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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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१५० नाट्यशास्त्रम्
उसी प्रकार सूचित हो जाता है जैसे अंकुश के हाथ में लेने पर हाथी
की, पावड़ी लगाने पर घोड़े की तथा रास लेने पर रथ की अभिव्यक्ति
होती है । ( अतएव नौका गमन अनुकरणात्मक क्रियाओं के द्वारा
अभिनीत किया१ जाए ) ॥ १०५-१०७ ॥
अश्वाधिरोहण-गति—
अश्वयाने गतिः कार्या वैशाखस्थानकेन तु ।
तथा१ चूर्णपदैश्चित्रैरुपर्युपरि-पातितैः ॥ १०८ ॥
घुड़सवारी या घोड़े पर चढ़ते हुए पात्र की गति वैशाखस्थान तथा
शीघ्रता से उठाई जाने वाली डगों ( चूर्णपदैः ) द्वारा प्रदर्शित
की जाए ॥ १०८ ॥
सर्पगति—
पन्नगानां गतिः कार्या पादैः स्वस्तिकैः२संयुतैः ।
पार्श्वक्रान्तं पदं कृत्वा३ स्वस्तिकं रेचयेदिह४ ॥ १०९ ॥
सर्पों की गति ‘स्वस्तिक’ पदों के द्वारा की जाए जिसमें पहिले
पार्श्वक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर स्वस्तिक पदों के रेचक द्वारा
अभिनय प्रस्तुत नाट्यधर्मिता के द्वारा करना चाहिए ॥ १०९ ॥
१ नौकाभिनय के इस भाग से यह स्पष्ट हो जाता है कि सादे रंगमंच पर
कई कार्य तथा दृश्य शारीरिक अनुकरण पर ही प्रदर्शित किये जाते थे । तदनुसारी
दृश्यों से चित्रित पर्दों आदि से सुसज्जित मंच पर नहीं । आचार्य अभिनवगुप्ता-
चार्य ने चित्रपट (दृश्याङ्कित पर्दों) के बिना भी उक्त अभिनय के प्रदर्शन करने की
सहमति प्रदर्शित की है तथा चित्रपट द्वारा बतलाने का उल्लेख भी किया है ।
‘तेन चित्रपटादिवियोगेऽपि रथगमनाद्यभिनयं नायुक्तम् । सौकर्यात् तु तत्क-
रणमपि भवतीति भावः’ ॥
( अभि० Vol. II, पृ० १५४ )
१. इच्चैव—क०, तथा तूर्णंपादैश्चित्तै—ख० ।
२. संस्थितैः—क०; संज्ञितैः—ख० ।
३. पार्श्वक्रान्तक्रमं कृत्वा स्वस्तिकं योजयेत्तथा—क० ।
४ कुर्यात्—क० ।