नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ४९
शुकतुण्डे¹—
अरालस्य यदा वक्रानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
शुकतुण्डस्तु स करः कर्म चास्य निबोधत ॥ ५२ ॥
यदि अरालमुद्रायुक्त हाथ में अनामिका अंगुली को टेढ़ा कर (झुका)
लिया जाए तो 'शुकतुण्ड' मुद्रा बन जाती है ॥ ५२ ॥
एतेन त्वभिनेयं नाहं न त्वं न कृत्यमिति चार्थे ।
आवाहने विसर्गे धिगिति च वचने सावज्ञम् ॥ ५३ ॥
योजना—इसके द्वारा 'मैं इसे नहीं···तुम इसे नहीं तथा यह किये
जाने योग्य नहीं' इन अर्थों को और, आवाहन, बिदाई ( विसर्ग ) तथा
अवज्ञापूर्वक धिक्कारना ( आदि अर्थ ) बतलाए जाते हैं ॥ ५३ ॥
मुष्टि²—
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य तलम¹ध्येऽग्रसंस्थिताः ।
तासामुपरि चाङ्गुष्ठः स मुष्टिरिति संज्ञितः ॥ ५४ ॥
यदि सारी अंगुलिय । हथेली में बाँध दी जाएँ और अंगूठे को ऊपर
रख ले तो 'मुष्टि' मुद्रा कहलाती है ॥ ५४ ॥
एष प्रहारे व्यायामे निर्गमे पीडने² तथा ।
संवाहनेऽसियष्टीनां दण्डे³कुन्तग्रहे तथा ॥ ५५ ॥
योजना—इसके द्वारा प्रहार, व्यायाम, निर्गम, पीड़न ( किसी पशु
के थन से दूध निकालने ), मिट्टी तथा डण्डे और भाले को ग्रहण करने
( आदि ) का अभिनय किया आता है ।
१. शुकतुण्ड ( उत्पत्ति कथा ) इस मुद्रा की प्रसू गौरी हैं । शंकर के साथ
प्रणय-कलह के समय इसी हस्त का उनके द्वारा उपयोग किया गया था । तभी
से इसका प्रचलन हो गया ।
२. मुष्टि ( उत्पत्ति कथा ) मधुराक्षस के वध के समय भगवान विष्णु ने
इसी मुद्रा का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
१. तलमाध्यग्रसंस्थिताः—ख० । २. हस्तपीडने—ख० ग० ।
३. कुन्तदण्ड—ग० ।
४ ना० शा० द्वि०