नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ नाट्यशास्त्रम्
मुष्टिश्च शिखराख्यश्च कपित्थः कटकामुखः ।
सूच्यास्यः पद्मकोशश्च तथा वै सर्पशीर्षकः ॥ ५ ॥
मृगशीर्षः परो ज्ञेयो हस्ताभिनययोक्तृभिः ।
लाङ्गूलोत्पलपद्मश्च चतुरो भ्रमरस्तथा ॥ ६ ॥
हंसास्यो हंसपक्षश्च सन्दंशो मुकुलस्तथा ।
ऊर्णनाभस्ताम्रचूडश्चतुर्विंशतिरीरिताः ॥ ७ ॥
असंयुता संयुताश्च गदतो मे निबोधत ।
अञ्जलिश्च कपोतश्च कर्कटः स्वस्तिकस्तथा ॥ ८ ॥
कटकावर्धमानश्च ह्युत्सङ्गो निषधस्तथा ।
दोलः पुष्पपुटश्चैव तथा मकर एव च ॥ ९॥
मुद्राएँ ही समान हैं परन्तु इन मुद्राओं के अभिनय-दर्पण में जहाँ नाम समान है
तो लक्षण भिन्न हैं । ये हैं—कर्तरीमुख, कटकामुख, सूचीमुख, हंसमुख, (हंसास्य )
मृगशीर्ष, सन्दंश तथा ताम्रचूड़ । इस प्रकार यहाँ संयुक्त और असंयुक्त हस्तमुद्राओं
के विषय में संक्षेप में बतलाया गया है । विशेष विवेचन के लिए परिशिष्ट देखिये ।
नाट्यशास्त्र में हस्तमुद्राओं का कुलयोग ६४ बतलाया गया है परन्तु हैं
वे ६७ तथा भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित भी और ये (नाट्यशास्त्र में) भरतमुनि
सम्मत ही मुद्राएँ निरूपित भी की गयी हैं । इस संख्या का उल्लेख श्रीकण्ठकृत
रसमंजरी में (इस प्रकार) किया गया है :—'एतेऽभिनयहस्ताः स्युः सप्तत्रिंश-
न्मुनेर्मताः' (रसमंजरी ms—पत्र ६४ B. O. R. I. Poona )
हस्तमुद्राएं (विशेष)—मुद्रा का स्वरूप तथा उसका विनियोग नाट्यशास्त्र
में सलक्षण दिया गया है। इसके अतिरिक्त भी इन मुद्राओं के द्वारा अनेक अर्थ
सूचित किये जा सकते हैं जिनका आगे चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र अध्याय २६)
में वर्णन हैं। कुछ अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में मूल मुद्राओं की उद्भव कथाएं तथा
रस के समान इन मुद्राओं का भी वर्ण (रंग) जाति तथा अधिदेवता भी
बतलायी गयी हैं। इन उल्लेखों से आचार्यों के नृत्य-शास्त्र में सौन्दर्य-पूर्ण सूक्ष्म
तथा संशोधकदृष्टि के दर्शन सहज प्राप्य हैं। अभिनय-दर्पण आदि ग्रन्थों के द्वारा
प्रदर्शित विभिन्न अर्थों को (जो नाट्यशास्त्र में नहीं दर्शाये गए) हमने परिशिष्ट
में बतलाने का उद्योग किया है। यह विषय विस्तृत तथा अध्ययन सापेक्ष है।
१. खटकामुखः—क-ख० । २. पद्यार्धमेतत् क-पुस्तके नास्ति ।
३. काङ्गूलकोत्पलपद्मश्च—क० । ४. खटका—क० ।