नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished668 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 161५० नाट्यशास्त्रम्
१. शिखर (उत्पत्ति कथा) चन्द्रशेखर शिव द्वारा सुमेरुपर्वत को समुद्रमन्थन के
५० नाट्यशास्त्रम्
शिखरे—
अस्यैव च यदा मुष्टेरूर्ध्वोऽङ्गुष्ठः प्रयुज्यते ।
हस्तः स शिखरो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ५६ ॥
यदि मुष्टि हस्त में अंगूठे को ऊपर सीधा उठा लिया जाए तो 'शिखर'
मुद्रा कहलाती है ॥ ५६ ॥
रश्मिकुशाङ्कुशधनुषां तोमरशक्तिप्रमोक्षणे चैव ।
अधरोष्ठपादरञ्जनमलके²भ्योत्क्षेपणे चैव ॥ ५७ ॥
योजना—( धनुष की ) डोरी, दर्भ, अंकुश, धनुष इत्यादि धारण करने,
शक्ति और तोमर अस्त्र को छोड़ने, ओष्ठ ( अधरोष्ठ ) तथा पैरों को रंगने
तथा बालों को झाड़ने ( या कंघा करने ) का इस मुद्रा द्वारा अर्थ सूचित
होता है ॥ ५७ ॥
कपित्थे—
अस्यैव शिखराख्यस्य पृष्ठे³ङ्गुष्ठकनिपीडिता ।
यदा⁴ प्रदेशिनी वक्रा स कपित्थस्तदा स्मृतः ॥ ५८ ॥
यदि शिखर हस्त में तर्जनी अंगुली को झुका कर अंगूठे पर दबा कर
रख दी ( मिला दी ) जाए तो 'कपित्थ' मुद्रा कहलाती है ॥ ५८ ॥
असिचापचक्रतोमरकुन्तगदाशक्तिवज्रबाणानि ।
शस्त्राण्यभिनेयानि तु कार्यं पथ्यञ्च सत्यञ्च ॥ ५९ ॥
योजना—तलवार, धनुष, चक्र, तोमर, कुन्त ( भाला ), गदा, शक्ति,
वज्र तथा बाण को छोड़ने और सत्य तथा हितकर ( पथ्य ) कार्य करने
का अर्थ इस मुद्रा के द्वारा सूचित होता है ॥ ५९ ॥
१. शिखर (उत्पत्ति कथा) चन्द्रशेखर शिव द्वारा सुमेरुपर्वत को समुद्रमन्थन के
लिए उखाड़ने में इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
२. कपित्थ ( उत्पत्ति कथा ) समुद्रमन्थन के अवसर पर विष्णु के द्वारा
मन्दारवृक्ष को खींचकर निकालने में इसी हस्त का उपयोग किया गया था ।
तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. प्रमोक्षणाञ्चैव--ख० ग० ।
२. अलक्तकोत्पीडने चैव--क० । ३. मुखेऽङ्गुष्ठनिपीडिता--ख० ।
४. प्रदेशिनी च वक्रा स्यादिति हस्तः कपित्थकः--क० ।