुत भारी वजन
ढोने की चेष्टा करते हुए पुरुष के समान प्रदर्शित की जाए। यह चलते
समय जोरों से साँस लेता हुआ, थोड़ा सा श्रम करने पर पसीने से लथपथ
तथा सादी चाल (चूर्णपद) वाला प्रदर्शित किया जाए ॥ ११९-१२० ॥
१. प्रकर्त्तव्याध्वगस्यापि—क०, दूराध्वगस्यापि गतिः—क०; ।
२. मन्दपदक्रमा—क०, ग० ।
३. विकूणनेन वक्त्रस्य जानुनोश्च विमर्शनात्—क० ।
४. समुद्वहितगात्रा च विलम्बितपदक्रमा—क० ।
५. विष्कम्भगामिनी चैव निश्वासबहुला तथा—क० ।
६. अतिक्रान्ता च कर्त्तव्या—क० ।
७. तथा चूर्णपदैः सदा—क; व्रजेत् तूर्णपदैस्तथा—ख० ।