सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 156

नवमोऽध्यायः ४५
रखे जाएँ तो उनके द्वारा राजा का दर्शन बतलाते हैं और यदि ये स्वस्तिक दशा
में तिरछे रखें जाएं तो इनके द्वारा 'ग्रहों' के दर्शन बतलाए जाते हैं ॥३३॥
तपस्विदर्शने कार्यावूर्ध्वौ चापि पराङ्मुखौ ।
परस्पराभिमुखौ च कर्तव्यौ द्वारदर्शने ॥ ३४ ॥
यदि त्रिपताक मुद्रावाले हाथ ऊपर की ओर उठे तथा उनको फिर पीछे
की ओर रखा जाए तो उससे तपस्विजन का दर्शन बतलाया जाता हैं।
और यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखें जाए तो उनसे द्वार का
स्वरूप या दर्शन बतलाया जाता है ॥ ३४ ॥
उत्तानाधोमुखौ कार्यावग्रे वक्त्रस्य संस्थितौ ।
वडवानलसङ्ग्रामे मकराणाञ्च दर्शने ॥ ३५ ॥
यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखकर फिर (उंगुलियों को
हिलाते हुए) नीचे की ओर मुंह वाले (मिलाकर) किये जाएँ तो उससे
बडवानल, संग्राम तथा मकर की अभिव्यक्ति होती है ॥ ३५ ॥
अभिनेयास्त्वनेनैव वानरप्लवनोर्मयः ।
पवनश्च स्त्रियश्चैव नाट्ये नाट्यविचक्षणैः ॥ ३६ ॥
और नाट्यविद् आचार्यों के मत में इसी हस्तमुद्रा के द्वारा वानर का
उछलना, लहरें, पवन तथा स्त्रियों को भी बतलाया जाता है ॥ ३६ ॥
सम्मुखँप्रसृताङ्गुष्ठः कार्यों बालेन्दुदर्शने ।
पराङ्मुखस्तु कर्तव्यो याने नृणां प्रयोक्तृभिः ॥ ३७ ॥
यदि इसी मुद्रावाले हाथ को सम्मुख रखते हुए अँगूठे को फैला दे तो
उससे बालचन्द्र तथा यदि इसी हाथ को पीछे की ओर मोड़ लिया जाए तो
उससे (शत्रु के विरुद्ध) राजा की चढ़ाई (यान) बतलाई जाती है ॥ ३७ ॥
१कर्तरीमुख—
त्रिपताके यदा हस्ते भवेत् पृष्ठावलोकिनी ।
तर्जनी मध्यमायाश्च तदासौ कर्तरीमुखः ॥ ३८ ॥
१. कर्तरीमुख (उत्पत्ति कथा) इस हस्त के सृष्टा शिव हैं। जब भगवान
शिव ने अन्धकासुर का उच्छेद करने के लिए इस हस्तमुद्रा में पृथ्वी पर एक
चक्कर लगाया तभी से इसका प्रचलन हो गया।
१. कार्यों चोर्ध्वौ चापि—ख०। २. चैव—ख०। ३. च कुस्य—ख०।
४. सङ्क्रामे ख०। ५. पततश्च—ख०। ६. तन्मुख—ख०।