नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ नाट्यशास्त्रम्
इत्यादिलोकभावार्था ग्रीवोभेदैरनेकधा ।
ग्रीवाकर्माणि सर्वाणि शिरःकर्मानुगानि हि ॥ १७४ ॥
शिरसः कर्मणा कर्म ग्रीवायाः सम्प्रवर्तते ।
इस प्रकार मनुष्यों के भाव तथा व्यवहार आदि के अनुसार ये ग्रीवा
के अनेक भेद बतलाए गये हैं। ये सभी ग्रीवाकर्म मस्तक की क्रिया का
अनुसरण करते हैं और मस्तक के कर्म ग्रीवा के कर्मों से ही प्रवृत्त होते
हैं ॥ १७४-१७५ ॥
इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं शीर्षोपाङ्गसमाश्रयम् ॥ १७५ ॥
अङ्गकर्माणि शेषाणि गदतो मे निबोधत ॥ १७६ ॥
इस प्रकार मैंने मस्तक के उपांगसहित सभी लक्षण बतलाए। अब मैं
शेष अंगों के कर्म तथा लक्षण बतलाता हूँ जिन्हें आप समझिए ॥१७५-१७६॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे उत्तमाङ्गाभिनयो [ उपाङ्गाभिनयो ]
नाम अष्टमोऽध्यायः ।
भरत नाट्यशास्त्र का उत्तमांगाभिनय ( उपांगाभिनय ) नामक
अष्टम-अध्याय समाप्त ।
१. ग्रीवाभङ्गे—ख० ।