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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 668 में से

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पृष्ठ 159

४८ नाट्यशास्त्रम्
एतेन पुनः स्त्रीणां केशानां सङ्ग्रहंस्तथोत्कर्षः ।
सर्वाङ्गिकं तथैव च २ निर्वर्णनमात्मनः कार्यम् ॥ ४७ ॥
कौतुकविवाहयोगैः प्रदक्षिणेनैव सम्प्रयोगश्च ।
अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगान्परिमण्डलेनैव ॥ ४८ ॥
प्रादक्षिणयं परिमण्डलञ्च कुर्यान्महाजनश्चैव ।
यच्च महीतलनिहितं द्रव्यं तच्चाभिनेयं स्यात् ॥ ४९ ॥
तथा स्त्रियों का केश सम्मार्जन और उनका फैलाना (उत्कर्षः विकीर्ण-
तापादनम् अभि० भा०) तथा अपने सम्पूर्ण शरीर को ध्यान पूर्वक देखना
दो अराल हस्तो के अंगुलियों के अग्रभागों के स्पर्श द्वारा बतलाया जाए।
इसी में एक थोल घुमाव देने पर विवाह के पूर्व होने वाले भंवरों का
विधान (कौतुक-विवाह योग) तथा दोनों वर वधू के हाथों का
मिलाप बतलाया जाता है और इसी हस्त के द्वारा प्रदक्षिणा, गोल वस्तु
(परिमण्डल), जन कोलाहल तथा पृथ्वी में स्थित वस्तु (या पृथ्वी
पर सजाई गई वस्तुएं) भी बतलाई जाती है ॥ ४७-४९ ॥
आह्वानञ्च निवारणनिर्माणे चाप्यनेकवचः ।
स्वेदस्य चापनयने गन्धाघ्राणे शुभैः शुभे चैव ॥ ५० ॥
तथा किसी व्यक्ति को बुलाना, रोकना, उदय होना, अनेक बातें
बतलाना, (कहना) पसीने का पोंछना मीठी सुगन्ध लेना तथा शुभावह
कार्य भी इसी मुद्रा के द्वारा बतलाए जाते हैं ॥ ५० ॥
त्रिपताकहस्तजानि तु पूर्वे यान्यभिहितानि कर्माणि ।
तानि त्वरालियोगात् स्त्रीभिः सम्यक् प्रयोज्यानि ॥ ५१ ॥
त्रिपताक मुद्रा द्वारा (जिन कार्यों का पहिले प्रदर्शन बतलाया गया
वे सभी कार्य स्त्रियों के द्वारा अराल मुद्रा से भी प्रदर्शित किये जा
सकते हैं ॥ ५१ ॥
१. सङ्ग्रहोत्कर्षौ--ग० । २. निर्वहण--ग० । ३. योगं--ख० ।
४. प्रदक्षिणे नैव सम्प्रयोगश्च--ख०, ग० । ५. यत्र--क० ।
६. आवाहने निवापे निन्दाद्याक्षेपवचने च-ख०; आवाहननिर्वाहणनिर्माणे-
क०, ख० । ७. शुभा चैव हि--ग० ।
८. त्वरानुयोगात्--ख० ।