नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः ३३
तज्ज्ञैस्तदेनुसारेण कार्यं तदनुगं मुखम् ।
हास्य, शोक तथा भय आदि में 'विवृत', स्त्रियों की लीला तथा गर्व
में, अनादर, 'जाओ' तथा ऐसा ही कार्य है इस प्रकार के कथन में एवं
क्रोध पूर्ण वचनों में 'उद्वाही' मुख की योजना करनी चाहिए ।
नाट्यप्रयोक्ताजन द्वारा दृष्टि भेदों के जो सम तथा साची भेद पहिले
बतलाए गए उन्हीं के अनुसार मुख की भी योजना करनी चाहिए ।
मुख-राग—
अथातो मुखरागस्तु चतुर्धा सम्प्रकीर्तितः ॥ १५६ ॥
स्वाभाविकः प्रसन्नश्च रक्तः श्यामोऽर्थसंश्रयः ।
अब मैं 'मुख-राग' को बतलाता हूँ । ये अपने अर्थों के अनुसार चार
प्रकार के होते हैं । यथा—(१) स्वाभाविक, (२) प्रसन्न, (३) रक्त तथा (४)
श्याम ॥ १५९-१६० ॥
योजना—
स्वाभाविकस्तु कर्तव्यः स्वभावाभिनयाश्रयः ॥ १६० ॥
मध्यस्थादिषु भावेषु मुखरागः प्रकीर्तितः ।
प्रसन्नस्त्वद्भुते कार्यो हास्यशृङ्गारयोस्तथा ॥ १६१ ॥
वीररौद्रमदाद्येषु रक्तः स्यात् करुणे तथा ।
भयानके सबीभत्से श्यामं सञ्जायते मुखम् ॥ १६२ ॥
एवं भावरसार्थेषु मुखरागं प्रयोजयेत् ।
'स्वाभाविक मुखराग' की; स्वाभाविक अभिनय में तथा मध्यस्थ आदि
भाव में; 'प्रसन्न मुख राग' की अद्भुत, हास्य तथा शृंगार में; रक्त मुखराग
की वीर, रौद्र रस और मद तथा करुण, भयानक तथा बीभत्स रस में
श्याम मुख राग की योजना करनी चाहिए ।
इसी प्रकार भाव तथा रस के प्रस्तुत करने में मुख राग की योजना
की जाए ॥ १६०-१६३ ॥
शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तः कृतोऽप्य³भिनयः शुभः ॥ १६३ ॥
मुखरागविहीनस्तु नैव शोभान्वितो भवेत् ।
शारीराभिनयोऽल्पोऽपि मुखरागसमन्वितः ॥ १६४ ॥
१. स्तेनानुसारेण—ख० ग० । २. प्रयोक्तृभिः—ख० ग० ।
३. ह्यभिनयः—ख० ।
३ ना० शा० द्वि०