नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ नाट्यशास्त्रम्
प्रवेश, उत्नामन (ऊपर चढ़ाना), प्रणाम, तुलना करना (निदर्शन),
वैकल्पिक-कथन (विविध-वचन) मांगलिक वस्तुओं का स्पर्श तथा मस्तक
पर धारण, पगड़ी या मुकुट का धारण तथा नासिका, मुख एवं कानों का
ढकना बतलाया जाता है ॥ २८-२९ ॥
अस्यैव चाङ्गुलीभ्यामधोमुखप्रस्थितोत्थितचलाभ्याम् ।
लघुखगपतनस्रोतोभुजङ्गभ्रमरादिकान् कुर्यात् ॥ ३० ॥
यदि इसी मुद्रा से युक्त दोनों हाथों को नीचे की ओर जाने तथा ऊपर
उठने वाली अंगुलियों वाला रखे तो इनके द्वारा छोटे पक्षियों का पतन,
स्रोत, सर्प तथा भ्रमर आदि बतलाए जाते हैं ॥ ३० ॥
अश्रुप्रमार्जनं तिलकविरचनं रोचनालभनकञ्च ।
५त्रिपताकानामिकयोः स्पर्शनमलकस्य कर्तव्यम् ॥ ३१ ॥
त्रिपताकमुद्रावाले हाथ में अनामिका के स्पर्श द्वारा आंसुओं का
पोंछना, तिलक करना, गोरोचना का तिलक आदि के लिए ग्रहण करना,
पत्रलेखा रचना (जो कि भुजाओं तथा वक्षःस्थल पर की जाती है) और
अलक स्पर्श बतलाया जाता है ॥ ३१ ॥
स्वस्तिकौ त्रिपताकौ तु गुरूणां पादैर्वन्दने ।
परस्पराग्रसंश्लिष्टौ कार्यावुद्वाहदर्शने ॥ ३२ ॥
यदि त्रिपताक हाथ स्वस्तिक दशा में रहें तो उससे गुरुजन के चरण-
स्पर्श तथा स्वस्तिक दशा युक्त होकर एक दूसरे के कोनों को छूते हों तो
उससे विवाह बतलाया जाता है ॥ ३२ ॥
वियुतौ चलितावस्थौ कर्तव्यौ नृपदर्शने ।
तिर्यक्स्वस्तिकसम्बद्धौ स्यातां तौ ग्रहदर्शने ॥ ३३ ॥
यदि इसी अवस्था वाले हाथ एक दूसरे से हटते हुए तथा धूजते हुए
१. मुखप्रस्थितौ—ग० ।
२. लघुवटपवन—क, लघुमुखपवनस्रोतो—ख० । लघुचटपवन—ग० ।
३. भुजगतभ्रमणादिकान्—ग० ।
४ अश्रुप्रमार्जनतिलकविरोचनलोचनालभनकं च—ग० ।
५. त्रिपताकानामिकया दर्शनमलकस्य कार्यञ्च—ग० ।
६. 'स्वस्तिकौ त्रिपताकावि'त्यारभ्य 'याने नृणां प्रयोक्तभि'रित्यन्तं श्लोकषट्कं
ग—पुस्तके नास्ति । ७. वन्दनम्—ख० ।