नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ४७
तो 'अर्धचन्द्र' मुद्रा कहलाती है। अब मैं इससे होने वाले कार्य बतलाता
हूँ ॥ ४२ ॥
एतेन बालतरवः शशिलेखा कम्बुकलशवलयानि ।
निर्घाटेन¹मायस्तं मध्यौपम्यञ्च पीनञ्च ॥ ४३ ॥
योजना—इसके द्वारा छोटे वृक्ष, चन्द्रलेखा, शंख, कलश, कंकण
(कटक), बाहर ढकेलना (निर्घाटन), परिश्रम (आयस्त), कृशता
(जो कि कटिप्रदेश की तुलना में निर्देशित की जाती हो) तथा पीनता
(मोटाई) बतलाए जाते हैं ॥४३ ॥
रशना²जघनकटीनामाननतलपत्रकुण्डलादीनाम् ।
कर्तव्यो नारीणामभिनययोगोऽर्धचन्द्रेण ॥ ४४ ॥
इस अर्धचन्द्र हस्त के द्वारा स्त्रियों की करधनी (रशना), जंघा,
कटि, चेहरा (आनन), तलपत्र (अलंकार विशेष जो कि कानों में धारण
किया जाता है) तथा कुण्डल का अभिनय प्रस्तुत करना चाहिए ॥ ४४ ॥
अराल¹—
आद्या धनुर्नता³ कार्या कुञ्चितो⁴ऽङ्गुष्ठकस्तथा ।
शेषा भिन्नोर्ध्ववलिता ह्यराले⁵ऽङ्गुलयः करे ॥ ४५ ॥
यदि तर्जनी अंगुली झुकी हुई, अंगूठा (उसे मिलाने को) सिकुड़ा
हुआ तथा शेष उंगलियां उससे पृथक् तथा ऊपर की ओर खड़ी रखी जाए
तो 'अराल' मुद्रा जानों ॥ ४५ ॥
एतेन सत्त्वशौण्डीर्यवीर्यकान्तिधृतिदिव्यगाम्भीर्यम् ।
आशीर्वादाश्च तथा भावा⁶ हितसंज्ञकाः कार्याः ॥ ४६ ॥
योजना—इसके द्वारा सत्व, (स्थैर्य) गर्व, पराक्रम (वीर्य), शोभा
(कान्ति) धृति, दिव्य-वस्तु, गाम्भीर्य, आशीर्वाद देना तथा इसी प्रकार
के अन्य सुखप्रद भावों को बतलाया जाता है ॥ ४६ ॥
१. अराल (उत्पत्ति कथा) अगस्त ऋषि ने समुद्रपान के समय इसी मुद्रा
का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१ निघटनं—ग० । २. रसना—ग० । ३. धनुर्लता—ख० ।
४. कुञ्चिता--ख० । ५. ह्यरालाङ्गुलयः स्मृताः--ग० ।
६. भावाभिनयसंज्ञकाः कार्याः-ग० ।