नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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उसी प्रकार सूचित हो जाता है जैसे अंकुश के हाथ में लेने पर हाथी
की, पावड़ी लगाने पर घोड़े की तथा रास लेने पर रथ की अभिव्यक्ति
होती है । ( अतएव नौका गमन अनुकरणात्मक क्रियाओं के द्वारा
अभिनीत किया१ जाए ) ॥ १०५-१०७ ॥
अश्वाधिरोहण-गति—
अश्वयाने गतिः कार्या वैशाखस्थानकेन तु ।
तथा१ चूर्णपदैश्चित्रैरुपर्युपरि-पातितैः ॥ १०८ ॥
घुड़सवारी या घोड़े पर चढ़ते हुए पात्र की गति वैशाखस्थान तथा
शीघ्रता से उठाई जाने वाली डगों ( चूर्णपदैः ) द्वारा प्रदर्शित
की जाए ॥ १०८ ॥
सर्पगति—
पन्नगानां गतिः कार्या पादैः स्वस्तिकैः२संयुतैः ।
पार्श्वक्रान्तं पदं कृत्वा३ स्वस्तिकं रेचयेदिह४ ॥ १०९ ॥
सर्पों की गति ‘स्वस्तिक’ पदों के द्वारा की जाए जिसमें पहिले
पार्श्वक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर स्वस्तिक पदों के रेचक द्वारा
अभिनय प्रस्तुत नाट्यधर्मिता के द्वारा करना चाहिए ॥ १०९ ॥
१ नौकाभिनय के इस भाग से यह स्पष्ट हो जाता है कि सादे रंगमंच पर
कई कार्य तथा दृश्य शारीरिक अनुकरण पर ही प्रदर्शित किये जाते थे । तदनुसारी
दृश्यों से चित्रित पर्दों आदि से सुसज्जित मंच पर नहीं । आचार्य अभिनवगुप्ता-
चार्य ने चित्रपट (दृश्याङ्कित पर्दों) के बिना भी उक्त अभिनय के प्रदर्शन करने की
सहमति प्रदर्शित की है तथा चित्रपट द्वारा बतलाने का उल्लेख भी किया है ।
‘तेन चित्रपटादिवियोगेऽपि रथगमनाद्यभिनयं नायुक्तम् । सौकर्यात् तु तत्क-
रणमपि भवतीति भावः’ ॥
( अभि० Vol. II, पृ० १५४ )
१. इच्चैव—क०, तथा तूर्णंपादैश्चित्तै—ख० ।
२. संस्थितैः—क०; संज्ञितैः—ख० ।
३. पार्श्वक्रान्तक्रमं कृत्वा स्वस्तिकं योजयेत्तथा—क० ।
४ कुर्यात्—क० ।