नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः ३१
इस प्रकार मैंने ओठों के अभिनय कार्य बतलाए, अब मैं चिबुक के
(ठुड्डी के) कर्म बतलाता हूँ। चिबुक के ७ प्रकार होते हैं—यथा—
(१) कुट्टन, (२) खण्डन, (३) छिन्न, (४) चुक्कित, (५) लेहित,
(६) सम तथा (७) दष्ट। यहाँ दाँतों की क्रिया के अनुसार ही चिबुक
कर्मों के लक्षण बतलाए जाते हैं (अर्थात् ये दांतों के लक्षण हैं तथा
चिबुक के भेद और लक्षण भी इसी प्रकार से होते हैं) दाँतों के संघर्ष
(कड़कड़ाने) को 'कुट्टन', दाँतों के बार-बार चबाने को 'खण्डन', दाँतों
का जोर से मिलाना 'छिन्न' दाँतों को परस्पर ऊपर तक हटा लेना 'चुक्कित'
जिह्वा से दाँतों का चाटना 'लेहित' दाँतों का थोड़ा मिलना 'सम' तथा
दाँतों से ओठ का दबाना 'दष्ट' कहलाता है ॥ १४५-१४८ ॥
योजना—
भयशीतज्वरक्रोधैर्ग्रस्तानां कुट्टनं भवेत् ॥ १४८ ॥
जपोऽध्ययनसल्लापभक्ष्ययोगे च खण्डनम् ।
छिन्नं व्याधौ भये शीते व्यायामे रुदिते ३मृते ॥ १४९ ॥
जृम्भणे चुक्कितं कार्यं तथा लौल्ये ५ च लेहनम् ।
समं स्वभावभावेषु सन्दष्टं क्रोधकर्मसु ॥ १५० ॥
इति दन्तोष्ठजिह्वानां करणे चिबुकक्रिया।
इनमें भय, शीत व्याधि तथा ज्वर में 'कुट्टन' की; जप, अध्ययन,
संलाप (संवाद) तथा भक्षण करने में 'खण्डन' की, व्याधि, भय, शीत,
व्यायाम, रूदित तथा मृत में 'छिन्न' की, चुम्बन लेने में 'चुक्कित' की;
लेहन कर्म (चाटने) में (पाठान्तर—चंचलता में) 'लेहन' की;
स्वाभाविक चेष्टाओं में 'सम' की तथा क्रोध के कार्यों में 'सन्दष्ट' की योजना
करनी चाहिए।
इस प्रकार मैंने दन्त, ओष्ठ तथा जिह्वा से सम्बद्ध (इन) चिबुकों के
कार्य बतलाए ॥ १४८-१५१॥
मुखज कर्म—
६विनिवृत्तञ्च विधुतं निर्भुग्नं भुग्नमेव च ॥ १५१ ॥
१. व्याधि—ख-ग०। २. जप्या—ख० ग०। ३. रुषितेक्षिते—ख० ।
४. चिकिर्त—ख, चुक्षितं—ग०। ५. लेह्यो—स-ग० ।
६. 'विनिवृत्तञ्च विधुतम्' इत्यादयोऽष्टौ श्लोकाः क्वचनादर्शेषु प्रक्षिप्ताः ।