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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

अष्टमोऽध्यायः ९१
दृष्टियों के प्रकार—
कान्ता भयानका हास्या करुणा चाद्भुता तथा ।
रौद्री वीरा च बीभत्सा विज्ञेया रसदृष्टयः ॥ ३८ ॥
रस की अभिव्यक्ति करने वाली ये दृष्टियाँ हैं—कान्ता, भयानका,
हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री, वीरा तथा बीभत्सा (इन्हें रसदृष्टियाँ
कहते हैं) ॥ ३८ ॥
स्निग्धा हृष्टा च दीना च क्रुद्धा दृप्ता¹ भयान्विता ।
जुगुप्सिता विस्मिता च स्थायिभावेषु दृष्टयः ॥ ३९ ॥
स्थायि भावों में प्रयुक्त होने वाली दृष्टियाँ हैं—स्निग्धा, हृष्टा, दीना,
दृप्ता, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता ॥ ३६ ॥
शून्या च मलिना चैव श्रान्ता लज्जान्विता तथा ।
ग्लाना च शङ्किता चैव विषण्णा मुकुला तथा ॥ ४० ॥
कुञ्चिता चाभितप्ता² च जिह्मा सल्ललिता तथा ।
वितर्किताऽर्धमुकुला विभ्रान्ता विप्लुता तथा ॥ ४१ ॥
आकेकरा विकोशा च त्रस्ता³ च मदिरा तथा ।
षट्त्रिंशद् दृष्टयो ह्येता नामतोऽभिहिता मया⁴ ॥ ४२ ॥
संचारी भावों में उपयोगी दृष्टियाँ ये हैं :—शून्या, मलिना, श्रान्ता,
लज्जान्विता, ग्लाना, शंकिता, विषण्णा, मुकुला, कुंचिता, अभितप्ता, जिह्मा,
ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विकोशा,
त्रस्ता तथा मदिरा । इस प्रकार सभी मिलाकर ये दृष्टियाँ ३६ हो जाती
हैं, जिनके मैंने नाम यहाँ बतलाए हैं ॥ ४०-४२ ॥
अस्य दृष्टिविधानस्य नानाभावरसाश्रयम् ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि यथाकर्मप्रयोगतः ॥ ४३ ॥
अब मैं इन दृष्टियों के अनेक रस तथा भावों के आश्रित (अभिव्यंजक)
कर्म तथा प्रयोगों के अनुसार लक्षण बतलाता हूँ ॥ ४३ ॥
रसाभिव्यंजक दृष्टियाँ (लक्षण एवं प्रयोग)—
हर्षप्रसादजनिता⁵ कान्तात्यर्थं समन्मथा ।
सभ्रूक्षेपकटाक्षा च शृङ्गारे दृष्टिरिष्यते ॥ ४४ ॥
जब अतिशय स्नेह (राग) में आविष्ट व्यक्ति भौंहें और कटाक्षपूर्ण
१. दम्भा—ख० । २. साभिमाना—ख०, ग० । ३. त्रस्ताथ—ग० ।
४. स्तासु नाट्यं प्रतिष्ठितम्—क०। ५. जनितकोपामर्ष—ख० ।

९२ नाट्यशास्त्रम्
दृष्टि से देखे तो हर्ष और प्रसाद (मनोविनोद) से उद्भूत ऐसी दृष्टि 'कान्ता'
कहलाती है। इसका प्रयोग शृङ्गाररस में किया जाए ॥ ४४ ॥
प्रोद्वृत्तनिष्पन्धपुटा स्फुरदुद्वृत्ततारका।
दृष्टिर्भयानकात्यर्थं भीता ज्ञेया भयानके ॥ ४५ ॥
जिसमें पलकों को ऊपर उठाकर स्थिर कर दिया जाए और पुतलियों
को ऊपर की ओर चमकाते हुए गोल घुमाव दिया जाए तो 'भयानका' दृष्टि
होती है। यह अतिशय भय को सूचित करती है और इसका प्रयोग
'भयानकरस' में किया जाता है ॥ ४५ ॥
क्रमादाकुञ्चितपुटा सविभ्रान्ताल्पतारका।
हास्या दृष्टिस्तु कर्त्तव्या कुहकाभिनयं प्रति ॥ ४६ ॥
'हास्या' दृष्टि में दोनों पलकें क्रमशः सिकुड़ी हुई रहती हैं और ये
पुतलियों के साथ थोड़ी खुली तथा घूमती हुई (विभ्रान्त) रखी जाती
हैं। इसका प्रयोग गुदगुदाने या छू कर हंसाने के प्रदर्शन के अवसर पर
किया जाए ॥ ४६ ॥
पतितोर्ध्वपुटा सास्रा मन्युमन्थरतारका।
नासाग्रानुगता दृष्टिः करुणा करुणे रसे ॥ ४७ ॥
जिसमें दोनों उपरी पलकें नीचे की ओर आ रही हों, क्रोध के कारण
पुतलियाँ धीमी हो गई हों, आँखों से आँसू ढलकते हों तथा नासिका की
नोक पर दृष्टि स्थित हो तो उसे 'करुणा' दृष्टि समझना चाहिए। इसका
'करुणरस' में प्रयोग होता है ॥ ४७ ॥
या त्वाकुञ्चितपक्ष्माग्रा साश्चर्योद्वृत्ततारका।
सौम्या विकसितान्ता च साद्भुता दृष्टिरद्भुते ॥ ४८ ॥
जिस (दृष्टि) में बरौनियाँ नोक पर थोड़ी सिकुड़ी हुई रहें, पुतलियाँ
आश्चर्य से ऊपर की ओर उठी हुई रहें और आँखें खिली हुई दशा को
सुन्दरतापूर्वक प्रदर्शित करें तो उसे 'अद्भुता' दृष्टि जानो। इसे अद्भुत-
रस में प्रयुक्त किया जाए ॥ ४८ ॥
क्रूरा रूक्षारुणोद्वृत्ता निष्पन्धपुटतारका।
भ्रुकुटीकुटिला दृष्टिः रौद्री रौद्ररसे स्मृता ॥ ४९ ॥
१. भयानकेत्यर्थं हीना ज्ञेया भयानका—क०।
२. विभ्रान्ताकुलतारका—ग ३ चकितो, प्रतीतो—क०।
४. रौद्री रौद्रे प्रकीर्तिता—क, रौद्रे रौद्री रसा स्मृता—ग०।

अष्टमोऽध्यायः १३
ऐसी क्रूर-दृष्टि जिसमें पुतलियाँ रूखी, लाल तथा घूमने वाली
हों, पलकें स्थिर हों तथा भ्रुकुटी टेढ़ी हों तो ऐसी दृष्टि 'रौद्री' कहलाती
है। इसका प्रयोग रौद्ररस में किया जाए ॥ ४९ ॥
दीप्ता विकसिता क्षुब्धा गम्भीरा समतारका।
उत्फुल्लमध्या दृष्टस्तु वीरा वीररसाश्रया ॥ ५० ॥
जो दृष्टि चमकीली, फैली हुई, क्षुब्ध गम्भीर हो, पुतलियाँ बीच में
स्थित हों तथा जिसका मध्यभाग खिला हुआ हो तो (यह) 'वीरा'
दृष्टि कहलाती है। इसे वीर रस में प्रयुक्त किया जाता है ॥ ५० ॥
निकुञ्चितपुटापाङ्गा घूर्णोपप्लुततारका।
संश्लिष्ट१स्थिरपद्मा च बीभत्सा दृष्टिरिष्यते ॥ ५१ ॥
जिसमें पलकों से नेत्रों के कोने ढंक लिये गए हों, पुतलियाँ घुमाव के
कारण दबी (उपप्लुत) या विघ्नित हों और बरौनियाँ एक दूसरे से मिली
हुई और स्थिर हों तो (यह) 'बीभत्सा' दृष्टि कहलाती है

१४ नाट्यशास्त्रम्
पुतलियाँ स्थिर हों तो आनन्द-जन्य अश्रुओं से पूर्ण ऐसी दृष्टि 'स्निग्धा'
कहलाती है। इसका 'रति' नामक स्थायी भाव में प्रयोग करना चाहिए ॥
चला हसितगर्भा च विशत्तोरानिमेषिणी ।
किञ्चिदाकुञ्चिता हृष्टा दृष्टिर्हासे प्रकीर्तिता ॥ ५४ ॥
जिसमें दृष्टि घूमने वाली (चंचल) हो, पलकें थोड़ी सी लगती हुई
रहें और जिसकी पुतलियाँ पूर्णरूप से देखने योग्य न रह गई हों, पलक
गिरती न हों तथा वे थोड़ी सिकुड़ी हुई हो तो ऐसी 'हृष्टा' दृष्टि कहलाती
है। यह 'हास' नामक स्थायीभाव में प्रयुक्त होती है ॥ ५४ ॥
अर्धस्रस्तोत्तरपुटा ३किञ्चित्संरब्धतारका ।
मन्दसञ्चारिणी दीना सा शोके दृष्टिरिष्यते ॥ ५५ ॥
जिस (दृष्टि) में ऊपरी पलक थोड़ी झुकी रहें, पुतलियाँ (थोड़ी)
रुकी (ढंकी) हुई रहें और जिसका हलन-चलन मन्द गति से हो रहा हो तो
उसे 'दीना' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'शोक' स्थायीभाव में किया जाए ॥
रूक्षा स्थिरोद्वृत्तपुटा निष्पन्दोद्वृत्ततारका ।
कुटिलैर्भ्रुकुटी दृष्टिः क्रुद्धा क्रोधे विधीयते ॥ ५६ ॥
जो दृष्टि रूखी हो जिसमें पलकें ऊपर की ओर तथा गतिहीन हो पुत-
लियाँ ऊपर की ओर घूमने वाली तथा स्थिर हों और भ्रुकुटी टेढ़ी हो तो
उसे 'क्रुद्धा' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'क्रोध' स्थायीभाव में किया जाए ॥
संस्थिते तारके यस्याः स्थिराँ विकसिता तथा ।
सत्त्वमुद्गिरती दृप्ता दृष्टिरुत्साहसम्भवा ॥ ५७ ॥
जिस दृष्टि में आंखे स्थिर और पूरी तरह फैली हो, पुतलियाँ स्तब्ध
हों तथा जिससे सत्व प्रकट हो रहा तो उसे 'दृप्ता' दृष्टि जानो। इसका
प्रयोग 'उत्साह' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ५७ ॥
विस्फारितोभयपुटा भयकम्पिततारका ।
निष्क्रान्तमध्या दृष्टिस्तु भयभावे भयान्विता ॥ ५८ ॥
जिसमें आँखों की पुट पूरी तरह फैली हों, पुतलियाँ भय से काँप रही
१. विशत्ताराभिलाषिणी—ख०; विश्वतारानिमेषिणी—ग० ।
२. अर्धस्रस्तो—ख०; ईषत्तस्रस्तो—ग० ।
३. रुद्धतारा जलाविला—क–ख० ।
४. रुच्यते—क० । ५. कुटिला—ग० । ६. स्थिता—ग०

अष्टमोऽध्यायः १५
हों और जो बीच के स्थान से थोड़ी हटकर रखी जाए तो वह 'भयान्विता'
दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'भय' नामक स्थायी भाव में किया जाए ॥५८॥
सङ्कोचितपुटाध्यामा दृष्टिर्मीलिततारका।
लक्ष्योद्देशात् समुद्विग्ना जुगुप्सायां जुगुप्सिता ॥ ५९ ॥
जिसमें पलकें सिकुड़ी और परस्पर न मिलती हों, पुतलियाँ घूमती हों
और वे (दृष्टि में आने वाले) लक्ष्य से लौटने वाली रखी जाए तो उसे
'जुगुप्सिता' दृष्टि जानो। इसका प्रयोग 'जुगुप्सा' स्थायी भाव में किया जाए ॥
भृशमुद्वृत्ततारात्र नैष्ठोभयपुटाञ्चिता ।
समा विकसिता दृष्टिर्विस्मिता विस्मये स्मृता ॥ ६० ॥
जो बराबर खुली (या फैली) हुई हो, जिसमें पुतलियाँ ऊपर की ओर
घुमाव लेती हुई और पलके स्थिर हों तो 'विस्मिता' दृष्टि जानो। इसका
प्रयोग 'विस्मय' स्थायी भाव में किया जाए ॥ ६० ॥
स्थायिभावाश्रया ह्येता विज्ञेया दृष्टयो बुधैः।
सञ्चारिणीनां दृष्टीनां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६१ ॥
ये दृष्टियाँ स्थायी भावों की हैं। अब संचारी भावों में होने वाली
दृष्टियों के लक्षण बतलाता हूँ ॥ ६१ ॥
संचारी भावों की अभिव्यंजक दृष्टियाँ—
समतारा समपुटा निष्कम्पा शून्यदर्शना।
बाह्यार्थाग्राहिणी क्षामा शून्या दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६२ ॥
जो क्षीण तथा स्थिर दृष्टि हो जिसमें पुतलियां और पलकें सम हों
और अपने स्थान पर ही लौटने वाली होकर जो किसी भी बाह्य-पदार्थ को
ग्रहण न करें तो उसे 'शून्या' दृष्टि जानो ॥ ६२ ॥
प्रस्पन्दमानपक्ष्मौन्ता नात्यर्थमुकुलैः पुटैः ।
मलिनान्ता च मलिना दृष्टिर्विह्वंततारका ॥ ६३ ॥
जिसकी बरौनियां घूजती हों, जिसमें पलकें अतिशय सिकुड़ी हुई न
१. पुटश्यामा—क, पुटन्यासा—ख०, ग० । २. पक्ष्मोद्देशात् ग० ।
३. विमलोद्वृत्त—ग० । ४. दृष्टोभय—ख०-ग० ।
५. दृष्टयो लक्षिता मया—ख० । ६. बाह्यार्थग्राहिणी ख-ग० ।
७. ध्यामा—क० श्यामा—ख० । ८. प्रस्यन्दमान—ख-ग० ।
९. पक्ष्मा या—क० पक्ष्माग्रा—क० । १०. विभ्रान्त—क; विस्मित—ख-ग० ।

१६ नाट्यशास्त्रम्
रहें, आँखों के कोने मलिनता लिए हों और जिसमें पुतलियां घूमती न रहें
( विहततारका ) तो उसे 'मलिना' दृष्टि जानो ॥ ६३ ॥
श्रमात्¹ प्रम्लापितपुटा ²क्षामान्ताञ्चितलोचना ।
स्रस्ता पतिततारा च श्रान्ता दृष्टिः प्रकीर्तिता ॥ ६५ ॥
श्रम के कारण जिसकी पलकें म्लान हो गई हों, आंखों के कोने सिकुड़
गए हों, दृष्टि निर्बल हो (जिसकी) पुतलियां नीचे झुकी हों, तो उसे
'श्रान्ता' दृष्टि कहते हैं ॥ ६४ ॥
किञ्चिदञ्चितपक्ष्मग्रा पतितोर्ध्वपुटक्रिया ।
त्रपाधोगततारा च दृष्टिर्लज्जान्विता तु सा ॥ ६५ ॥
जिसमें बरौनियों के अग्र भाग थोड़े झुके रहें, भीरुता से उपरी पलकें
नीचे की ओर हों और पुतलियां लज्जा से झुकी हों तो उसे 'लज्जान्विता'
दृष्टि जानो ॥ ६५ ॥
म्लानभ्रूपुटपक्ष्मा⁵ या शिथिला मन्दचारिणी ।
क्लमप्र⁷विष्टतारा च ग्लाना दृष्टिस्तु सा स्मृता ॥ ६६ ॥
जिसमें भौंहें, पलकें तथा बरौनियां म्लान हों, धीरे धीरे घूमती हों
और पुतलियां श्रम के कारण पलकों में ढँकी रहें तो उसे 'ग्लाना' दृष्टि
जानो ॥ ६६ ॥
किञ्चिच्चला स्थिरा किञ्चिदुद्वृत्ता⁸ तिर्यगायता ।
गूढा⁹ चकिततारा च शङ्किता दृष्टिरिष्यते ॥ ६७ ॥
जो दृष्टि कभी हिलती हो कभी स्थिर रहती हो कभी ऊपर कभी
तिरछी और कभी विस्तृत फैली हो, जो कभी गूढ़ हो जाए और जिसमें
पुतलियां भयभीत (या चकित) लगती हों तो उसे 'शंकिता' दृष्टि जानो ॥
विषादविस्तीर्णपुटा पर्यस्तं१०न्ता निमेषिणी ।
किञ्चित्स्निग्धतारा च कार्या दृष्टिर्विषादिनी ॥ ६८ ॥
जो दृष्टि व्यग्र हो, जिसमें विषाद के कारण पलकें फैली हों, नेत्रों के


१. श्रमप्रम्लायित-क, श्रमप्रम्ला-ख-ग० । २. क्षामाका-ख० ।
३. पतितोध्र्वंपुटा ह्रिया-ग० ४. त्रपाधोमुख-ग० ।
५. ग्लान-ग० । ६. च-ग० ।
७. क्रमप्रदृष्ट-क; क्लमप्रवृष्ट-ग० । ८. उत्तुङ्गा-क०, दुन्नता-ख० ।
९. मूढा-क । १०. पर्यस्तारा-ग० ।

अष्टमोऽध्यायः १७
कोने न खुलते और न बन्द होते हों और पुतलियां कुछ स्थिर हों तो
उसे ‘विषादिनी’ दृष्टि जानो ॥ ६८ ॥
स्फुरदाश्लिष्टपक्ष्मार्धा मुकुलोर्ध्वपुटाञ्चिता ।
सुखोन्मीलिततारा^२ च मुकुला दृष्टिरिष्यते ॥ ६९ ॥
जिसमें बरौनियां कुछ कुछ धूजती तथा ( परस्पर ) मिली हुई रहें,
ऊपरी पलकें कलियों जैसी अधखुली हों तथा पुतलियां हर्ष के कारण फैली
हों ( या खिली हों ) तो उसे ‘मुकुला’ दृष्टि जानो ॥ ६९ ॥
या निकुञ्चित^३पक्ष्माग्रा पुटैराकुञ्चितैस्तथा ।
सं^४न्निकुञ्चिततारा च कुञ्चिता दृष्टिरिष्यते ॥ ७० ॥
सिकुड़ी पलकों के कारण जिसकी बरौनियों की नोके झुकी हुई हों और
पुतलियाँ भी (इसी कारण) जिसमें सिकुड़ी हुई रहें तो उसे ‘कुञ्चिता’ दृष्टि
जानो ॥ ७० ॥
मन्दायमानतारा या पुटैः प्रचलितैस्तथा ।
सन्तापोपप्लुता दृष्टिरभितप्ता तु सव्यथा ॥ ७१ ॥
पलकों के हिलने से जिसमें पुतलियां धीरे धीरे घूमती रहती हों तथा
( इस प्रकार ) जो अतिशय दुर्गति और विघ्न को स्वतः प्रदर्शित करती
हो तो ऐसी दृष्टि को ‘अभितप्ता’ जानो ॥ ७१ ॥
लम्बिता कुञ्चितपुटा शनैस्तिर्यङ्^५निरीक्षणैः ।
गूढा^६ऽचकिततारा च जिह्मा दृष्टिरुदाहृता ॥ ७२ ॥
जिसमें पलकें झुकी तथा थोड़ी सिकुड़ी हुई हों, तिरछी चितवन हो,
पुतलियां गूढ़ हों तथा दृष्टि भी ( जिसके कारण गूढ़ हो ) तो उसे
‘जिह्मा’ दृष्टि जानो ॥ ७२ ॥
मधुरा कुञ्चितान्ता च सभ्रूक्षेपा^७ च सस्मिता ।
समन्मथविकारा च दृष्टिः सा^८ ललिता स्मृता ॥ ७३ ॥
जिसका अवलोकन कार्य मधुरता लिये हो, पलकों के कोने सिकुड़े हुए
हों और जो ( दृष्टि ) खिलती हुई भौंहो की हलन चलन द्वारा कामजन्य
विकारों को अभिव्यक्त करने वाली हो तो उसे ‘ललिता’ दृष्टि जानो ॥७३॥
१. स्फुरिताश्लिष्ट—ग० । २. सुखामीलित-क; सुखी मीलित—ख० ।
३. आनिकुञ्चित क, —ख० । ४. सन्नाकुञ्चित—क० ।
५. निरीक्षणी—ख० । ६. निगूढ़ा गूढ़तारा च क०—ख० ।
७. क्षेपाथ—ग० । ८. च—ख० ।
२ ना० शा० द्वि०

१८ नाट्यशास्त्रम्
वितर्कोद्धर्तितपुटा तथैवोत्फुल्लतारका ।
अधोभागंविचारा च दृष्टिरेषा वितर्किता ॥ ७४ ॥
जिसमें अटकल ( या तर्क ) के कारण पलकें उपर उठी हुई हों और
पुतलियां खिली हुई तथा नीचे की ओर हिलने वाली हों तो उसे
‘वितर्किता’ दृष्टि जानो ॥ ७४ ॥
अर्धव्याकोशपक्ष्मा च ह्लादार्धमुकुलैः पुटैः ।
स्मृतार्धमुकुला दृष्टिः किञ्चिल्लुलिततारका ॥ ७५ ॥
जिसमें बरौनियां आधी खिली हों ( या खुली हों ), पलकें भी आधी
खिली (या खुली) हुई हों तथा पुतलियाँ (जिसमें) पूर्ण रूप में खिली हुई एवं
नीचे की ओर घूमती हुई रहती हों तो उसे ‘अर्धमुकुला’ दृष्टि जानो ॥७५॥
विभ्रान्ततारका या तु विभ्रान्तपुटदर्शना ।
विस्तीर्णोत्फुल्लनेत्रौ च विभ्रान्ता दृष्टिरिष्यते ॥ ७६ ॥
जिसमें पुतलियाँ तथा पलकें घूमती हुई रहें और आंखें पूर्ण रूप से
खिली तथा फैली हुई हों तो उसे ‘विभ्रान्ता’ दृष्टि जानो ॥ ७६ ॥
पुटौ प्रस्फुरितौ र्यस्या निष्टब्धौ पतितौ पुनः ।
विप्लुतोद्वृत्ततारा च दृष्टिरेषा तु विप्लुता ॥ ७७ ॥
( पहिले ) जिसमें ( दोनों ) पलकें धूजें और फिर स्थिर हो जाएं तथा
पुतलियाँ विघ्न के कारण ऊपर की ओर फड़कती रहें तो उसे ‘विप्लुता’
दृष्टि जानो ॥ ७७ ॥
आकुञ्चितपुटापाङ्गा सङ्गतार्धनिमेषिणी ।
मुहुर्व्यावृत्ततारा च दृष्टिराकेकरा स्मृता ॥ ७८ ॥
जिसमें पलकें और आँखों के कोने थोड़े सिकुड़े हुए, एक दूसरे से मिले
हुए और आधे खुले हुए हों और पुतलियाँ बार बार गोल घुमाव लेते हुए
रहती हों तो उसे ‘आकेकरा’ दृष्टि जानो ॥ ७८ ॥
विकोशितोभयपुटा प्रोत्फुल्ला चानिमेषिणी ।
अनवस्थिततारा च विकोशा दृष्टिरिष्यते ॥ ७९ ॥
जिसमें दोनों पलकें फैली हुई, खिली हुई तथा न गिरने वाली हों और
पुतलियाँ अव्यवस्थितगतिशील हों तो उसे ‘विकोशा’ दृष्टि जानो ॥७९॥
१. अधोमुख विरा च—क०, अधोगत—ख० ग० । २. दृष्टिरिष्टा—ग० ।
३. तारा—ग० । ४. अनवस्थिततारा च विभ्रान्ताकुलदर्शना—क—ख० ।
५. नयना—क,-मध्या—ख० । ६. यस्य—क० । ७. रुच्यते—ग० ।

अष्टमोऽध्यायः १९
त्रासोद्वृत्तपुटा या तु तथो¹त्कम्पिततारका ।
सन्त्रासोत्फुल्लमध्या च त्रस्ता दृष्टिरुदाहृता ॥ ८० ॥
त्रास के कारण ( जिसमें ) पलकें उठी हुई हों, पुतलियाँ ऊपर की
ओर घूमती रहती हों तथा जिसका खिला हुआ मध्य भाग रहे तो उस
दृष्टि को 'त्रस्ता' कहते हैं ॥ ८० ॥
आघू²र्णमानमध्या या क्षामान्ताञ्चितलोचना ।
दृष्टिर्विकसितापाङ्गा मदिरा तरुणे मदे ॥ ८१ ॥
जिसमें दृष्टि का मध्य भाग घूमने वाला, (आँखों के) कोने पतले और
आखें झुकी हुई रहें और आँखों की नोकें पूर्ण फैली हुई हों तो उसे 'मदिरा'
दृष्टि जानो । इस प्रकार की दृष्टि 'तरुणमद' में रखी जाती है ॥ ८१ ॥
किञ्चिदाकुञ्चितपुटा किञ्चिद्वे³ल्लुलिततारका ।
अनवस्थितसञ्चारा दृष्टिर्मध्यमदे भवेत् ॥ ८२ ॥
'मध्यमद' में इसी दृष्टि में पलकें थोड़ी सिकुड़ी हुई रहती हैं एवं
पुतलियाँ और बरौनियाँ क्रमहीन दशा में (थोड़ी) हिलती रहती हैं ॥८२॥
सनिमेषाऽनिमेषा च किञ्चिद्दर्शिततारका ।
अधोभागचरी दृष्टिरधमे तु मदे स्मृता ॥ ८३ ॥
'अधममद' में इसी दृष्टि में या तो पलकें गिरने लगती हैं या एकदम
रुक जाती हैं, पुतलियाँ थोड़ी मात्रा में देखने लगती है और नीचे की ओर
घूमती रहती है ॥ ८३ ॥
इत्येवं लक्षिता ह्येषा षट्त्रिंशद्दृष्टयो मया ।
रस⁴जा भावजाश्चासां विनियोगं निबोधत ॥ ८४ ॥
इस प्रकार मैंने इन छत्तीस प्रकार की दृष्टियों के लक्षण बतलाये जो
रस तथा भावों की अभिव्यंजक हैं। अब मैं इनकी योजना ( या विधान )
बतलाता हूँ ॥ ८४ ॥
रसजास्तु रसेष्वेव स्थायिषु स्थायिदृष्टयः ।
शृणुत⁵ व्यभिचारिण्यः सञ्चारिषु यथास्थिताः⁶ ॥ ८५ ॥
इनमें रसदृष्टियों की रसों में योजना की जाती है तथा स्थायी-भाव-
दृष्टियों की स्थायी-भावों में । ( जो कि बतला दी गई है अतएव ) अब
१. त्रासादुत्फुल्ल—क०; त्रासोत्कम्पित—ग० ।
२. व्याघूर्णमान—ग० । ३. ह्यनवस्थिततारका—ख—ग० ।
४. सहजा—क० । ५. शृणुध्वं—ग० । ६. यथा हि ताः—ग० ।

२० :नाट्यशास्त्रम्
(अवशिष्ट) व्यभिचारीभावों की अभिव्यंजक दृष्टियों की योजना
बतलाता हूँ ॥ ८५ ॥
संचारी दृष्टियों की योजना—
शून्या दृष्टिस्तु चिन्तायामभितप्तापि कीर्तिता ।
निर्वेदे चापि मलिना वैवर्ण्ये च विधीयते ॥ ८६ ॥
चिन्ता में ‘शून्या’ तथा ‘अभितप्ता’ दृष्टि की एवं निर्वेद तथा वैवर्ण्य
में ‘मलिना दृष्टि’ की योजना करनी चाहिए ॥ ८६ ॥
श्रान्ता श्रमार्त्ते२ स्वेदे च लज्जायां ललिता तथा ।
अपस्मारे तथा व्याधौ ग्लानेयां३ ग्लाना विधीयते ॥ ८७ ॥
श्रम तथा स्वेद में ‘श्रान्ता’ दृष्टि की, लज्जा में ‘ललिता’ की एवं अपस्मार,
व्याधि तथा ग्लानि में ‘ग्लाना’ दृष्टि की योजना की जाए ॥ ८७ ॥
शङ्कायां शङ्किता ज्ञेया विषादार्थे विषादिनी ।
निद्रास्वप्नसुखार्थेषु मुकुला दृष्टिरिष्यते ॥ ८८ ॥
शंका में ‘शंकिता’ की, विषाद में ‘विषादिनी’ की और निद्रा स्वप्न,
तथा प्रसन्नता में ‘मुकुला’ दृष्टि की योजना की जाए ॥ ८८ ॥
कुञ्चितासूयितानिष्टदुष्प्रेक्षाक्षिव्यथासु च ।
अभितप्ता च निर्वेदे ह्यभिघाताभितापयोः ॥ ८९ ॥
असूया, अनिष्ट, तथा कष्ट से अनवलोकनीय वस्तु और आँखों की
पीड़ा में ‘कुञ्चिता’ दृष्टि की तथा निर्वेद, आकस्मिक चोट तथा अति-सन्ताप
में ‘अभितप्ता’ दृष्टि की योजना की जाए ॥ ८९ ॥
जिह्मा दृष्टिरसूयायां जडतालस्ययोस्तथा ।
धृतौ हर्षे सललिता स्मृतौ तर्के वितर्किता४ ॥ ९० ॥
असूया, जड़ता तथा आलस्य में ‘जिह्मा’ की, धैर्य (धृति) तथा हर्ष
में ‘ललिता’ की तथा स्मृति और तर्क में ‘वितर्किता’ दृष्टि की योजना की
जाए ॥ ९० ॥
आह्लादि५ष्वर्धमुकुला गन्धस्पर्शसुखादिषु ।
विभ्रान्ता दृष्टिरावेगे सम्भ्रमे विभ्रमे तथा ॥ ९१ ॥
१ स्तम्भे चापि प्रकीर्तिता—ग० । २. श्रमार्तौ—ख० ।
३. म्लाने ग्लाना—ख, म्लाने ग्लाना—ग० ।
४ स्मृता तर्के च तर्किता—ख०, ग० ।
५ आह्लादेष्वर्ध—ख, ग० । ६. गण्डस्पर्श—क० ।

मधुर गन्ध तथा स्पर्श से होने वाले आनन्द में 'अर्धमुकुला' की और
आवेग, संभ्रम तथा विश्रम में 'विभ्रान्ता' दृष्टि की योजना की जाए ॥९१॥
विप्लुता चापलो^१न्माददुःखार्त्तिमरणादिषु ।
आकेकरा दुरालोके विच्छेदेप्रो^२क्षितेषु च ॥ ९२ ॥
चपलता, उन्माद, दुःख, मानसिक व्यथा तथा मरण आदि में
'विप्लुता' की, दूरी के कारण न दिखलाई देने वाले पदार्थ, वियोग तथा
प्रोक्षण से संस्कृत वस्तु में 'आकेकरा' दृष्टि की योजना करना चाहिए ॥९२॥
विबोधगर्वामर्षौग्र्यमतिषु स्याद् विको^३शिता ।
त्रस्ता त्रासे भवेद्दृष्टिः मदिरा च मदेष्विति ॥ ९३ ॥
विबोध, मति, गर्व, अमर्ष, उग्रता तथा मति में 'विकोशिता' (दृष्टि)
की त्रास में 'त्रस्ता' की तथा मद में 'मदिरा' दृष्टि की योजना करनी
चाहिए ॥ ९३ ॥
षट्त्रिंशद्दृष्टयो ह्येता यथावत् समुदाहृताः ।
रसजानां तु दृष्टीनां भावजानां तथैव च ॥ ९४ ॥
तारापुटभ्रुवां कर्म गदतो मे निबोधत ।
इस प्रकार मैंने इन छत्तीस प्रकार की दृष्टियों का उचित प्रकार से
वर्णन कर दिया। अब रस तथा भाव में होने वाले पुतलियों, पलकों तथा
भौंहों के कार्य बतलाता हूँ ॥ ९४-९५ ॥
पुतलियों के कार्य (तारा-कर्म)—
भ्रमणं वलनं पातश्चलनं सम्प्रवेशनम् ॥ ९५ ॥
विवर्त्तनं समुद्वृत्तं निष्क्रामः प्राकृतं तथा ।
ए^४तानि नवकर्माणि ताराकर्म द्विजोत्तमाः ॥ ९६ ॥
पुतलियों के नव कार्य होते हैं—(१) भ्रमण (२) वलन (३)
पात (४) चलन (५) सम्प्रवेशन (६) विवर्तन (७) समुद्वृत्त (८)
निष्क्राम तथा (९) प्राकृत ॥ ९५-९६ ॥
शृणुध्वं लक्षणं तावत् साम्प्रतं प्रीतितः स्फुटम् ।
पुटा^५न्तर्मण्डलावृत्तिस्तारयोर्भ्रमणं स्मृतम् ॥ ९७ ॥
१. च चलोन्माद—क०, चापलो—ख० । २. विच्छेदे प्रेक्षितेषु—ख, ग० ।
३. द्विकासिता—ख० । ४. पद्यार्धमेतत् ख–ग–पुस्तकयोर्नास्ति ।
५. पर्यन्तमण्डला—क०, पर्यस्तं—ग० ।

२२ नाट्यशास्त्रम्
वलनं गमनं त्र्यश्रं पातनं स्रस्तता तथा।
चलनं कम्पनं ज्ञेयः प्रवेशोऽन्तः प्रवेशनम् ॥ ९८ ॥
विवर्तनं कटाक्षस्तु समुद्वृत्तं समुन्नतिः ।
निष्कामो निर्गमः प्रोक्तः प्राकृतन्तु स्वभावजम् ॥ ९९ ॥
हे मुनियों, पुतलियों के कार्य के ये ९ प्रकार हैं। अब प्रीति पूर्वक
इनके स्फुट लक्षण सुनिये—
पलकों में पुतलियों के गोल घुमाव को 'भ्रमण,' पुतली को तिरछा ले
जाना 'वलन' पुतली का ऊपर से (सीधा) नीचे आना 'पात,' पुतली का
दोनों ओर बराबर घूमना (हिलना) 'चलन,' पुतली का अन्दर खिंचना
या जाना 'सम्प्रवेशन,' एक कोने में पुतली ले जाकर कटाक्षपूर्ण देखना
'विवर्तन,' पुतलियों का फैलाव लेते हुए ऊपर की ओर उठना 'समुद्वृत्त,'
बाहर की ओर पुतलियों का धकेलना 'निष्काम' तथा पुतलियों का अपनी
स्वाभाविक अवस्था में रहना 'प्राकृत' (कर्म) कहलाता है ॥ ९७-९९)
ताराकर्म की अभिनय योजना—
अथै²षां रसभावेषु विनियोगं निबोधत ।
भ्रमणं वल³नोद्वृत्ते निष्कामो वीररौद्रयोः ॥ १०० ॥
निष्क्रामणं सं⁴वलनं कर्त्तव्यं हि भयानके ।
हास्यबीभत्सयोश्चापि प्रवेशनमिहेष्यते ॥ १०१ ॥
पातनं करुणे कार्यं निष्क्रामणमथाद्भुते ।
प्राकृतं शेषभावेषु शृङ्गारे च विवर्त्तितम् ॥ १०२ ॥
स्वभावसिद्धमेवैतत् कर्म लोकक्रियाश्रयम् ।
एवं रसे⁵षु भावेषु ताराकर्माणि योजयेत् ॥ १०३ ॥
अब मैं इनकी रस तथा भावों में की जानेवाली योजना बतलाता हूँ—
भ्रमण, वलन, उद्भृत तथा निष्काम की वीर तथा रौद्र रस में, निष्काम तथा
वलन की भयानक रस में, प्रवेशन की हास्य तथा बीभत्स में, पातन की करुण
में, निष्काम की अद्भुत में, प्राकृत की अवशिष्ट भावों में तथा शृङ्गार रस
में विवर्तित की योजना की जाए । ये पुतलियों के स्वाभाविक तथा लोक-
१. चलनं—ख-ग० । २ तथैषां—ग० । ३. चलनो—ग० ।
४. सचलनं—क०, सञ्चलनं—ख०, संवलनं-ग० ।
५. सर्वेषु—ग० ।

क्रियाओं के आश्रित रहने वाले कार्य हैं। इनकी इसी विधि से रस तथा
भावों में संयोजना की जाए ॥ १००-१०३ ॥
दर्शन (अवलोकन) के विविध प्रकार—
अथात्रैव प्रवक्ष्यामि प्रकारान् दर्शनस्य तु ।
समं साच्यनुवृत्ते च ह्यालोकितविलोकिते ॥ १०४ ॥
प्रलोकितोल्लोकिते चाप्यवलोकितमेव च ।
समतारश्च सौम्यश्च यद् दृष्टं तत्समं स्मृतम् ॥ १०५ ॥
पक्ष्मान्तर्गततारं यत् त्र्यश्रं साचीकृतन्तु तत् ।
रूपनिर्वर्णनायुक्तमनुवृत्तमिति स्मृतम् ॥ १०६ ॥
सहसा दर्शनं यत् स्यात् तदालोकितमुच्यते ।
विलोकितं पृष्ठतस्तु पार्श्वाभ्यान्तु प्रलोकितम् ॥ १०७ ॥
ऊर्ध्वमुल्लोकितं ज्ञेयमवलोकितमप्यधः ।
इत्येष दर्शनविधिः सर्वभावरसाश्रयः ॥ १०८ ॥
अब मैं इन्हीं से सम्बद्ध दर्शन के (विभिन्न) प्रकारों को बतलाता
हूँ। ये आठ होते हैं—(१) सम, (२) साची (३) अनुवृत्त (४) आलोकित
(५) विलोकित (६) प्रलोकित (७) उल्लोकित तथा (८) अवलोकित ।
इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं :—
जिसमें पुतलियां समान तथा सौम्य (विश्रामयुक्त या किसी विशेष
भाव से रहित) हों तो उसे 'सम', जिसमें पुतलियाँ पलकों के अन्दर
दबकर तिरछी हो जाए तो 'साची', चारों ओर किसी भी स्वरूप को ध्यान
पूर्वक देखने पर 'अनुवृत्त', सहसा किसी वस्तु का देखना 'आलोकित',
पीछे की ओर देखना 'विलोकित', (क्रमशः) दोनों कोखों की ओर देखना
'प्रलोकित', ऊपर की ओर देखना 'उल्लोकित' तथा नीचे की (भूमि की)
ओर देखना 'अवलोकित' समझना चाहिए। (इस प्रकार) सभी रसों तथा
भावों में होने वाला दर्शन का यह विधान मैंने बतलाया ॥ १०४-१०८ ॥
पुट-कर्म (पलकों के प्रकार)—
तारागतोऽस्यानुगतं पुटकर्म निबोधत ।
उन्मेषश्च निमेषश्च प्रसृतं कुञ्चितं समम् ॥ १०९ ॥
१. तथा तत्रैव वक्ष्यामः प्रकारं—ग० । २. निर्वापणा—ग० ।
३. स्फुटम्—ग० । ४. इत्यष्टौ—क० ।

२४ नाट्यशास्त्रम्
विवर्तितं सं१ स्फुरितं पिहितं सविता२डितम् ।
अब मैं पुतलियों की गति के अनुसार होने वाले 'पुटकर्म' विधान
(पलकों के विभेदों) को बतलाता हूँ। ये पुटकर्म ९ हैं—(१) उन्मेष
(२) निमेष (३) प्रसृत (४) कुञ्चित (५) सम (६) विवर्तित
(७) स्फुरित (८) पिहित तथा (९) विताडित ॥ १०९-११० ॥
विश्लेषः पुटयोर्यस्तु स३ उन्मेषः प्रकीर्तितः ॥ ११० ॥
समागमो निमेषः स्यादायामः प्रसृतं भवेत् ।
आकुञ्चितं कुञ्चितं स्यात् समं स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ १११ ॥
विवर्तितं समुद्वृत्तं स्फुरितं स्पन्दितं तथा ।
स्थगितं पिहितं प्रोक्तमाहतन्तु विताडितम् ॥ ११२ ॥
इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं :—
पलकों का एक दूसरे से अलग होना 'उन्मेष', उनका इकट्ठा होना
(मिलना) 'निमेष', पलकों का फैलाव 'प्रसृत', पलकों का सिकुड़ना
'कुञ्चित', पलकों का अपनी स्वाभाविक अवस्था में रहना 'सम', पलकों का
ऊपर की ओर उठाना 'विवर्तित', पलकों का स्पन्दन (अर्थात् सिकुड़ाकर
फैलाना) 'स्फुरित', पलकों का बन्द करना 'पिहित' तथा आकस्मिक
रूप में पलकों का पटपटाना 'विताड़ित' कहलाता है ॥ ११०-११२ ॥
पुटकर्म की अभिनय-योजना—
अथैषां रसभावेषु विनियोगं निबोधत ।
क्रोधे विवर्तितं कार्यं निमेषोन्मेषणैः सह ॥ ११३ ॥
विस्मयार्थे च हर्षे च वीरे९ च प्रसृतं स्मृतम् ।
अनिष्टदर्शने गन्धे रसे स्पर्शे च कुञ्चितम् ॥ ११४ ॥
शृङ्गारे च समं कार्यमीर्ष्यासु स्फुरितं तथा१०।
सुप्तमूर्च्छितवातोष्णधूमवर्षाञ्जनात्तिषु११ ॥ ११५ ॥
१. प्रस्फुरितं—ख० । २. सविताडितम्—ख-ग० ।
३. स तून्मेषः—ख, ग० । ४. समागतो—ग० ।
५. आयामस्तु प्रसारितम्—ग । ६ स्पन्दितं—ग० ।
७ वितालितम्—ख-ग० । ८. विवर्तितः कार्यः—ग० ।
९. वीर्ये चैव प्रसारितम्—ग० । १०. भवेत्—ग० ।
११. वर्षाञ्जनादिषु—ख, वर्षाशनाथिषु—ग० ।

अष्टमोऽध्यायः ३६
नेत्ररोगे च पिहितमभिघाते विताडितम् ।
इत्येषु रसभावेषु तारकापुटयोर्विधिः ॥ ११६ ॥
अब इनकी रस तथा भावों में योजना बतलाता हूँ । निमेष, उन्मेष,
तथा विवर्तन की क्रोध भाव में, अद्भुत, वीररस तथा हर्ष भाव में 'प्रसृत'
की, कुत्सित पदार्थ के अवलोकन, गन्ध, रस तथा स्पर्श में 'कुञ्चित' की,
शृङ्गार में 'सम' की, ईर्ष्या में 'स्फुरित' की, निद्रा, मूच्छा, पवन, उष्णता, धुआं,
वर्षा, अंजन-लेपन, पीडा तथा नेत्र-रोग में 'पिहित' की तथा आकस्मिक
चोट में 'विताड़ित' की योजना करनी चाहिए ।
इस प्रकार मैंने रस तथा भाव में होने वाला पुतलियों तथा पलकों का
अभिनय विधान बतलाया ॥ ११६ ॥
भ्रुकुटी-कर्म—
कार्यानुगतमस्यैव भ्रुवोः कर्म निबोधत ।
उत्क्षेपः पातनं चैव भ्रुकुटी चतुरन्तथा ॥ ११७ ॥
कुञ्चितं रेचितञ्चैव सहजञ्चेति सप्तधा ।
अब इन्हीं (पुतलियों तथा पलकों) के अनुसार होने वाले भ्रुकुटी के
कार्यों को बतलाता हूँ। भ्रुकुटीकर्म के सात प्रकार होते हैं—(१) उत्क्षेप,
(२) पातन, (३) भ्रुकुटी, (४) चतुर, (५) कुञ्चित, (६) रेचित
तथा (७) सहज ॥ ११७-११८ ॥
भ्रुवोरुन्नतिरुत्क्षेपः सममेकैकशोऽपि वा ॥ ११८ ॥
अनेनैव क्रमेणैव पातनं स्यादधोमुखम् ।
भ्रुवोर्मूलसमुत्क्षेपाद् भ्रुकुटी परिकीर्तिता ॥ ११९ ॥
चतुरं किञ्चिदुच्छ्वासान्मधुरायतं ता भ्रुवोः ।
एकस्या हि द्वयोर्वापि मृदुभङ्गस्तु कुञ्चितम् ॥ १२० ॥
एकस्या एक ललितादुत्क्षेपाद् रेचितं भ्रुवः ।
सहजातं तु सहजं कर्म स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ १२१ ॥
१. वितालितम्—ख० । २. इत्येवं—ग० ।
३. कार्येऽनुगत—ग० । ४. भ्रुवोः—ख० ।
५. चैव—ग० । ६. रुद्रति—ख० ।
७. एकस्य वा द्वयोर्वापि—ग० । ८. द्वयो—क० ।
९. मधुरायतयोर्भ्रुवोः—ग० । १० उभयो—ख-ग० ।
११. मृदुभागेन--क; मृदुभङ्गेन—ख-ग० ।

२६ नाट्यशास्त्रम्
इनके लक्षण इस प्रकार हैं—भ्रुकुटियों का एक साथ या क्रमशः ऊपर
चढ़ाना 'उत्क्षेप', इसी क्रम से ( उनका ) नीचे उतारता 'पातन', भ्रुकुटी
के ( दोनों ) मूलों को एक साथ ऊपर चढ़ाना 'भ्रुकुटी', दोनों भ्रुकुटियों
की थोड़े हलन चलन के द्वारा मधुरता तथा विस्तार को 'चतुर', भ्रुकुटियों
का क्रमशः धीरे धीरे या ( दोनों को ) एक साथ पास पास झुकाना (लाना)
'कुंचित', एक भ्रुकुटी को लालित्य पूर्ण ढंग से ऊपर की ओर उठाना
'रेचित' तथा भ्रुकुटियों का अपनी स्वाभाविक दशा में होने वाला कर्म
'सहज' कहलाता है ॥ ११८-१२१ ॥
भ्रुकुटी-कर्म की ( अभिनय ) योजना—
अथैषां सम्प्रवक्ष्यामि रसभावप्रयोजनम् ।
कोपे वितर्के हेलायां लीलादौ सहजे तथा ॥ १२२ ॥
दर्शने श्रवणे चैव भ्रू वमेकां समुत्क्षिपेत् ।
उत्क्षेपो विस्मये हर्षे रोषे चैव द्वयोरपि ॥ १२३ ॥
असूयिते जुगुप्सायां हासे घ्राणे च पातनम् ।
क्रोधस्थानेषु दीप्तेषु योजयेद् भ्रुकुटीं बुधः ॥ १२४ ॥
शृङ्गारे ललिते सौम्ये सुखस्पर्शे प्रबोधने ।
एवं विधेषु भावेषु चतुरन्तु प्रयोजयेत् ॥ १२५ ॥
अब मैं इनकी रस तथा भावों में योजना बतलाता हूँ :—
क्रोध, वितर्क, हेला, लीला, सहज अवलोकन तथा श्रवण की दशा में
एक भ्रुकुटी को ऊपर की ओर उठाकर तथा विस्मय, हर्ष और रोष की दशा
में दोनों भ्रुकुटी को ऊपर उठाकर 'उत्क्षेप' की योजना की जाए । असूया,
जुगुप्सा, हास तथा सुगन्धित पदार्थ के सूंघने की दशा में 'पातन' की
योजना होती है। क्रोध के विषय तथा दीप्त प्रदेश में 'भ्रुकुटी' की योजना
होती है। शृङ्गार, ललित, सौम्य वस्तु तथा स्पर्श और प्रबोध ( जागना )
भाव में तथा इसी प्रकार के अन्य भावों में 'चतुर' की योजना
की जाए ॥ १२२-१२५ ॥
१. उत्क्षेते—ग० । २. असूयितजुगुप्सायां—ख०; आसूयित—ग० ।
३. स्पर्शे च चतुरं भवेत्—ख—ग ।
४. पद्यार्धमेतत् ख-ग-पुस्तकयोर्नास्ति ।

अष्टमोऽध्यायः २७
[ स्त्रीपुरुषयोश्च संल्लापे नानावस्थान्तरात्मके । ]
मोट्टायिते कुट्टमिते तथा च किलकिञ्चिते ।
निकुञ्चितञ्च कर्तव्यं नृत्ते योज्यन्तु रेचितम् ॥ १२६ ॥
अनाविद्धेषु भावेषु कुर्यात्¹ स्वाभाविकं तथा ।
इत्येवं तु भ्रुवोः प्रोक्तं² नासाकर्म निबोधत ॥ १२७ ॥
( अनेक अवस्थाओं तथा भावों से पूर्ण स्त्री तथा पुरुषों के संलापों में
तथा ) मोट्टायित, कुट्टमित और किलकिंचित में 'कुंचित' का प्रयोग करना
चाहिए। नृत में 'रेचित' का तथा अन्य सामान्य भावों में 'सहज' का
प्रयोग करना चाहिए । इस प्रकार मैंने 'भ्रुकुटी' का कर्म बतलाया । अब मैं
नासिका का कर्म बतलाता हूँ ॥ १२६-१२७ ॥
नासा-कर्म ( लक्षण ) :—
नता मन्दा विकृष्टा च सोच्छ्वासाथ विकूणिता ।
स्वाभाविका चेति बुधैः षड्विधा नासिका स्मृता ॥ १२८ ॥
नता मुहुः श्लिष्टपुटा मन्दा तु निभृता स्मृता ।
विकृष्टा फुल्लितपुटा सोच्छ्वासाकृष्टमारुता ॥ १२९ ॥
विकूणिता सङ्कुचिता समा स्वाभाविकी स्मृता ।
नासिका लक्षणं ह्येतद्विनियोगं निबोधत ॥ १३० ॥
ये नासाकर्म छः प्रकार का होता है—( १ ) नता ( २ ) मन्दा ( ३ )
विकृष्टा ( ४ ) सोच्छ्वासा ( ५ ) विकूणिता तथा ( ६ ) स्वाभाविका ।
बार-बार यदि नासापुट मिलते हों ( चपटे हो जाएँ ) तो 'नता', यदि
नासापुट स्थिर हों तो 'मन्दा', यदि नासापुट फूले हों तो 'विकृष्टा', सांस
नासापुटों में खींचा जाए तो 'सोच्छ्वासा' यदि नासापुट सिकुड़े हों तो
'विकूणिता' तथा सहज भाव में नासापुट रहने पर 'समा' दशा होती है ।
मैंने ये नासिका के लक्षण बतलाए अब मैं इनकी योजना बतलाता
हूँ ॥ १२८-१३० ॥
१. विद्यात्—ख-ग० । २. प्रोक्ता—ख-ग० ।
३. विघूर्णिता—ख० ग० । ४. विकृष्टोत्फुल्लित—ख-ग० ।
५. विघूर्णिता—ख-ग० । ६. स्वाभाविका—ख-ग० ।

२८ :नाट्यशास्त्रम्
योजना—
मंदोत्कम्पसमायुक्ते नारीणामनुरोधने ।
१निश्वासे च नता कार्या नासिका नाट्ययोक्तृभिः ॥१३१॥
निर्वेदोत्सुक्यचिन्तासु मन्दा शोके चं योजयेत् ।
४विकृष्टा तीव्रगन्धे च श्वासरोषभयार्त्तिषु ॥ १३२ ॥
५सोच्छ्वासा मधुरे गन्धे दीर्घोच्छ्वासकृतेषु च ।
६विकूणिता च कर्त्तव्या जुगुप्सासूयितादिषु ॥ १३३ ॥
कार्या शेषेषु भावेषु तज्ज्ञैः स्वाभाविकी तथा ।
स्त्री जन (नायिका) को मनाने, मन्द कम्पन से युक्त रहने तथा सांस
लेने में 'नता' की (पाठान्तर-रोदन के रुक जाने या मन्द हो जाने
तथा उसाँस लेने में 'नता' की) निर्वेद, औत्सुक्य, चिन्ता तथा शोक
में 'मन्दा' की, तीव्रगन्ध, श्वास, रोष भय तथा पीड़ा में (पाठान्तर-तीव्र
गन्ध, रौद्र तथा वीर रस में) 'विकृष्टा' की, मीठी सुगन्ध (इष्ट गन्ध)
दीर्घ श्वास तथा उसाँस में 'सोच्छ्वासा' की, जुगुप्सा, असूया आदि में
'विकूणिता' की (पाठान्तर-हास्य, जुगुप्सा तथा असूया में 'विकूणिता'
की) तथा अवशिष्ट सहज भावों में 'समा' की योजना करनी चाहिए ॥
कपोल-कर्म-लक्षण—
क्षामं फुल्लञ्च पूर्णञ्च कम्पितं कुञ्चितं समम् ॥ १३४ ॥
षड्विधं गण्डमुद्दिष्टमस्य लक्षणमुच्यते ।
क्षामं चार्वनतं ज्ञेयं फुल्लं विकसितं भवेत् ॥ १३५ ॥
९उन्नतं पूर्णमत्रोक्तं कम्पितं स्फुरितं भवेत् ।
स्यात् कुञ्चितं सङ्कुचितं समं प्राकृतमुच्यते ॥ १३६ ॥
१. विच्छिन्नमन्दरुदिते सोच्छ्वासे च नता स्मृता—ख-ग ।
२. पद्यार्धमेतत् ख-ग पुस्तकर्योनास्ति ।
३. प्रकीर्तिता—ख०, तु कीर्तिता—ग० ।
४. तीव्रगन्धे विकृष्टां तां रौद्रे वीरे तथैव च—क०; विकृष्टा तीव्रगन्धोर्ध्व-
श्वासरोषभयार्त्तिषु—ख-ग०।
५. इष्टघ्राणे तथोच्छ्वासे दीर्घोच्छ्वासां प्रयोजयेत्—क० ।
६. विधूर्णिताक्ता हास्ये च जुगुप्सायामसूयिते—ख० ग० ।
७. स्वाभाविकाशेषभावेष्वित्येवं नासिका स्मृता—ख० ।
८. त्ववनतं—ग० । ९. विततं घूर्णमत्रोक्तं—क० ।

अष्टमोऽध्यायः २९
कपोल कर्म के छः प्रकार हैं:—यथा—(१) क्षाम, (२) फुल्ल,
(३) पूर्ण, (४) कम्पित, (५) कुंचित तथा (६) सम । अब मैं इनके
लक्षणों को बतलाता हूँ ।
अवनत या बैठे हुए कपोल हों तो 'क्षाम', फूले या भरे हुए कपोल
'विकसित', उन्नत या ऊँचे उठे हुए कपोल 'पूर्ण', कम्पित या धूजते हुए
कपोल 'कम्पित', सिकुड़े हुए कपोल 'कुंचित' तथा स्वाभाविक दशा में स्थित
कपोल 'सम' कहलाते हैं ॥ १३४-१३६ ॥
योजना—
गण्डयोर्लक्षणं प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ।
क्षामं दुःखेषु कर्तव्यं प्रहर्षे फुल्लमेव च ॥ १३७ ॥
१पूर्णमुत्साहगर्वेषु रोषहर्षेषु कम्पितम् ।
कुञ्चितञ्च सरोमाञ्चं २स्पर्शं शीते भये ज्वरे ॥ १३८ ॥
प्राकृतं शेषभावेषु गण्डकर्म भवेदिति ।
इस प्रकार मैने कपोलों के लक्षण वर्णन किये अब मैं इनकी योजना
बतलाता हूँ । दुःख में 'क्षाम' की, हर्ष में 'फुल्ल' की, उत्साह तथा गर्व में
'पूर्ण' की, रोष तथा हर्ष में 'कम्पित' की, रोमांच, स्पर्श, शीत, भय तथा
ज्वर में 'कुंचित' की तथा शेषभावों में 'सम' कपोल की योजना करनी
चाहिए ॥ १३७-१३८ ॥
अधरोष्ठ कर्म-लक्षण—
विवर्त्तनं कम्पनञ्च विसर्गो विनिगूहनम् ॥ १३९ ॥
सन्दष्टकं समुद्गञ्च षट्कर्माण्यधरस्य तु ।
विकू॑णनं विवर्त्तस्तु वेपनं कम्पनं स्मृतम् ॥ १४० ॥
विनिष्कामो विसर्गस्तु प्रवेशो विनिगूहनम् ।
सन्दष्टकं द्विजैर्दष्टं समुद्गः सहितोद्गतिः ॥ १४१ ॥
इत्योष्ठलक्षणं प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ।
अधरोष्ठ कर्म के छः प्रकार हैं—(१) विवर्तन, (२) कंपन, (३)
विसर्ग, (४) विनिगूहन, (५) सन्दष्टक तथा (६) समुद्गक ।
१. घूर्ण—क० । २. कम्पे—ख० ।
३. विवर्त्तने—ग० । ४. विधूर्णनं—ख० ।
५. सन्दष्टको द्विजैर्दष्टः—ख-ग० । ६. समुद्गः सहजोन्नतिः—क० ।

३० नाट्यशास्त्रम्
नीचले ओठ का फड़कना ( या नीचे झुकना ) 'विवर्तन', ओठ का
धूजना 'कम्पन', ओठ का बाहर निकलना 'विसर्ग', ओठ का अन्दर ले
जाना 'विनिगूहन', ओठ का दाँतों से दबाना 'सन्दष्टक' तथा ओंठ को
बाहर की ओर ऊँचा करना 'समुद्गक' कहलाता है । ये अधरोष्ठ के लक्षण
हैं । अब इनकी योजना सुनिये ॥ १३९-१४१ ॥
योजना—
असूयावेदनावज्ञा¹द्धास्यादिषु विवर्तनम् ॥ १४२ ॥
कम्पनं वेद²नाशीतभयरोषजवादिषु ।
स्त्रीणां विलासे बिब्बोके विसर्गो र³ञ्जने तथा ॥ १४३ ॥
विनिगूहनमायासे सन्दष्टं क्रोधकर्म⁴सु ।
समुद्गस्त्वनुकम्पायां चुम्बने चाभिनन्दने ॥ १४४ ॥
असूया, वेदना, लज्जा, अनादर तथा हास्य आदि में 'विवर्तन' की,
वेदना, शीत, भय, क्रोध, वेग आदि में 'कम्पन' की; स्त्रियों के विलास,
बिब्बोक तथा रंजन में 'विसर्ग' की; ( श्रम तथा ) आयास में 'विनिगूहन'
की, क्रोध के कार्य आदि में 'सन्दष्टक' की तथा अनुकम्पा, अभिनन्दन और
चुम्बन में 'समुद्गक' की योजना करनी चाहिए ॥ १४२-१४४ ॥
चिबुक कर्म—( लक्षण )—
इत्योष्ठकर्माण्युक्तानि चिबुकस्य निबोधत ।
कुट्टनं खण्डनं छिन्नं चुक्कितं ⁶लेहितं समम् ॥ १४५ ॥
दष्टञ्च दन्तक्रियया चिबुकन्त्विह लक्ष्यते ।
कुट्टनं दन्तसङ्घर्षः सम्फोटः खण्डनं मुहुः ॥ १४६ ॥
छिन्नन्तु गाढ़संश्लेषश्चुक्कितं⁷ दूरविय्युतिः ।
लेहनं जिह्वया लेहः किञ्चिच्छ्लेषः समं भवेत् ॥ १४७ ॥
दन्तैर्दष्टेऽधरे दष्टमित्येषां विनियोजनम् ।
१. वेदनालज्जालस्यादिषु—ख–ग० ।
२. वेपनं शीतज्वररोगजयादिषु—ग० ।
३. विसर्ग सुरते स्मृतः—ख० । ४. क्रोधकर्मणि—ग० ।
५. चिकितं—ख; चुक्षितं—ग० । ६. लेहनं—ख–ग० ।
७. चिकितं—ख; चुक्षितं—ग० । ८. किञ्चिच्चेष्टः—ख–ग० ।