नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished668 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 146अष्टमोऽध्यायः ३५
अष्टमोऽध्यायः ३५
उन्नताभ्युन्नतमुखी ग्रीवा चोर्ध्वादिदर्शने ॥ १७० ॥
त्र्यस्रा पार्श्वगता ज्ञेया स्कन्धभारे च दुःखिते ।
रेचिता विधुताँ भ्रान्ता भावे मथनवृत्तयोः ॥ १७१ ॥
कुञ्चिताऽकुञ्चिता मूर्ध्नि भारिते गलरक्षणे ।
अपनी सहज अवस्था में विद्यमान ग्रीवा 'समा' कहलाती है, इसकी
योजना ध्यान, सहज भाव तथा जपकर्म में की जाए । यदि ग्रीवा झुकी हो
तो 'नता' कहलाती है, इसकी योजना अलंकारों के धारण करने तथा
किसी व्यक्ति के कण्ठ का सहारा लेने में करना चाहिए ।
ऊपर की ओर चेहरे को उठा कर रखी हुई ग्रीवा 'उन्नता' कहलाती
है । इसे ऊपर की ओर देखने के भाव में प्रयुक्त करना चाहिए ।
यदि ग्रीवा को किसी एक ओर मोड़ा जाए तो यह 'त्र्यस्रा' कहलाती
है । इसकी कन्धों से भार वहन तथा दुःख के प्रदर्शन में योजना की जाए ।
यदि ग्रीवा कम्पित या घूमते हुए रखी जाए तो 'रेचिता' कहलाती
है । इसकी योजना भाव, मथन तथा नृत्त में की जाए ।
यदि मस्तक सहित ग्रीवा को नीचे की ओर झुकाया जाय तो
'कुञ्चिता' कहलाती है । इसकी योजना भारयुक्त होने तथा गले का बचाव
करने में की जाए ॥ १६९-१७२ ॥
अञ्चितापसृतोद्वृद्धकेशौकर्षोर्ध्वदर्शने ५ ॥ १७२ ॥
पार्श्वोन्मुखी स्याद् वलिता ग्रीवाभङ्गे च वीक्षिते ६ ।
विवृत्ताभिमुखीभूता स्वस्थानाभिमुखादिषु ॥ १७३ ॥
यदि ग्रीवा को मस्तक सहित पीछे की ओर मोड़ा जाए तो 'अञ्चिता'
कहलाती है । इसकी योजना ऊपर की ओर लटकने, ( फांसी लगा कर
मरने हेतु ), बालों को खींचने तथा ऊपर देखने में की जाए ।
यदि ग्रीवा चहरे सहित बगल में मोड़ ली जाए तो 'वलिता' कहलाती
है । इसकी योजना ग्रीवा को झुका कर देखने के भाव में की जाए ।
यदि ग्रीवा सामने की ओर स्थित रहे ( अभिमुखीभूता ) तो 'विवृत्ता'
कहलाती है । इसकी योजना अपने उद्दिष्ट स्थान की ओर प्रस्थान करने
में की जाए ॥ १७२-१७३ ॥
१. चोर्ध्वनिवेशने—ख० । २. चैव—ख० ।
३. विधुतभ्रान्ता हावे—ख० । ४. कुञ्चिताकुञ्चिते मूर्ध्नि धारिते—ख, ग० ।
५. केशकर्णोर्ध्वदर्शने—ख०, ग० । ६. वीक्षणे—ख० ।