नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ४३
ऊँचाई (प्रांशु) (मृदङ्ग या) ढोल का पीटना तथा पक्षी का उड़ना (पक्षियों
द्वारा पंखों को फड़फड़ाना या ऊपर उठाना ) बतलाया जाता है ॥ २४ ॥
परिघृष्टतलस्थेन तु धौतं मुदितं प्रमृष्टपिष्टे च ।
पुनरेव शैलधारणमुद्घाटनमेव चाभिनयेत्² ॥ २५ ॥
इसी मुद्रा में यदि दोनों हाथों को परस्पर मसला जाए तो उनके द्वारा
धोना, मसलना, मांजना, गूथना, पीसना, पर्वत को उठाना या उखाड़ना
आदि भाव बतलाया जाता है ॥ २५ ॥
एवमेष³ प्रयोक्तव्यः स्त्रीपुंसाभिनये करः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि त्रिपताकस्य लक्षणम् ॥ २६ ॥
स्त्री तथा पुरुष पात्र के द्वारा इसी प्रकार इस मुद्रा का प्रयोग किया
जाए । अब मैं 'त्रिपताक' मुद्रा का लक्षण कहता हूँ ॥ २६ ॥
'त्रिपताक—
पताके तु यदा वक्रानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
त्रिपताक