नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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द्विगुणां लभते शोभां रात्राविव निशाकरः ।
नयनाभिनयोऽपि स्यान्नानाभावरसस्फुटः ॥ १६५ ॥
मुखरागान्वितो यस्मान्नाट्यमत्र प्रतिष्ठितम् ।
यथा नेत्रं प्रसपेंत मुखभ्रूदृष्टिसंयुतम् ॥ १६६ ॥
तथा भावरसोपेतं मुखरागं प्रयोजयेत् ।
इत्येष मुखरागस्तु प्रोक्तो भावरसाश्रयः ॥ १६७ ॥
शाखा, अंग तथा उपांग के अभिनय अच्छी प्रकार किये जाने पर
भी यदि वे 'मुखराग' से रहित हो तो उसकी शोभा नहीं होती ।
पर जब शारीराभिनय के अल्प मात्रा में प्रस्तुत करते हुए भी यदि
उसे मुखराग से युक्त रखा जाए तो रात्रि में चन्द्र के समान द्विगुणित
शोभा को प्राप्त करता है ।
नयनाभिनय भी यदि मुखराग से युक्त रहे तो वह अनेक भाव तथा
रसों को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है क्योंकि 'नाट्य' इसी पर निर्भर
है (स्थित है) ।
मुख, भ्रू, दृष्टि आदि से युक्त हो जिस प्रकार नेत्र हों मुखराग भी
उसी प्रकार के भाव तथा रसों से युक्त रखते हुए प्रयुक्त करना चाहिए ।
इस प्रकार मैंने भाव तथा रस का आधारभूत तत्त्व 'मुखराग' का स्वरूप
यहाँ बतलाया ॥ १६३-१६७ ॥
ग्रीवाकर्म—लक्षण तथा योजना—
अतः परं प्रवक्ष्यामि ग्रीवाकर्माणि वै द्विजाः ।
समा नतोन्नता त्र्यस्रा रेचिता कुञ्चिताञ्चिता ॥ १६८ ॥
वलिता च विवृत्ता च ग्रीवा नवविधार्थतः ।
हे मुनिजन ! अब मैं आपको ग्रीवा के कार्य बतलाता हूँ । ये ग्रीवा कर्म
नौ प्रकार के हैं । यथा :—(१) समा, (२) नता, (३) उन्नता, (४) त्र्यस्रा,
(५) रेचिता, (६) कुञ्चिता, (७) अञ्चिता, (८) वलिता, तथा( ९ )
विवृत्ता ॥ १६८–१६६ ॥
समा स्वाभाविकी ध्यानस्वभावजपकर्मसु ॥ १६९ ॥
नता नतास्यालङ्कारबन्धे कण्ठावलम्बने ।
१. भावरसान्वितः—ख० । २. इत्येवं—ख० ।
३. ग्रीवाकर्म द्विजोत्तमाः—ख० । ४. निवृत्ता—ख० ।