नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
अष्टमोऽध्यायः ३१
इस प्रकार मैंने ओठों के अभिनय कार्य बतलाए, अब मैं चिबुक के
(ठुड्डी के) कर्म बतलाता हूँ। चिबुक के ७ प्रकार होते हैं—यथा—
(१) कुट्टन, (२) खण्डन, (३) छिन्न, (४) चुक्कित, (५) लेहित,
(६) सम तथा (७) दष्ट। यहाँ दाँतों की क्रिया के अनुसार ही चिबुक
कर्मों के लक्षण बतलाए जाते हैं (अर्थात् ये दांतों के लक्षण हैं तथा
चिबुक के भेद और लक्षण भी इसी प्रकार से होते हैं) दाँतों के संघर्ष
(कड़कड़ाने) को 'कुट्टन', दाँतों के बार-बार चबाने को 'खण्डन', दाँतों
का जोर से मिलाना 'छिन्न' दाँतों को परस्पर ऊपर तक हटा लेना 'चुक्कित'
जिह्वा से दाँतों का चाटना 'लेहित' दाँतों का थोड़ा मिलना 'सम' तथा
दाँतों से ओठ का दबाना 'दष्ट' कहलाता है ॥ १४५-१४८ ॥
योजना—
भयशीतज्वरक्रोधैर्ग्रस्तानां कुट्टनं भवेत् ॥ १४८ ॥
जपोऽध्ययनसल्लापभक्ष्ययोगे च खण्डनम् ।
छिन्नं व्याधौ भये शीते व्यायामे रुदिते ३मृते ॥ १४९ ॥
जृम्भणे चुक्कितं कार्यं तथा लौल्ये ५ च लेहनम् ।
समं स्वभावभावेषु सन्दष्टं क्रोधकर्मसु ॥ १५० ॥
इति दन्तोष्ठजिह्वानां करणे चिबुकक्रिया।
इनमें भय, शीत व्याधि तथा ज्वर में 'कुट्टन' की; जप, अध्ययन,
संलाप (संवाद) तथा भक्षण करने में 'खण्डन' की, व्याधि, भय, शीत,
व्यायाम, रूदित तथा मृत में 'छिन्न' की, चुम्बन लेने में 'चुक्कित' की;
लेहन कर्म (चाटने) में (पाठान्तर—चंचलता में) 'लेहन' की;
स्वाभाविक चेष्टाओं में 'सम' की तथा क्रोध के कार्यों में 'सन्दष्ट' की योजना
करनी चाहिए।
इस प्रकार मैंने दन्त, ओष्ठ तथा जिह्वा से सम्बद्ध (इन) चिबुकों के
कार्य बतलाए ॥ १४८-१५१॥
मुखज कर्म—
६विनिवृत्तञ्च विधुतं निर्भुग्नं भुग्नमेव च ॥ १५१ ॥
१. व्याधि—ख-ग०। २. जप्या—ख० ग०। ३. रुषितेक्षिते—ख० ।
४. चिकिर्त—ख, चुक्षितं—ग०। ५. लेह्यो—स-ग० ।
६. 'विनिवृत्तञ्च विधुतम्' इत्यादयोऽष्टौ श्लोकाः क्वचनादर्शेषु प्रक्षिप्ताः ।
३२ नाट्यशास्त्रम्
विवृत्तञ्च तथोद्वाहि कर्माण्यत्रास्यजानि तु ।
व्यावृत्तं विनिवृत्तं स्याद्विधुतं तिर्यगायतम् ॥ १५२ ॥
अवाङ्मुखत्वं निर्भुग्नं व्याभुग्नं किञ्चिदायतम् ।
विश्लेष्ठोष्ठञ्च विवृत्तमुद्वाह्याक्षिप्तमेव च ॥ १५३ ॥
मुखज कर्म ६ हैं—यथा-(१) विनिवृत्त, (२) विधुत (३) निर्भुग्न, (४)
भुग्न (५) विवर्त तथा (६) उद्वाही ।
सीधा खुला हुआ 'विनिवृत्त', तिरछा खुला हुआ मुंह 'विधुत', नीचे
की ओर झुका हुआ 'निर्भुग्न', कुछ खुला हुआ 'भुग्न' (व्याभुग्न), ओठों
से लगा हुआ मुँह 'विवर्त' तथा ऊपर की ओर उठा हुआ मुंह 'उद्वाही'
कहलाता है ॥ १५१-१५३ ॥
योजना—
विनिवृत्तमसूयायामीर्ष्याकोपकृतेषु¹ च ।
अवज्ञाविहृतादौ च स्त्रीणां कार्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १५४ ॥
विधुतं वारणे चैव नैवमित्येवमादिषु ।
निर्भुग्नञ्चापि विज्ञेयं गम्भीरालोकनादिषु ॥ १५५ ॥
भुग्नं लज्जान्विते योज्यं यतीनां तु स्वभावतः² ।
निर्वेदौत्सुक्यचिन्तासु तथा विनयमन्त्रणे³ ॥ १५६ ॥
स्त्रियों के असूया, ईर्ष्या, कोप, अवज्ञा तथा विहृत आदि भावों में
'विनिवृत्त' की; निवारण तथा निषेध कथन में 'विधुत' की; गम्भीर
आलोकनन आदि में 'निर्भुग्न' की तथा लज्जित व्यक्ति तथा निर्वेद, औत्सुक्य
चिन्ता, विनय विचार (मन्त्रणा) भावों में 'भुग्न' की योजना करनी
चाहिए। यह यतीजन में स्वाभाविक होता है॥ १५४-१५६ ॥
विवृतं वापि विज्ञेयं हास्यशोकभयादिषु ।
स्त्रीणामुद्वाहि लीलायां गर्वे गच्छत्यनादरे⁴ ॥ १५७ ॥
एवं नामेति कार्यञ्च कोपवाक्ये विचक्षणैः ।
समँसाचीकृतायुक्तं⁵ यच्च दृष्टिविकल्पनम्⁶ ॥ १५८ ॥
१. क्रोधकृतेत—ग० । २. स्वभावजम्—ख-ग ।
३. तथा च विनिमन्त्रणे—ख-ग० । ४. गच्छत्वना—ख-ग० ।
५. समं साचीकृताद्युक्ता—ख-ग०। ६. विकल्पितम्—ख-ग० ।
अष्टमोऽध्यायः ३३
तज्ज्ञैस्तदेनुसारेण कार्यं तदनुगं मुखम् ।
हास्य, शोक तथा भय आदि में 'विवृत', स्त्रियों की लीला तथा गर्व
में, अनादर, 'जाओ' तथा ऐसा ही कार्य है इस प्रकार के कथन में एवं
क्रोध पूर्ण वचनों में 'उद्वाही' मुख की योजना करनी चाहिए ।
नाट्यप्रयोक्ताजन द्वारा दृष्टि भेदों के जो सम तथा साची भेद पहिले
बतलाए गए उन्हीं के अनुसार मुख की भी योजना करनी चाहिए ।
मुख-राग—
अथातो मुखरागस्तु चतुर्धा सम्प्रकीर्तितः ॥ १५६ ॥
स्वाभाविकः प्रसन्नश्च रक्तः श्यामोऽर्थसंश्रयः ।
अब मैं 'मुख-राग' को बतलाता हूँ । ये अपने अर्थों के अनुसार चार
प्रकार के होते हैं । यथा—(१) स्वाभाविक, (२) प्रसन्न, (३) रक्त तथा (४)
श्याम ॥ १५९-१६० ॥
योजना—
स्वाभाविकस्तु कर्तव्यः स्वभावाभिनयाश्रयः ॥ १६० ॥
मध्यस्थादिषु भावेषु मुखरागः प्रकीर्तितः ।
प्रसन्नस्त्वद्भुते कार्यो हास्यशृङ्गारयोस्तथा ॥ १६१ ॥
वीररौद्रमदाद्येषु रक्तः स्यात् करुणे तथा ।
भयानके सबीभत्से श्यामं सञ्जायते मुखम् ॥ १६२ ॥
एवं भावरसार्थेषु मुखरागं प्रयोजयेत् ।
'स्वाभाविक मुखराग' की; स्वाभाविक अभिनय में तथा मध्यस्थ आदि
भाव में; 'प्रसन्न मुख राग' की अद्भुत, हास्य तथा शृंगार में; रक्त मुखराग
की वीर, रौद्र रस और मद तथा करुण, भयानक तथा बीभत्स रस में
श्याम मुख राग की योजना करनी चाहिए ।
इसी प्रकार भाव तथा रस के प्रस्तुत करने में मुख राग की योजना
की जाए ॥ १६०-१६३ ॥
शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तः कृतोऽप्य³भिनयः शुभः ॥ १६३ ॥
मुखरागविहीनस्तु नैव शोभान्वितो भवेत् ।
शारीराभिनयोऽल्पोऽपि मुखरागसमन्वितः ॥ १६४ ॥
१. स्तेनानुसारेण—ख० ग० । २. प्रयोक्तृभिः—ख० ग० ।
३. ह्यभिनयः—ख० ।
३ ना० शा० द्वि०
३४ नाट्यशास्त्रम्
द्विगुणां लभते शोभां रात्राविव निशाकरः ।
नयनाभिनयोऽपि स्यान्नानाभावरसस्फुटः ॥ १६५ ॥
मुखरागान्वितो यस्मान्नाट्यमत्र प्रतिष्ठितम् ।
यथा नेत्रं प्रसपेंत मुखभ्रूदृष्टिसंयुतम् ॥ १६६ ॥
तथा भावरसोपेतं मुखरागं प्रयोजयेत् ।
इत्येष मुखरागस्तु प्रोक्तो भावरसाश्रयः ॥ १६७ ॥
शाखा, अंग तथा उपांग के अभिनय अच्छी प्रकार किये जाने पर
भी यदि वे 'मुखराग' से रहित हो तो उसकी शोभा नहीं होती ।
पर जब शारीराभिनय के अल्प मात्रा में प्रस्तुत करते हुए भी यदि
उसे मुखराग से युक्त रखा जाए तो रात्रि में चन्द्र के समान द्विगुणित
शोभा को प्राप्त करता है ।
नयनाभिनय भी यदि मुखराग से युक्त रहे तो वह अनेक भाव तथा
रसों को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है क्योंकि 'नाट्य' इसी पर निर्भर
है (स्थित है) ।
मुख, भ्रू, दृष्टि आदि से युक्त हो जिस प्रकार नेत्र हों मुखराग भी
उसी प्रकार के भाव तथा रसों से युक्त रखते हुए प्रयुक्त करना चाहिए ।
इस प्रकार मैंने भाव तथा रस का आधारभूत तत्त्व 'मुखराग' का स्वरूप
यहाँ बतलाया ॥ १६३-१६७ ॥
ग्रीवाकर्म—लक्षण तथा योजना—
अतः परं प्रवक्ष्यामि ग्रीवाकर्माणि वै द्विजाः ।
समा नतोन्नता त्र्यस्रा रेचिता कुञ्चिताञ्चिता ॥ १६८ ॥
वलिता च विवृत्ता च ग्रीवा नवविधार्थतः ।
हे मुनिजन ! अब मैं आपको ग्रीवा के कार्य बतलाता हूँ । ये ग्रीवा कर्म
नौ प्रकार के हैं । यथा :—(१) समा, (२) नता, (३) उन्नता, (४) त्र्यस्रा,
(५) रेचिता, (६) कुञ्चिता, (७) अञ्चिता, (८) वलिता, तथा( ९ )
विवृत्ता ॥ १६८–१६६ ॥
समा स्वाभाविकी ध्यानस्वभावजपकर्मसु ॥ १६९ ॥
नता नतास्यालङ्कारबन्धे कण्ठावलम्बने ।
१. भावरसान्वितः—ख० । २. इत्येवं—ख० ।
३. ग्रीवाकर्म द्विजोत्तमाः—ख० । ४. निवृत्ता—ख० ।
अष्टमोऽध्यायः ३५
उन्नताभ्युन्नतमुखी ग्रीवा चोर्ध्वादिदर्शने ॥ १७० ॥
त्र्यस्रा पार्श्वगता ज्ञेया स्कन्धभारे च दुःखिते ।
रेचिता विधुताँ भ्रान्ता भावे मथनवृत्तयोः ॥ १७१ ॥
कुञ्चिताऽकुञ्चिता मूर्ध्नि भारिते गलरक्षणे ।
अपनी सहज अवस्था में विद्यमान ग्रीवा 'समा' कहलाती है, इसकी
योजना ध्यान, सहज भाव तथा जपकर्म में की जाए । यदि ग्रीवा झुकी हो
तो 'नता' कहलाती है, इसकी योजना अलंकारों के धारण करने तथा
किसी व्यक्ति के कण्ठ का सहारा लेने में करना चाहिए ।
ऊपर की ओर चेहरे को उठा कर रखी हुई ग्रीवा 'उन्नता' कहलाती
है । इसे ऊपर की ओर देखने के भाव में प्रयुक्त करना चाहिए ।
यदि ग्रीवा को किसी एक ओर मोड़ा जाए तो यह 'त्र्यस्रा' कहलाती
है । इसकी कन्धों से भार वहन तथा दुःख के प्रदर्शन में योजना की जाए ।
यदि ग्रीवा कम्पित या घूमते हुए रखी जाए तो 'रेचिता' कहलाती
है । इसकी योजना भाव, मथन तथा नृत्त में की जाए ।
यदि मस्तक सहित ग्रीवा को नीचे की ओर झुकाया जाय तो
'कुञ्चिता' कहलाती है । इसकी योजना भारयुक्त होने तथा गले का बचाव
करने में की जाए ॥ १६९-१७२ ॥
अञ्चितापसृतोद्वृद्धकेशौकर्षोर्ध्वदर्शने ५ ॥ १७२ ॥
पार्श्वोन्मुखी स्याद् वलिता ग्रीवाभङ्गे च वीक्षिते ६ ।
विवृत्ताभिमुखीभूता स्वस्थानाभिमुखादिषु ॥ १७३ ॥
यदि ग्रीवा को मस्तक सहित पीछे की ओर मोड़ा जाए तो 'अञ्चिता'
कहलाती है । इसकी योजना ऊपर की ओर लटकने, ( फांसी लगा कर
मरने हेतु ), बालों को खींचने तथा ऊपर देखने में की जाए ।
यदि ग्रीवा चहरे सहित बगल में मोड़ ली जाए तो 'वलिता' कहलाती
है । इसकी योजना ग्रीवा को झुका कर देखने के भाव में की जाए ।
यदि ग्रीवा सामने की ओर स्थित रहे ( अभिमुखीभूता ) तो 'विवृत्ता'
कहलाती है । इसकी योजना अपने उद्दिष्ट स्थान की ओर प्रस्थान करने
में की जाए ॥ १७२-१७३ ॥
१. चोर्ध्वनिवेशने—ख० । २. चैव—ख० ।
३. विधुतभ्रान्ता हावे—ख० । ४. कुञ्चिताकुञ्चिते मूर्ध्नि धारिते—ख, ग० ।
५. केशकर्णोर्ध्वदर्शने—ख०, ग० । ६. वीक्षणे—ख० ।
३६ नाट्यशास्त्रम्
इत्यादिलोकभावार्था ग्रीवोभेदैरनेकधा ।
ग्रीवाकर्माणि सर्वाणि शिरःकर्मानुगानि हि ॥ १७४ ॥
शिरसः कर्मणा कर्म ग्रीवायाः सम्प्रवर्तते ।
इस प्रकार मनुष्यों के भाव तथा व्यवहार आदि के अनुसार ये ग्रीवा
के अनेक भेद बतलाए गये हैं। ये सभी ग्रीवाकर्म मस्तक की क्रिया का
अनुसरण करते हैं और मस्तक के कर्म ग्रीवा के कर्मों से ही प्रवृत्त होते
हैं ॥ १७४-१७५ ॥
इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं शीर्षोपाङ्गसमाश्रयम् ॥ १७५ ॥
अङ्गकर्माणि शेषाणि गदतो मे निबोधत ॥ १७६ ॥
इस प्रकार मैंने मस्तक के उपांगसहित सभी लक्षण बतलाए। अब मैं
शेष अंगों के कर्म तथा लक्षण बतलाता हूँ जिन्हें आप समझिए ॥१७५-१७६॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे उत्तमाङ्गाभिनयो [ उपाङ्गाभिनयो ]
नाम अष्टमोऽध्यायः ।
भरत नाट्यशास्त्र का उत्तमांगाभिनय ( उपांगाभिनय ) नामक
अष्टम-अध्याय समाप्त ।
१. ग्रीवाभङ्गे—ख० ।
नवमोऽध्यायः
एवमेतच्छिरोनेत्रं¹ भ्रूनासोष्ठकपोलजम्² ।
कर्म लक्षणसंयुक्तमुपाङ्गानां मयोदितम् ॥ १ ॥
हस्तो³नान्तु प्रवक्ष्यामि कर्म नाट्यप्रयोजकम् ।
यथा येनाभिनेयश्च गदंतो⁴ मे निबोधत ॥ २ ॥
भरतमुनि बोले—
हे मुनिजन ! अब तक आपको मैंने लक्षणों से युक्त शिर, नेत्र, भौंहें,
नासिका, ओठ एवं कपोल से होनेवाले उपांगों के अभिनय को बतलाया ।
अब मैं हाथों का नाट्यप्रयोगों में होने वाला अभिनय-कार्य—जैसे और
जिस व्यक्ति के द्वारा अभिनीत किया जाए—बतलाता हूँ ॥ १-२ ॥
हस्तोरःपार्श्वजठरकटीजङ्घोरुपादतः ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि विनियोगश्च तत्त्वतः ॥ ३ ॥
अब मैं क्रमशः हाथ, उरःस्थल, पार्श्व, उदर, कटी, जंघा, ऊरू,
(पिंडलियाँ) तथा पैरों के अभिनय कार्य तथा लक्षणों को बतलाता हूँ ॥३॥
हस्तमुद्राएँ—¹
पताकस्त्रिपताकश्च तथा वै कर्तरीमुखः ।
अर्धचन्द्रो ह्यरालश्च शुकतुण्डस्तथैव च ॥ ४ ॥
१. हस्तमुद्राओं के विषय में आचार्यों में अतिशय मतभेद दृष्टिगोचर होता
है तथा नाट्यशास्त्र की कई प्रतियों में उपलब्ध पाठान्तरों के अनुसार भी अनेक
भिन्नताएं दृष्टिगोचर होती हैं। जैसे-सूचीमुख को सूच्यास्य, कांगुलम् को लांगुलम्,
अलपद्मम् को अलपल्लव या उत्पलपद्मम्, उत्पलपदम् इत्यादि । अभिनयदर्पण में
असंयुक्त मुद्राएं २८ तथा ४ पूरक मुद्राओं सहित ३२ मिलती है। इसमें
नाट्य-शास्त्र के अतिरिक्त ये मुद्राएँ हैं—अर्धपताक, मयूर, चन्द्रकला, सिंहमुख,
त्रिशूल, व्याघ्र, अर्धसूची, कंटक तथा पल्ली । (इनमें नाट्यशास्त्र की ऊर्णनाभ मुद्रा
को छोड़ शेष सभी अतिरिक्त मुद्राएँ हैं ।) नाट्यशास्त्र तथा अभिनय-दर्पण की १६
१. इत्येतच्छिरसो नेत्र—क, च्छिरसो नेत्रे, ख–ग० ।
२. कपोलकम्—क० । ३. हस्तादीनां—क० ।
४. तन्मे निगदतः शृणु—ग० ।
३८ नाट्यशास्त्रम्
मुष्टिश्च शिखराख्यश्च कपित्थः कटकामुखः ।
सूच्यास्यः पद्मकोशश्च तथा वै सर्पशीर्षकः ॥ ५ ॥
मृगशीर्षः परो ज्ञेयो हस्ताभिनययोक्तृभिः ।
लाङ्गूलोत्पलपद्मश्च चतुरो भ्रमरस्तथा ॥ ६ ॥
हंसास्यो हंसपक्षश्च सन्दंशो मुकुलस्तथा ।
ऊर्णनाभस्ताम्रचूडश्चतुर्विंशतिरीरिताः ॥ ७ ॥
असंयुता संयुताश्च गदतो मे निबोधत ।
अञ्जलिश्च कपोतश्च कर्कटः स्वस्तिकस्तथा ॥ ८ ॥
कटकावर्धमानश्च ह्युत्सङ्गो निषधस्तथा ।
दोलः पुष्पपुटश्चैव तथा मकर एव च ॥ ९॥
मुद्राएँ ही समान हैं परन्तु इन मुद्राओं के अभिनय-दर्पण में जहाँ नाम समान है
तो लक्षण भिन्न हैं । ये हैं—कर्तरीमुख, कटकामुख, सूचीमुख, हंसमुख, (हंसास्य )
मृगशीर्ष, सन्दंश तथा ताम्रचूड़ । इस प्रकार यहाँ संयुक्त और असंयुक्त हस्तमुद्राओं
के विषय में संक्षेप में बतलाया गया है । विशेष विवेचन के लिए परिशिष्ट देखिये ।
नाट्यशास्त्र में हस्तमुद्राओं का कुलयोग ६४ बतलाया गया है परन्तु हैं
वे ६७ तथा भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित भी और ये (नाट्यशास्त्र में) भरतमुनि
सम्मत ही मुद्राएँ निरूपित भी की गयी हैं । इस संख्या का उल्लेख श्रीकण्ठकृत
रसमंजरी में (इस प्रकार) किया गया है :—'एतेऽभिनयहस्ताः स्युः सप्तत्रिंश-
न्मुनेर्मताः' (रसमंजरी ms—पत्र ६४ B. O. R. I. Poona )
हस्तमुद्राएं (विशेष)—मुद्रा का स्वरूप तथा उसका विनियोग नाट्यशास्त्र
में सलक्षण दिया गया है। इसके अतिरिक्त भी इन मुद्राओं के द्वारा अनेक अर्थ
सूचित किये जा सकते हैं जिनका आगे चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र अध्याय २६)
में वर्णन हैं। कुछ अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में मूल मुद्राओं की उद्भव कथाएं तथा
रस के समान इन मुद्राओं का भी वर्ण (रंग) जाति तथा अधिदेवता भी
बतलायी गयी हैं। इन उल्लेखों से आचार्यों के नृत्य-शास्त्र में सौन्दर्य-पूर्ण सूक्ष्म
तथा संशोधकदृष्टि के दर्शन सहज प्राप्य हैं। अभिनय-दर्पण आदि ग्रन्थों के द्वारा
प्रदर्शित विभिन्न अर्थों को (जो नाट्यशास्त्र में नहीं दर्शाये गए) हमने परिशिष्ट
में बतलाने का उद्योग किया है। यह विषय विस्तृत तथा अध्ययन सापेक्ष है।
१. खटकामुखः—क-ख० । २. पद्यार्धमेतत् क-पुस्तके नास्ति ।
३. काङ्गूलकोत्पलपद्मश्च—क० । ४. खटका—क० ।
नवमोऽध्यायः ३९
गजदन्तोऽवहित्थश्च वर्धमानस्तथैव च।
एते तु संयुता हस्ता मया प्रोक्तास्त्रयोदश ॥ १० ॥
असंयुक्त हस्तमुद्राएं २४ हैं। जिनके नाम हैं—( १ ) पताक, ( २ )
यहाँ केवल उनकी मुद्रा, जाति, वर्ण तथा देवता दिये जा रहे हैं। प्रत्येक मुद्रा की
उत्पत्तिकथा उस मुद्रा के लक्षण के नीचे पाद टिप्पणी में दे दी गई है तथा इसी
कारण इस अध्याय में टिप्पणियाँ भी संक्षिप्त ही रखी हैं।
मुद्रानाम देवता जाति वर्णं
( १ ) पताक ब्रह्मा ब्राह्मण श्वेत
( २ ) त्रिपताक शिव क्षत्रिय रक्त
( ३ ) कतरीमुख चक्रपाणि-विष्णु क्षत्रिय ताम्र
( ४ ) अर्धचन्द्र महादेव वैश्य धूम्र
( ५ ) अराल वासुदेव मिश्र रक्त
( ६ ) शुकतुण्ड मरीचि ब्राह्मण रक्त
( ७ ) मुष्टि चन्द्र शूद्र नील
( ८ ) शिखर कामदेव गान्धर्व धूलियाँ
( ९ ) कपित्थ पद्मगर्भ-विष्णु ऋषि श्वेत
( १० ) कटकामुख रघुराम देव ताम्र
( ११ ) सूचीमुख विश्वकर्मा देव श्वेत
( १२ ) पद्मकोष भार्गव यक्षकिन्नर श्वेत
( १३ ) सर्पशीर्ष शिव देव पीत
( १४ ) मृगशीर्ष महेश्वरशिव ऋषि श्वेत
( १५ ) कंगुल पद्म सिद्ध सुवर्ण
( १६ ) अलपद्म सूर्य गान्धर्व धूलि
( १७ ) चतुर सूर्य मिश्र धूलि
( १८ ) भ्रमर गरुड मिश्र घन (काला)
( १९ ) हंसास्य ब्रह्मा मिश्र श्वेत
( २० ) हंसपक्ष कामदेव अप्सरा नील
( २१ ) सन्दंश वाल्मीकि विद्याधर श्वेत
( २२ ) मुकुल चन्द्र संकीर्ण श्वेत
( २३ ) ऊर्णनाभ इन्द्र देव श्वेत
( २४ ) ताम्रचूड कूर्मावतार क्षत्रिय रक्त
४० नाट्यशास्त्रम्
त्रिपताक, ( ३ ) कर्तरीमुख, ( ४ ) अर्धचन्द्र, ( ५ ) अराल, ( ६ ) शुकतुण्ड,
( ७ ) मुष्टि, ( ८ ) शिखर, ( ९ ) कपित्थ, ( १० ) कटकामुख, ( ११ ) सूच्यास्य,
( सूचीमुख ), ( १२ ) पद्मकोष, ( १३ ) सर्पशीर्ष, ( १४ ) मृगशीर्ष, ( १५ )
कांगुल, ( १६ ) अलपद्म, ( १७ ) चतुर, ( १८ ) भ्रमर, ( १९ ) हंसास्य,
( २० ) हंसपक्ष, ( २१ ) सन्दंश, ( २२ ) मुकुल, ( २३ ) ऊर्णनाभ तथा
( २४ ) ताम्रचूर्ण ।
संयुक्त हस्तमुद्राएं तेरह हैं। जिनके नाम हैं—( १ ) अंजलि, ( २ )
कपोत, ( ३ ) कर्कट, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ ) कटकावर्धमानक, ( ६ ) उत्संग,
( ७ ) निषध, ( ८ ) दोला, ( ९ ) पुष्पपुट, ( १० ) मकर, ( ११ ) गजदन्त,
( १२ ) अवहित्थ तथा ( १३ ) वर्धमान ॥ ४-१० ॥
नृत्तहस्तानतश्चोध्र्वं गदतो मे निबोधत ।
चतुरस्रौ तथोद्वृत्तौ तथा तलमुखौ स्मृतौ ॥ ११ ॥
स्वस्तिकौ विप्रकीर्णौ चाप्यरालकटकामुखौ ।
आविद्धवक्रौ सूच्यास्यौ रेचितावर्द्धरेचितौ ॥ १२ ॥
उत्तानवञ्चितौ चैव पल्लवौ च तथा करौ ।
नितम्बौवापि विज्ञेयौ केशबन्धौ तथैव च ॥ १३ ॥
लतारख्यौ च तथा प्रोक्तौ करिहस्तौ तथैव च ।
पक्षवञ्चितकौ चैव पक्षप्रद्योतकौ तथा ।
ज्ञेयौ गरुडपक्षौ च दण्डपक्षकावतः परम् ॥ १४ ॥
ऊर्ध्वमण्डलिनौ चैव पार्श्वमण्डलिनौ तथा ।
उरोमण्डलिनौ चैव उरःपार्श्वार्धमण्डलौ ॥ १५ ॥
मुष्टिकस्वस्तिकौ चापि नलिनीपद्मकोशकौ ।
अलंपल्लवोल्बणौ च ललितौ वलितौ तथा ॥ १६ ॥
अब मैं नृत्तहस्त बतलाता हूँ। इन नृत्तहस्तों के ३० प्रकार हैं—
( १ ) चतुरस्र, ( २ ) उद्वृत्त, ( ३ ) तलमुख, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ )
विप्रकीर्ण, ( ६ ) अरालकटकामुख, ( ७ ) आविद्धवक्र, ( ८ ) सूच्यास्य,
१. प्यारालखटकामुखौ—क०-ख० । २. अविद्धव—ख० ।
३. उत्तानावाञ्चितौ—ख०-ग० । ४. नितम्बौ चापि—ग० ।
५. सम्प्रोक्तौ करिहस्तौ च लतारख्यौ च तथैव च—ग० ।
६. हंसपक्षौ तथैव च—ख०, ग० । ७. मण्डले—ख०, ग० ।
८. मुष्टिकः स्वस्तिकश्चापि—ख० । ९. अलपद्मौल्बणौ चापि—ग० ।
नवमोऽध्यायः ४१
(९) रेचित, (१०) अर्धरेचित, (११) उत्तानवञ्चित, (१२) पल्लव,
(१३) नितम्ब, (१४) केशबन्ध, (१५) लता, (१६) करिहस्त,
(१७) पक्षवंचितक, (१८) पक्षप्रद्योतक, (१९) गरुड़पक्ष, (२०) दण्डपक्ष,
(२१) ऊर्ध्वमण्डलिन्, (२२) पार्श्वमण्डलिन् (२३) उरोमण्डली,
(२४) उरःपार्श्वमण्डली, (२५) मुष्टिकस्वस्तिक, (२६) नलिनीपद्मकोष,
(२७) अलपल्लव, (२८) उल्बण, (२९) ललित, तथा (३०)
वलित ॥ ११-१६ ॥
चतुष्षष्टिकरा ह्येते नामतोऽभिहिता मया ।
यथालक्षणमेतेषां कर्माणि च निबोधत ॥ १७ ॥
इस प्रकार मैंने चौसठ हस्तमुद्राओं के नाम बतलाए । अब मैं इनके
लक्षणों तथा तदनुरूप कर्मों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
असंयुत—हस्तमुद्राएं ( लक्षण तथा योजना )—
पताक—
प्र²सारिताः समाः सर्वाः यस्याङ्गुल्यो³ भवन्ति हि ।
कुञ्चितश्च तथाङ्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः ॥ १८ ॥
सभी उंगलियों को फैलाकर यदि अंगूठे की तिरछा (कुञ्चित) कर दे
और उसे तर्जनी के मूल में लगा दे तो ‘पताक’ हस्त-मुद्रा होती है ॥१८॥
एष प्रहारपाते प्र⁴तापने नोदने प्रहर्षे च ।
गर्वे⁵ऽप्यहमिति तज्ज्ञैर्ललाटदेशोत्थितः कार्यः ॥ १९ ॥
योजना—प्रहार (चोट) करने, (शीतनिवारण हेतु आग)
तापने, प्रेरणा देने, हर्ष तथा गर्व बतलाने में पताकमुद्रायुक्त हाथ को
ललाट प्रदेश से उठाते हुए रखना चाहिए ॥ १९ ॥
१. पताक—(उत्पत्ति कथा)—यह मुद्रा प्राचीन मूर्तियों में अभय मुद्रा के
रूप में दिखाई देती है। शास्त्र में इस मुद्रा के स्रष्टा ब्रह्मा जी हैं। एक बार सृष्टि
के उत्पादक ब्रह्मा परब्रह्म (विष्णु) के समीप गये तथा जय घोष के साथ उनकी
वन्दना की। इस समय उनके हाथ ने सहसा पताक (ध्वज) के आकार को
धारण कर लिया, तभी से इसकी पताक हस्त के रूप में प्रसिद्धि है।
१. अथ लक्षणमेतेषां—ग०। २. प्रसारिताग्राः सहिताः—ख०, ग०।
३. यस्याङ्गुल्यौ—क०। ४. प्रकोपने—क०।
५. गर्वेष्वह—क०।
४२ नाट्यशास्त्रम्
एषोऽग्निवर्षधारानिरूपणे पुष्पवृष्टिपतने च ।
संयुक्तकरणः कार्यः प्रविरलचलिताङ्गुलीर्हस्तः ॥ २० ॥
यदि पताक-मुद्रा-युक्त दोनों हाथों को रखकर अंगुलियों को घुमाए तो
उनके द्वारा वर्षा, पुष्पवृष्टि और (उग्रकम्पन द्वारा) अग्नि की ताप (या
ज्वालाएँ) बतलाई जाती है ॥ २० ॥
स्वस्तिकविच्युतिकरणात् पल्लैवपुष्पोपहारशष्पाणि ।
विरचितमुर्वीसंस्थं यद्द्द्रव्यं तच्च निर्दिश्यम् ॥ २१ ॥
यदि पताक मुद्रा वाले दोनों हाथों से स्वस्तिक करते हुए उसे हटा
लिया जाए तो उसके द्वारा पल्लव एवं पुष्पों का उपहार, लहलहाता घास
तथा पृथ्वी पर स्थित किये हुए (बलि आदि) पदार्थों को बतलाया जाता
है ॥ २१ ॥
स्वस्तिकविच्युतिकरणात् पुनरेवाधोमुखेन कर्तव्यम् ।
संवृतविवृतं पाल्यं छन्नं निबिडञ्च गोप्यञ्च ॥ २२ ॥
यदि हाथों को स्वस्तिक
नवमोऽध्यायः ४३
ऊँचाई (प्रांशु) (मृदङ्ग या) ढोल का पीटना तथा पक्षी का उड़ना (पक्षियों
द्वारा पंखों को फड़फड़ाना या ऊपर उठाना ) बतलाया जाता है ॥ २४ ॥
परिघृष्टतलस्थेन तु धौतं मुदितं प्रमृष्टपिष्टे च ।
पुनरेव शैलधारणमुद्घाटनमेव चाभिनयेत्² ॥ २५ ॥
इसी मुद्रा में यदि दोनों हाथों को परस्पर मसला जाए तो उनके द्वारा
धोना, मसलना, मांजना, गूथना, पीसना, पर्वत को उठाना या उखाड़ना
आदि भाव बतलाया जाता है ॥ २५ ॥
एवमेष³ प्रयोक्तव्यः स्त्रीपुंसाभिनये करः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि त्रिपताकस्य लक्षणम् ॥ २६ ॥
स्त्री तथा पुरुष पात्र के द्वारा इसी प्रकार इस मुद्रा का प्रयोग किया
जाए । अब मैं 'त्रिपताक' मुद्रा का लक्षण कहता हूँ ॥ २६ ॥
'त्रिपताक—
पताके तु यदा वक्रानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
त्रिपताक
४४ नाट्यशास्त्रम्
प्रवेश, उत्नामन (ऊपर चढ़ाना), प्रणाम, तुलना करना (निदर्शन),
वैकल्पिक-कथन (विविध-वचन) मांगलिक वस्तुओं का स्पर्श तथा मस्तक
पर धारण, पगड़ी या मुकुट का धारण तथा नासिका, मुख एवं कानों का
ढकना बतलाया जाता है ॥ २८-२९ ॥
अस्यैव चाङ्गुलीभ्यामधोमुखप्रस्थितोत्थितचलाभ्याम् ।
लघुखगपतनस्रोतोभुजङ्गभ्रमरादिकान् कुर्यात् ॥ ३० ॥
यदि इसी मुद्रा से युक्त दोनों हाथों को नीचे की ओर जाने तथा ऊपर
उठने वाली अंगुलियों वाला रखे तो इनके द्वारा छोटे पक्षियों का पतन,
स्रोत, सर्प तथा भ्रमर आदि बतलाए जाते हैं ॥ ३० ॥
अश्रुप्रमार्जनं तिलकविरचनं रोचनालभनकञ्च ।
५त्रिपताकानामिकयोः स्पर्शनमलकस्य कर्तव्यम् ॥ ३१ ॥
त्रिपताकमुद्रावाले हाथ में अनामिका के स्पर्श द्वारा आंसुओं का
पोंछना, तिलक करना, गोरोचना का तिलक आदि के लिए ग्रहण करना,
पत्रलेखा रचना (जो कि भुजाओं तथा वक्षःस्थल पर की जाती है) और
अलक स्पर्श बतलाया जाता है ॥ ३१ ॥
स्वस्तिकौ त्रिपताकौ तु गुरूणां पादैर्वन्दने ।
परस्पराग्रसंश्लिष्टौ कार्यावुद्वाहदर्शने ॥ ३२ ॥
यदि त्रिपताक हाथ स्वस्तिक दशा में रहें तो उससे गुरुजन के चरण-
स्पर्श तथा स्वस्तिक दशा युक्त होकर एक दूसरे के कोनों को छूते हों तो
उससे विवाह बतलाया जाता है ॥ ३२ ॥
वियुतौ चलितावस्थौ कर्तव्यौ नृपदर्शने ।
तिर्यक्स्वस्तिकसम्बद्धौ स्यातां तौ ग्रहदर्शने ॥ ३३ ॥
यदि इसी अवस्था वाले हाथ एक दूसरे से हटते हुए तथा धूजते हुए
१. मुखप्रस्थितौ—ग० ।
२. लघुवटपवन—क, लघुमुखपवनस्रोतो—ख० । लघुचटपवन—ग० ।
३. भुजगतभ्रमणादिकान्—ग० ।
४ अश्रुप्रमार्जनतिलकविरोचनलोचनालभनकं च—ग० ।
५. त्रिपताकानामिकया दर्शनमलकस्य कार्यञ्च—ग० ।
६. 'स्वस्तिकौ त्रिपताकावि'त्यारभ्य 'याने नृणां प्रयोक्तभि'रित्यन्तं श्लोकषट्कं
ग—पुस्तके नास्ति । ७. वन्दनम्—ख० ।
नवमोऽध्यायः ४५
रखे जाएँ तो उनके द्वारा राजा का दर्शन बतलाते हैं और यदि ये स्वस्तिक दशा
में तिरछे रखें जाएं तो इनके द्वारा 'ग्रहों' के दर्शन बतलाए जाते हैं ॥३३॥
तपस्विदर्शने कार्यावूर्ध्वौ चापि पराङ्मुखौ ।
परस्पराभिमुखौ च कर्तव्यौ द्वारदर्शने ॥ ३४ ॥
यदि त्रिपताक मुद्रावाले हाथ ऊपर की ओर उठे तथा उनको फिर पीछे
की ओर रखा जाए तो उससे तपस्विजन का दर्शन बतलाया जाता हैं।
और यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखें जाए तो उनसे द्वार का
स्वरूप या दर्शन बतलाया जाता है ॥ ३४ ॥
उत्तानाधोमुखौ कार्यावग्रे वक्त्रस्य संस्थितौ ।
वडवानलसङ्ग्रामे मकराणाञ्च दर्शने ॥ ३५ ॥
यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखकर फिर (उंगुलियों को
हिलाते हुए) नीचे की ओर मुंह वाले (मिलाकर) किये जाएँ तो उससे
बडवानल, संग्राम तथा मकर की अभिव्यक्ति होती है ॥ ३५ ॥
अभिनेयास्त्वनेनैव वानरप्लवनोर्मयः ।
पवनश्च स्त्रियश्चैव नाट्ये नाट्यविचक्षणैः ॥ ३६ ॥
और नाट्यविद् आचार्यों के मत में इसी हस्तमुद्रा के द्वारा वानर का
उछलना, लहरें, पवन तथा स्त्रियों को भी बतलाया जाता है ॥ ३६ ॥
सम्मुखँप्रसृताङ्गुष्ठः कार्यों बालेन्दुदर्शने ।
पराङ्मुखस्तु कर्तव्यो याने नृणां प्रयोक्तृभिः ॥ ३७ ॥
यदि इसी मुद्रावाले हाथ को सम्मुख रखते हुए अँगूठे को फैला दे तो
उससे बालचन्द्र तथा यदि इसी हाथ को पीछे की ओर मोड़ लिया जाए तो
उससे (शत्रु के विरुद्ध) राजा की चढ़ाई (यान) बतलाई जाती है ॥ ३७ ॥
१कर्तरीमुख—
त्रिपताके यदा हस्ते भवेत् पृष्ठावलोकिनी ।
तर्जनी मध्यमायाश्च तदासौ कर्तरीमुखः ॥ ३८ ॥
१. कर्तरीमुख (उत्पत्ति कथा) इस हस्त के सृष्टा शिव हैं। जब भगवान
शिव ने अन्धकासुर का उच्छेद करने के लिए इस हस्तमुद्रा में पृथ्वी पर एक
चक्कर लगाया तभी से इसका प्रचलन हो गया।
१. कार्यों चोर्ध्वौ चापि—ख०। २. चैव—ख०। ३. च कुस्य—ख०।
४. सङ्क्रामे ख०। ५. पततश्च—ख०। ६. तन्मुख—ख०।
४६ नाट्यशास्त्रम्
यदि त्रिपताक मुद्रा वाले हाथ में तर्जनी अंगुली मध्यमा के पीछे फैला-
कर रखी जाए (या झुकायी जाए) तो 'कर्तरीमुख' मुद्रा कहलाती है ॥३८॥
पथि¹ चरणरचनरञ्जनरङ्गणकरणान्यधोमुखेनैव ।
ऊर्ध्वमुखेन तु कुर्याद् दष्टं शृङ्गञ्च लेख्यञ्च ॥ ३९ ॥
योजना—यदि कर्तरीमुख मुद्रावाला हाथ नीचे मुंहवाला रखते हुए
रखा जाए तो उसके द्वारा मार्ग में पैर रखना, पैरों को अलंकृत या रंजित
करना, रांगोली रचना करना (रंगण-रंगवल्ली का निर्माण अथवा बालकों का
रेंगना) बतलाया जाता है। यदि ऊंचे मुंह वाला होकर यही हाथ रहे तो
उससे दंशन, शृङ्ग बजाना तथा चित्र लेखन कर्म बतलाया जाता है ॥३९॥
पतनमरणव्यतिक्रमपरिवृत्तवितर्कितं तथा न्यस्तम् ।
भिन्नवलितेन कुर्यात् कर्त्यास्याङ्गुली²मुखेन ॥ ४० ॥
और यदि इसी मुद्रा को नीचे की ओर झुकाया या रखा जाए तथा
अंगुलियां भिन्न २ दिशाओं में घूमने लगे तथा मध्यमांगुलि पीछे की ओर
झुकी रहे तो इसके द्वारा पतन, मरण, अपराध (व्यतिक्रम), पराङ्मुखी
भवन, तर्क करना तथा धरोहर को रखना बतलाया जाता है ॥ ४० ॥
संयु³क्तकरणो वा स्यादसंयुतो वा प्रयुज्यते तज्ज्ञैः ।
रुरु-चमरमहिषसुरगजवृषगोपुरशैलशिखरेषु ॥ ४१ ॥
और यदि दो कर्तरीमुख हस्तोँ या एक कर्तरीमुख हस्त का प्रयोग किया
जाए तो इनके द्वारा रूरूमृग, चमरी गाय, महिष, ऐरावत हाथी, वृषभ,
गोपुर तथा शैलशिखर (जैसे पदार्थ) का भाव प्रदर्शित किया जाता है ॥४१॥
¹अर्धचन्द्रः—
यस्याङ्गुल्यस्तु विनताः सहाङ्गुष्ठेन चाप⁴वत् ।
सोऽर्धचन्द्र इति ख्यातः करः कर्मास्य वक्ष्यते ॥ ४२ ॥
यदि अंगुलियों को अंगूठे सहित धनुष जैसी झुका कर फैला दी जाए
१. अर्धचन्द्र (उत्पत्ति कथा) नटराज शिव ने अलंकार धारण करने की
इच्छा से अर्धचन्द्र को जब मस्तक पर धारण किया तो इसी धारण करने के
समय से इस मुद्रा का उद्भव हुआ।
१. पथिक—ख० । २. स्याङ्गुलीययुग्मेन—ख०, ग० ।
३. एष श्लोकः खपुस्तके नास्ति । ४. चापरम्—ग० ।
नवमोऽध्यायः ४७
तो 'अर्धचन्द्र' मुद्रा कहलाती है। अब मैं इससे होने वाले कार्य बतलाता
हूँ ॥ ४२ ॥
एतेन बालतरवः शशिलेखा कम्बुकलशवलयानि ।
निर्घाटेन¹मायस्तं मध्यौपम्यञ्च पीनञ्च ॥ ४३ ॥
योजना—इसके द्वारा छोटे वृक्ष, चन्द्रलेखा, शंख, कलश, कंकण
(कटक), बाहर ढकेलना (निर्घाटन), परिश्रम (आयस्त), कृशता
(जो कि कटिप्रदेश की तुलना में निर्देशित की जाती हो) तथा पीनता
(मोटाई) बतलाए जाते हैं ॥४३ ॥
रशना²जघनकटीनामाननतलपत्रकुण्डलादीनाम् ।
कर्तव्यो नारीणामभिनययोगोऽर्धचन्द्रेण ॥ ४४ ॥
इस अर्धचन्द्र हस्त के द्वारा स्त्रियों की करधनी (रशना), जंघा,
कटि, चेहरा (आनन), तलपत्र (अलंकार विशेष जो कि कानों में धारण
किया जाता है) तथा कुण्डल का अभिनय प्रस्तुत करना चाहिए ॥ ४४ ॥
अराल¹—
आद्या धनुर्नता³ कार्या कुञ्चितो⁴ऽङ्गुष्ठकस्तथा ।
शेषा भिन्नोर्ध्ववलिता ह्यराले⁵ऽङ्गुलयः करे ॥ ४५ ॥
यदि तर्जनी अंगुली झुकी हुई, अंगूठा (उसे मिलाने को) सिकुड़ा
हुआ तथा शेष उंगलियां उससे पृथक् तथा ऊपर की ओर खड़ी रखी जाए
तो 'अराल' मुद्रा जानों ॥ ४५ ॥
एतेन सत्त्वशौण्डीर्यवीर्यकान्तिधृतिदिव्यगाम्भीर्यम् ।
आशीर्वादाश्च तथा भावा⁶ हितसंज्ञकाः कार्याः ॥ ४६ ॥
योजना—इसके द्वारा सत्व, (स्थैर्य) गर्व, पराक्रम (वीर्य), शोभा
(कान्ति) धृति, दिव्य-वस्तु, गाम्भीर्य, आशीर्वाद देना तथा इसी प्रकार
के अन्य सुखप्रद भावों को बतलाया जाता है ॥ ४६ ॥
१. अराल (उत्पत्ति कथा) अगस्त ऋषि ने समुद्रपान के समय इसी मुद्रा
का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१ निघटनं—ग० । २. रसना—ग० । ३. धनुर्लता—ख० ।
४. कुञ्चिता--ख० । ५. ह्यरालाङ्गुलयः स्मृताः--ग० ।
६. भावाभिनयसंज्ञकाः कार्याः-ग० ।
४८ नाट्यशास्त्रम्
एतेन पुनः स्त्रीणां केशानां सङ्ग्रहंस्तथोत्कर्षः ।
सर्वाङ्गिकं तथैव च २ निर्वर्णनमात्मनः कार्यम् ॥ ४७ ॥
कौतुकविवाहयोगैः प्रदक्षिणेनैव सम्प्रयोगश्च ।
अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगान्परिमण्डलेनैव ॥ ४८ ॥
प्रादक्षिणयं परिमण्डलञ्च कुर्यान्महाजनश्चैव ।
यच्च महीतलनिहितं द्रव्यं तच्चाभिनेयं स्यात् ॥ ४९ ॥
तथा स्त्रियों का केश सम्मार्जन और उनका फैलाना (उत्कर्षः विकीर्ण-
तापादनम् अभि० भा०) तथा अपने सम्पूर्ण शरीर को ध्यान पूर्वक देखना
दो अराल हस्तो के अंगुलियों के अग्रभागों के स्पर्श द्वारा बतलाया जाए।
इसी में एक थोल घुमाव देने पर विवाह के पूर्व होने वाले भंवरों का
विधान (कौतुक-विवाह योग) तथा दोनों वर वधू के हाथों का
मिलाप बतलाया जाता है और इसी हस्त के द्वारा प्रदक्षिणा, गोल वस्तु
(परिमण्डल), जन कोलाहल तथा पृथ्वी में स्थित वस्तु (या पृथ्वी
पर सजाई गई वस्तुएं) भी बतलाई जाती है ॥ ४७-४९ ॥
आह्वानञ्च निवारणनिर्माणे चाप्यनेकवचः ।
स्वेदस्य चापनयने गन्धाघ्राणे शुभैः शुभे चैव ॥ ५० ॥
तथा किसी व्यक्ति को बुलाना, रोकना, उदय होना, अनेक बातें
बतलाना, (कहना) पसीने का पोंछना मीठी सुगन्ध लेना तथा शुभावह
कार्य भी इसी मुद्रा के द्वारा बतलाए जाते हैं ॥ ५० ॥
त्रिपताकहस्तजानि तु पूर्वे यान्यभिहितानि कर्माणि ।
तानि त्वरालियोगात् स्त्रीभिः सम्यक् प्रयोज्यानि ॥ ५१ ॥
त्रिपताक मुद्रा द्वारा (जिन कार्यों का पहिले प्रदर्शन बतलाया गया
वे सभी कार्य स्त्रियों के द्वारा अराल मुद्रा से भी प्रदर्शित किये जा
सकते हैं ॥ ५१ ॥
१. सङ्ग्रहोत्कर्षौ--ग० । २. निर्वहण--ग० । ३. योगं--ख० ।
४. प्रदक्षिणे नैव सम्प्रयोगश्च--ख०, ग० । ५. यत्र--क० ।
६. आवाहने निवापे निन्दाद्याक्षेपवचने च-ख०; आवाहननिर्वाहणनिर्माणे-
क०, ख० । ७. शुभा चैव हि--ग० ।
८. त्वरानुयोगात्--ख० ।
नवमोऽध्यायः ४९
शुकतुण्डे¹—
अरालस्य यदा वक्रानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
शुकतुण्डस्तु स करः कर्म चास्य निबोधत ॥ ५२ ॥
यदि अरालमुद्रायुक्त हाथ में अनामिका अंगुली को टेढ़ा कर (झुका)
लिया जाए तो 'शुकतुण्ड' मुद्रा बन जाती है ॥ ५२ ॥
एतेन त्वभिनेयं नाहं न त्वं न कृत्यमिति चार्थे ।
आवाहने विसर्गे धिगिति च वचने सावज्ञम् ॥ ५३ ॥
योजना—इसके द्वारा 'मैं इसे नहीं···तुम इसे नहीं तथा यह किये
जाने योग्य नहीं' इन अर्थों को और, आवाहन, बिदाई ( विसर्ग ) तथा
अवज्ञापूर्वक धिक्कारना ( आदि अर्थ ) बतलाए जाते हैं ॥ ५३ ॥
मुष्टि²—
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य तलम¹ध्येऽग्रसंस्थिताः ।
तासामुपरि चाङ्गुष्ठः स मुष्टिरिति संज्ञितः ॥ ५४ ॥
यदि सारी अंगुलिय । हथेली में बाँध दी जाएँ और अंगूठे को ऊपर
रख ले तो 'मुष्टि' मुद्रा कहलाती है ॥ ५४ ॥
एष प्रहारे व्यायामे निर्गमे पीडने² तथा ।
संवाहनेऽसियष्टीनां दण्डे³कुन्तग्रहे तथा ॥ ५५ ॥
योजना—इसके द्वारा प्रहार, व्यायाम, निर्गम, पीड़न ( किसी पशु
के थन से दूध निकालने ), मिट्टी तथा डण्डे और भाले को ग्रहण करने
( आदि ) का अभिनय किया आता है ।
१. शुकतुण्ड ( उत्पत्ति कथा ) इस मुद्रा की प्रसू गौरी हैं । शंकर के साथ
प्रणय-कलह के समय इसी हस्त का उनके द्वारा उपयोग किया गया था । तभी
से इसका प्रचलन हो गया ।
२. मुष्टि ( उत्पत्ति कथा ) मधुराक्षस के वध के समय भगवान विष्णु ने
इसी मुद्रा का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
१. तलमाध्यग्रसंस्थिताः—ख० । २. हस्तपीडने—ख० ग० ।
३. कुन्तदण्ड—ग० ।
४ ना० शा० द्वि०
५० नाट्यशास्त्रम्
शिखरे—
अस्यैव च यदा मुष्टेरूर्ध्वोऽङ्गुष्ठः प्रयुज्यते ।
हस्तः स शिखरो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ५६ ॥
यदि मुष्टि हस्त में अंगूठे को ऊपर सीधा उठा लिया जाए तो 'शिखर'
मुद्रा कहलाती है ॥ ५६ ॥
रश्मिकुशाङ्कुशधनुषां तोमरशक्तिप्रमोक्षणे चैव ।
अधरोष्ठपादरञ्जनमलके²भ्योत्क्षेपणे चैव ॥ ५७ ॥
योजना—( धनुष की ) डोरी, दर्भ, अंकुश, धनुष इत्यादि धारण करने,
शक्ति और तोमर अस्त्र को छोड़ने, ओष्ठ ( अधरोष्ठ ) तथा पैरों को रंगने
तथा बालों को झाड़ने ( या कंघा करने ) का इस मुद्रा द्वारा अर्थ सूचित
होता है ॥ ५७ ॥
कपित्थे—
अस्यैव शिखराख्यस्य पृष्ठे³ङ्गुष्ठकनिपीडिता ।
यदा⁴ प्रदेशिनी वक्रा स कपित्थस्तदा स्मृतः ॥ ५८ ॥
यदि शिखर हस्त में तर्जनी अंगुली को झुका कर अंगूठे पर दबा कर
रख दी ( मिला दी ) जाए तो 'कपित्थ' मुद्रा कहलाती है ॥ ५८ ॥
असिचापचक्रतोमरकुन्तगदाशक्तिवज्रबाणानि ।
शस्त्राण्यभिनेयानि तु कार्यं पथ्यञ्च सत्यञ्च ॥ ५९ ॥
योजना—तलवार, धनुष, चक्र, तोमर, कुन्त ( भाला ), गदा, शक्ति,
वज्र तथा बाण को छोड़ने और सत्य तथा हितकर ( पथ्य ) कार्य करने
का अर्थ इस मुद्रा के द्वारा सूचित होता है ॥ ५९ ॥
१. शिखर (उत्पत्ति कथा) चन्द्रशेखर शिव द्वारा सुमेरुपर्वत को समुद्रमन्थन के
लिए उखाड़ने में इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
२. कपित्थ ( उत्पत्ति कथा ) समुद्रमन्थन के अवसर पर विष्णु के द्वारा
मन्दारवृक्ष को खींचकर निकालने में इसी हस्त का उपयोग किया गया था ।
तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. प्रमोक्षणाञ्चैव--ख० ग० ।
२. अलक्तकोत्पीडने चैव--क० । ३. मुखेऽङ्गुष्ठनिपीडिता--ख० ।
४. प्रदेशिनी च वक्रा स्यादिति हस्तः कपित्थकः--क० ।