नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ४१
(९) रेचित, (१०) अर्धरेचित, (११) उत्तानवञ्चित, (१२) पल्लव,
(१३) नितम्ब, (१४) केशबन्ध, (१५) लता, (१६) करिहस्त,
(१७) पक्षवंचितक, (१८) पक्षप्रद्योतक, (१९) गरुड़पक्ष, (२०) दण्डपक्ष,
(२१) ऊर्ध्वमण्डलिन्, (२२) पार्श्वमण्डलिन् (२३) उरोमण्डली,
(२४) उरःपार्श्वमण्डली, (२५) मुष्टिकस्वस्तिक, (२६) नलिनीपद्मकोष,
(२७) अलपल्लव, (२८) उल्बण, (२९) ललित, तथा (३०)
वलित ॥ ११-१६ ॥
चतुष्षष्टिकरा ह्येते नामतोऽभिहिता मया ।
यथालक्षणमेतेषां कर्माणि च निबोधत ॥ १७ ॥
इस प्रकार मैंने चौसठ हस्तमुद्राओं के नाम बतलाए । अब मैं इनके
लक्षणों तथा तदनुरूप कर्मों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
असंयुत—हस्तमुद्राएं ( लक्षण तथा योजना )—
पताक—
प्र²सारिताः समाः सर्वाः यस्याङ्गुल्यो³ भवन्ति हि ।
कुञ्चितश्च तथाङ्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः ॥ १८ ॥
सभी उंगलियों को फैलाकर यदि अंगूठे की तिरछा (कुञ्चित) कर दे
और उसे तर्जनी के मूल में लगा दे तो ‘पताक’ हस्त-मुद्रा होती है ॥१८॥
एष प्रहारपाते प्र⁴तापने नोदने प्रहर्षे च ।
गर्वे⁵ऽप्यहमिति तज्ज्ञैर्ललाटदेशोत्थितः कार्यः ॥ १९ ॥
योजना—प्रहार (चोट) करने, (शीतनिवारण हेतु आग)
तापने, प्रेरणा देने, हर्ष तथा गर्व बतलाने में पताकमुद्रायुक्त हाथ को
ललाट प्रदेश से उठाते हुए रखना चाहिए ॥ १९ ॥
१. पताक—(उत्पत्ति कथा)—यह मुद्रा प्राचीन मूर्तियों में अभय मुद्रा के
रूप में दिखाई देती है। शास्त्र में इस मुद्रा के स्रष्टा ब्रह्मा जी हैं। एक बार सृष्टि
के उत्पादक ब्रह्मा परब्रह्म (विष्णु) के समीप गये तथा जय घोष के साथ उनकी
वन्दना की। इस समय उनके हाथ ने सहसा पताक (ध्वज) के आकार को
धारण कर लिया, तभी से इसकी पताक हस्त के रूप में प्रसिद्धि है।
१. अथ लक्षणमेतेषां—ग०। २. प्रसारिताग्राः सहिताः—ख०, ग०।
३. यस्याङ्गुल्यौ—क०। ४. प्रकोपने—क०।
५. गर्वेष्वह—क०।