नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 148नवमोऽध्यायः
१. हस्तमुद्राओं के विषय में आचार्यों में अतिशय मतभेद दृष्टिगोचर होता
नवमोऽध्यायः
एवमेतच्छिरोनेत्रं¹ भ्रूनासोष्ठकपोलजम्² ।
कर्म लक्षणसंयुक्तमुपाङ्गानां मयोदितम् ॥ १ ॥
हस्तो³नान्तु प्रवक्ष्यामि कर्म नाट्यप्रयोजकम् ।
यथा येनाभिनेयश्च गदंतो⁴ मे निबोधत ॥ २ ॥
भरतमुनि बोले—
हे मुनिजन ! अब तक आपको मैंने लक्षणों से युक्त शिर, नेत्र, भौंहें,
नासिका, ओठ एवं कपोल से होनेवाले उपांगों के अभिनय को बतलाया ।
अब मैं हाथों का नाट्यप्रयोगों में होने वाला अभिनय-कार्य—जैसे और
जिस व्यक्ति के द्वारा अभिनीत किया जाए—बतलाता हूँ ॥ १-२ ॥
हस्तोरःपार्श्वजठरकटीजङ्घोरुपादतः ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि विनियोगश्च तत्त्वतः ॥ ३ ॥
अब मैं क्रमशः हाथ, उरःस्थल, पार्श्व, उदर, कटी, जंघा, ऊरू,
(पिंडलियाँ) तथा पैरों के अभिनय कार्य तथा लक्षणों को बतलाता हूँ ॥३॥
हस्तमुद्राएँ—¹
पताकस्त्रिपताकश्च तथा वै कर्तरीमुखः ।
अर्धचन्द्रो ह्यरालश्च शुकतुण्डस्तथैव च ॥ ४ ॥
१. हस्तमुद्राओं के विषय में आचार्यों में अतिशय मतभेद दृष्टिगोचर होता
है तथा नाट्यशास्त्र की कई प्रतियों में उपलब्ध पाठान्तरों के अनुसार भी अनेक
भिन्नताएं दृष्टिगोचर होती हैं। जैसे-सूचीमुख को सूच्यास्य, कांगुलम् को लांगुलम्,
अलपद्मम् को अलपल्लव या उत्पलपद्मम्, उत्पलपदम् इत्यादि । अभिनयदर्पण में
असंयुक्त मुद्राएं २८ तथा ४ पूरक मुद्राओं सहित ३२ मिलती है। इसमें
नाट्य-शास्त्र के अतिरिक्त ये मुद्राएँ हैं—अर्धपताक, मयूर, चन्द्रकला, सिंहमुख,
त्रिशूल, व्याघ्र, अर्धसूची, कंटक तथा पल्ली । (इनमें नाट्यशास्त्र की ऊर्णनाभ मुद्रा
को छोड़ शेष सभी अतिरिक्त मुद्राएँ हैं ।) नाट्यशास्त्र तथा अभिनय-दर्पण की १६
१. इत्येतच्छिरसो नेत्र—क, च्छिरसो नेत्रे, ख–ग० ।
२. कपोलकम्—क० । ३. हस्तादीनां—क० ।
४. तन्मे निगदतः शृणु—ग० ।