नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः १४७
आकाश-गमन — आकाशगामी पात्र की गति आकाशिकी चारियों के
प्रभूत प्रदर्शन (मण्डलावर्तन) तथा ऊँचा मुँह कर देखने के द्वारा प्रदर्शित
करे और (इसके अतिरिक्त) यह समपादस्थान में साधारण डग (चूर्णपद)
भरते हुए हो। आकाश से अवतरण करने वाले पात्र की भी इसी प्रकार
'गति' रहना चाहिए। ऐसी गति सीधे या लम्बे, ऊँचे, नीचे या तिरछे
(अव्यवस्थित) घूमते हुए डगों को भरते हुए प्रदर्शित करना चाहिए ॥
१भ्रश्यतश्च तथाकाशादपविद्ध२र्भुजा गतिः ।
विकीर्ण३वसना चैव तथा भूगतलोचना ॥ ९५ ॥
आकाशावतरण — आकाश से गिरते हुए पात्र की गति में भुजाओं को
झूले के समान डोलते हुए (अपविद्ध भुज) कपड़ों के छोर इधर-उधर
बिखराते हुए तथा दृष्टि पृथ्वी की ओर नीची रहनी चाहिएँ ॥ ९५ ॥
उन्नतप्रदेशारोहण गति —
प्रासा४दद्रुम-शैलेषु नदीनिम्नोन्नतेषु च ।
आरोहणावतरणं कार्यमर्थ५वशात्तथा ॥ ९६ ॥
प्रासादारोहणं कार्यमतिक्रान्तैः पदैरथ ।
उद्वाह्य गात्रं पादञ्च६ न्यसेत्सोपानपङ्क्तिषु ॥ ९७ ॥
७तथावतरणञ्चैव गात्रमस्यैव८ कारयेत् ।
९अतिक्रान्तेन पादेन द्वितीयेनाञ्चितेन च ॥ ९८ ॥
(नाटक में पात्रों के) प्रासाद, वृक्ष या पर्वत (अथवा किसी ऊँचे
स्थान) पर चढ़ने की या उनसे उतरने की तथा नदी, गढ़ तथा टीलों
पर से (ऊँचे-नीचे प्रदेशों पर से) चढ़ने-उतरने की आवश्यकता
१. दिव्यपात्र का पृथ्वी पर अवतरण होने पर उक्त पात्र की गति
आकाशमार्ग से विमान द्वारा या किसी दूसरे विचित्र प्रकार द्वारा भी बतलाना
चाहिए। क्योंकि ऐसे पात्रों की सभी खण्डों में स्वेच्छानुसार गति रहती है।
१. भ्रममाणस्य — क० । २. दपरुद्धभुजा गतिः — क० ।
३. वदना — क० । ४. द्रुमप्रासाद — क० ।
५. मर्थवशाद् बुधैः — क०, ख० ।
६. सोपानं निक्षिपेद् बुधः — क०, सोपाने निक्षिपेत्ररः — ग० ।
७. वतरणे चैव — क० । ८. गात्रमानम्य रेचयेत् — क०; ग० ।
९. पद्यार्धमेतत् — ख० पुस्तके प्रक्षिप्तम् ।