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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४६ नाट्यशास्त्रम्
यदि त्रिपताक मुद्रा वाले हाथ में तर्जनी अंगुली मध्यमा के पीछे फैला-
कर रखी जाए (या झुकायी जाए) तो 'कर्तरीमुख' मुद्रा कहलाती है ॥३८॥
पथि¹ चरणरचनरञ्जनरङ्गणकरणान्यधोमुखेनैव ।
ऊर्ध्वमुखेन तु कुर्याद् दष्टं शृङ्गञ्च लेख्यञ्च ॥ ३९ ॥
योजना—यदि कर्तरीमुख मुद्रावाला हाथ नीचे मुंहवाला रखते हुए
रखा जाए तो उसके द्वारा मार्ग में पैर रखना, पैरों को अलंकृत या रंजित
करना, रांगोली रचना करना (रंगण-रंगवल्ली का निर्माण अथवा बालकों का
रेंगना) बतलाया जाता है। यदि ऊंचे मुंह वाला होकर यही हाथ रहे तो
उससे दंशन, शृङ्ग बजाना तथा चित्र लेखन कर्म बतलाया जाता है ॥३९॥
पतनमरणव्यतिक्रमपरिवृत्तवितर्कितं तथा न्यस्तम् ।
भिन्नवलितेन कुर्यात् कर्त्यास्याङ्गुली²मुखेन ॥ ४० ॥
और यदि इसी मुद्रा को नीचे की ओर झुकाया या रखा जाए तथा
अंगुलियां भिन्न २ दिशाओं में घूमने लगे तथा मध्यमांगुलि पीछे की ओर
झुकी रहे तो इसके द्वारा पतन, मरण, अपराध (व्यतिक्रम), पराङ्मुखी
भवन, तर्क करना तथा धरोहर को रखना बतलाया जाता है ॥ ४० ॥
संयु³क्तकरणो वा स्यादसंयुतो वा प्रयुज्यते तज्ज्ञैः ।
रुरु-चमरमहिषसुरगजवृषगोपुरशैलशिखरेषु ॥ ४१ ॥
और यदि दो कर्तरीमुख हस्तोँ या एक कर्तरीमुख हस्त का प्रयोग किया
जाए तो इनके द्वारा रूरूमृग, चमरी गाय, महिष, ऐरावत हाथी, वृषभ,
गोपुर तथा शैलशिखर (जैसे पदार्थ) का भाव प्रदर्शित किया जाता है ॥४१॥
¹अर्धचन्द्रः—
यस्याङ्गुल्यस्तु विनताः सहाङ्गुष्ठेन चाप⁴वत् ।
सोऽर्धचन्द्र इति ख्यातः करः कर्मास्य वक्ष्यते ॥ ४२ ॥
यदि अंगुलियों को अंगूठे सहित धनुष जैसी झुका कर फैला दी जाए
१. अर्धचन्द्र (उत्पत्ति कथा) नटराज शिव ने अलंकार धारण करने की
इच्छा से अर्धचन्द्र को जब मस्तक पर धारण किया तो इसी धारण करने के
समय से इस मुद्रा का उद्भव हुआ।
१. पथिक—ख० । २. स्याङ्गुलीययुग्मेन—ख०, ग० ।
३. एष श्लोकः खपुस्तके नास्ति । ४. चापरम्—ग० ।