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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४२ नाट्यशास्त्रम्
एषोऽग्निवर्षधारानिरूपणे पुष्पवृष्टिपतने च ।
संयुक्तकरणः कार्यः प्रविरलचलिताङ्गुलीर्हस्तः ॥ २० ॥
यदि पताक-मुद्रा-युक्त दोनों हाथों को रखकर अंगुलियों को घुमाए तो
उनके द्वारा वर्षा, पुष्पवृष्टि और (उग्रकम्पन द्वारा) अग्नि की ताप (या
ज्वालाएँ) बतलाई जाती है ॥ २० ॥
स्वस्तिकविच्युतिकरणात् पल्लैवपुष्पोपहारशष्पाणि ।
विरचितमुर्वीसंस्थं यद्द्द्रव्यं तच्च निर्दिश्यम् ॥ २१ ॥
यदि पताक मुद्रा वाले दोनों हाथों से स्वस्तिक करते हुए उसे हटा
लिया जाए तो उसके द्वारा पल्लव एवं पुष्पों का उपहार, लहलहाता घास
तथा पृथ्वी पर स्थित किये हुए (बलि आदि) पदार्थों को बतलाया जाता
है ॥ २१ ॥
स्वस्तिकविच्युतिकरणात् पुनरेवाधोमुखेन कर्तव्यम् ।
संवृतविवृतं पाल्यं छन्नं निबिडञ्च गोप्यञ्च ॥ २२ ॥
यदि हाथों को स्वस्तिक