मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
सूत्रों में उपलब्ध इन वचनों के आधार पर पौर्णमासी से पूर्व तक आमावस्या मानी
१४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४८१
त्वेन न कल्प्यते, तथैवैतदपि आपौर्णमास्या अमावास्या नात्येति। आमावा-
स्यायाः पौर्णमासीत्येतदपि दर्शपूर्णमासविषयं न कल्पनीयमिति । तस्मादन्यदु-
दाहार्यम् ॥ १४ ॥
(इति षष्ठं कल्पसूत्राधिकरणम् ॥ ६ ॥)
भा० प्र०-प्रत्यक्ष पठित श्रुतियों के साथ कल्पसूत्रों के उपदिष्ट पदार्थों का विरोध
होने से कल्पसूत्र को अपौरुषेय नहीं माना जा सकता है। जैसे-कल्पसूत्रकार के मत में
सभी तिथियों में दर्शयाग किया जा सकता है।
पूर्व सूत्र की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है कि आचार्य का वचन प्रमाण है।
(आचार्यवचः प्रमाणम्) आचार्य के प्रति छात्रों का आदर भाव होना चाहिए क्योंकि
विनय सम्पन्न को ही गुरु के लिए छात्र बनाने का नियम है। "पौर्णमास्यां पौर्णमास्या
यजेत; अमावास्यायाममावस्यया" अर्थात् पौर्णमासी तिथि में पूर्णमास याग को एवं
अमावस्या तिथि में अमावश्या=दर्शयाग करें-इस प्रत्यक्ष श्रुति का विरोध है। कल्प
सूत्रों में उपलब्ध इन वचनों के आधार पर पौर्णमासी से पूर्व तक आमावस्या मानी
गई है-पौर्णमासेन हविषाऽपरपक्षमभियजेत । स यत्र क्व च पुराऽमावस्यया यजते
स्वस्थाने यज इति विद्यात् । आमावस्येन पूर्वंपक्षम् । स यत्र क्व च पुरा पौर्णमास्या
यजेत स्वस्थाने यज इति विद्यात् । (निदा० सू० २।५)
अमावास्यस्य कालात् पौर्णमासस्य कालो नातीयाद् आपोर्णमासादामावस्यस्य
(बौधा० श्रौ० सू० २८।१२)
आमावास्यायाः पौर्णमासं नात्येति, आपौर्णमास्या आमावास्यम् । (गो० गृ० २।९।१३)
इसी प्रकार कल्पसूत्रकार ने कहा है कि सभी हवि के लिए उपस्थापित द्रव्यों में अग्नि
के द्वारा संस्कार विशेष अर्थात् पर्यग्निकरण करना चाहिए। किन्तु श्रुति में पुरोडाश
का ही पर्यग्निकरण आवश्यक माना गया है-यही उपदिष्ट है। अतः कल्पसूत्र अपौरुषेय
न होने के कारण स्वतः प्रमाण नहीं है। श्रुतिमूलकता=वेदमूलकता ही कल्पसूत्र आदि
के प्रामाण्य का साधन है, अतः प्रत्यक्ष उपलब्ध श्रुतियों के साथ वेद कल्पसूत्र का
विरोध होने पर विरुद्ध कल्पसूत्रादि के विषय की समर्थक श्रुति (वेदवाक्य) जब तक
उपलब्ध नहीं होगी तब तक उस स्थल में अनुष्ठापकत्व रूप अप्रामाण्य ही रहेगा ।
"सर्वत्र"=कल्पसूत्रों में सभी तिथियों में, 'च'=एवम् "प्रयोगात्" = दर्शयाग के
अनुष्ठान का अभिधान होने से, "सन्निधानशास्त्रात् च"=सन्निहित शास्त्र अर्थात्
प्रत्यक्ष श्रुति कह रही है कि अमावस्या तिथि में दर्शयाग करना चाहिए, अतः आचार्य
का वचन प्रमाण नहीं है।
६१
४८२ मीमांसादर्शनम् [ सू०
मीमांसक जी ने भाष्यकार के स्वतः प्रमाण और परतः प्रमाण के विचार परक इस
अधिकरण को अपौरुषेय एवं पौरुषेय के रूप के कुमारिल के विचार की आलोचना की
है । किन्तु, अपौरुषेयत्व ही स्वतः—प्रमाण्य का सूचक है । अतः शब्द का परिवर्तन
अर्थ परिवर्तन का साधन नहीं हो सकता है ॥ १४ ॥
[७] अनुमानव्यवस्थानात्तत्संयुक्तं प्रमाणं स्यात् ॥१५॥ पू०
शा० भा०—अनुमानात् स्मृतेराचाराणां च प्रामाण्यमिष्यते। येनैव हेतुना
ते प्रमाणम्, तेनैव१ व्यवस्थिताः प्रामाण्यमर्हन्ति ।
तस्माद्२ होलकादिः प्राच्यैरेव कर्त्तव्याः, आह्लीनैबुकाद३यो दाक्षिणात्यैरेव ।
उद्वृषभयज्ञादय उदीच्यैरेव । यथा शिखाकल्पो व्यवतिष्ठते । केचित् त्रिशिखाः,
केचित् पञ्चशिखा इति । पूर्वपक्षः ॥ १५ ॥
भा० वि०—एवं श्रुतिमूलत्वेन स्मृत्याचारयोः प्रामाण्यं व्यवस्थाप्य, संप्रति
स्मृत्याचारविशेषाणां व्यवस्थाया दर्शनात् किं तन्मूलभूतापि श्रुतिर्व्यवस्थित-
विषया, किं वा मूलश्रुतेरव्यवस्थितविषयाया एव संभवात् तन्मूलानामपि
स्मृत्यादीनामव्यवस्थितत्वमेवेति विचार्यत इति विषयसंशयसङ्गतयः । प्रयोजनं
तु विचारस्य—होलाकादीनां शक्तमात्रपुरुषानुष्ठेयत्वसिद्धिः । सूत्रं व्याकुर्वन्
पूर्वपक्षमाह—अनुमानादित्यादिना । अनुमीयतेऽनेनेत्यनुमानं=लिङ्गं अनुमापकत्वेन
हि स्मृतेर्गौतमादिप्रणीतायाः, आचाराणां च होलकादीनां प्रामाण्यं मूलश्रुतिं प्रति
त्वयोच्यत इत्यर्थः । ततः किमित्यत आह—येनैवेति । येनैवान्यथानुपपत्तिलक्षणेन
हेतुना ते स्मृत्यादयो मूलश्रुतिं प्रति प्रमाणम्, तेनैव हेतुना व्यवस्थितामेव मूल-
भूतां श्रुतिं प्रति ते प्रामाण्यमर्हन्ति, कुतः स्वयं व्यवस्थिता ? यत इति संबन्धः ।
यथा लिङ्गिनमन्तरेण लिङ्गस्यानुपपत्त्या लिङ्ग्यनुमीयते, तथा व्यवस्थितलिङ्ग-
दर्शनान्यथानुपपत्त्या तादृश एव लिङ्गी युक्तोऽनुमातुमित्याशयः, तदनेनानुमापकस्य
व्यवस्थितधर्मनिष्ठत्वात् तेनानुमीयमानमपि प्रमाणं तत्संयुक्तं धर्मिविशेषविषय-
मेव स्यादिति सूत्रं योजितम् । मूलश्रुतेः व्यवस्थितविषयत्वे फलितमाह—
तस्मादिति । होलाकादिशब्दाः देशाचारविशेषविषयाः । स्मृत्याचाराणां नियत-
कर्तृविषयश्रुतिकल्पत्वे दृष्टान्तमाह—यथेति । कल्पः=कल्पनपूरणमिति यावत् ।
व्यवस्थितमेव दर्शयति—केचिदिति । यथा व्यवस्थितत्रिशिखत्वादिदर्शनात्
व्यवस्थितविषयैव मूलश्रुतिः कल्प्यते, तद्वदत्रापीत्यर्थः ॥ १५ ॥
१. व. हेतुव्यवस्थिता एव ।
२. ब. तद्धोलाकादयः । क. तस्माद् होलाकादयः । ३. ब. नैबुका दाक्षिणात्यै ।
१५ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४८३
सप्तमं होलाकाधिकरणम्
त० वा०—देशधर्मानुदाहृत्य संप्रत्येतद्विचार्यते ।
किं व्यवस्थितमूलास्ते किं वैषां सर्वधर्मता ॥ ६३५
विध्यर्थप्रतिषेधार्थाः क्रियावर्जनचिह्निताः ।
इह सर्व उदाहार्या विचार्याश्च विभागशः ॥ ६३६
प्राच्या याननुतिष्ठन्ति वर्जयन्ति च साधवः ।
तेषामेवोपदिष्टास्ते सर्वेषां वेति चिन्त्यते ॥ ६३७
एवं ये दाक्षिणात्यानां प्रतीच्यानां च केचन ।
उदीच्यानां तथाऽऽचारा विचार्याः सर्व एव ते ॥ ६३८
गृह्यसूत्रादीनामध्ययनेऽपि अयं प्रवर्तनीयः
आद्यं सूत्रद्वयं यावदिदमप्यत्र चिन्त्यताम् ।
गृह्यगौतमसूत्रादिव्यवस्था-सर्वगामिते ॥ ६३९
पुराणमानवेतिहासव्यतिरिक्तगौतम-वसिष्ठ-शङ्ख-लिखित-हारीतापस्तम्बबौ-
धायनादिप्रणीतधर्मशास्त्राणाम्, गृह्यग्रन्थानां च प्रातिशाख्यलक्षणव्रतप्रतिचरणं
पाठव्यवस्थोपलभ्यते । तद्यथा-गौतमीयगोलीये छन्दोगैरेव च परिगृहीते । वासिष्ठं
बह्वृचैरेव, शङ्खलिखितोक्तं च वाजसनेयिभिः । आपस्तम्बबौधायनीये तैत्ति-
रीयैरेव प्रतिपन्ने इत्येवम् । तत्र तत्र गृह्यव्यवस्थाभ्युपगमादि दर्शयित्वा
विचारयितव्यम् किं तानि तेषामेव प्रमाणानि, उत सर्वाणि सर्वेषामिति ।
किं तावत्प्रतिपत्तव्यं व्यवस्थैवेति पाठतः ।
न ह्यन्यत्र स्थिताल्लिङ्गाल्लिङ्ग्यन्यत्रानुमीयते ॥ ६४०
अनुमीयतेऽनेनेत्यनुमानं लिङ्गमेवोच्यते ।
तच्च व्यवस्थितं दृष्ट्वा लिङ्गी तत्रैव गम्यताम् ।
विधिर्वा प्रतिषेधो वा न हि सोऽन्यत्र लिङ्ग्यते ॥ ६४१
तत्र ग्रन्थात्मकात्, आचारात्मकाद्वा लिङ्गाल्लिङ्गिनौ विधिप्रतिषेधावनुमीय-
मानौ तद्विषयावेवानुमातुं शक्येते, नान्यगतौ । कुतः ?
अन्यवेश्मस्थिताद्धूमान्न वेश्मान्तरमग्निमत् ।
प्रमीयते न चादृष्टधूमैरिति हि निश्चितम् ॥ ६४२
यथोपनयनं येषामाधानं च विधीयते ।
तेषामेवाग्निहोत्रादिविधिरप्यवगम्यते ॥ ६४३
४८४ मीमांसादर्शनम् [ सू०
यथा च जातिं-तद्द्भेदकुलधर्मा व्यवस्थिताः ।
तथैव देशधर्मादिव्यवस्थाऽपि भविष्यति ॥ ६४४
यदि स्यात्सर्वगामित्वं विधानप्रतिषेधयोः ।
आचारोऽपि तथैव स्याद् व्यवस्थाहेत्वसम्भवात् ॥ ६४५
सर्वविषयशास्त्रप्रणीतो ह्याचारः सर्वदेशगतशक्तिमत्पुरुषैरग्निहोत्रवदेवा-
नुष्ठीयेत ।
यस्तु तं विनियोगेन कुरुते तद् व्यवस्थितम् ।
तेन नूनं श्रुतिः काऽपि तेषामेवं विधायिका ॥ ६४६
अन्यथानुपपत्त्या च श्रुतिरत्र प्रतीयते ।
तन्मात्रानुपपत्त्या च सा तत्रैवाऽवधार्यते ॥ ६४७
यस्मादयं देशाचारः, अयं वा गृह्यादिग्रन्थोऽन्यथा नोपपद्यते, यदि श्रुति-
मूलकत्वं नास्तीत्यनयोपपत्त्या मूलकल्पना । तस्माद् व्यवस्थितविषयैव साऽध्यव-
सातव्या । तथा चोक्तम्-( यदि च हेतुरवतिष्ठेत निर्देशादिति १-२-३० ) ।
यद्यन्नकरणं हेतुः शूर्पहोमे विधीयते ।
तन्मात्रगतमेवासौ दृष्टान्तमपि कल्पयेत् ॥ ६४८
यदन्नकरणं शूर्पं तेन तेनैव हूयते ।
ततश्चातिप्रसङ्गः स्यान्न दर्विपिठरादिषु ॥ ६४९
एवं व्यवस्थितान् दृष्ट्वा देशाचारान् समन्ततः ।
तन्मात्रविषया युक्ता तन्मूलश्रुतिकल्पना ॥ ६५०
अनुमानव्यवस्थानाद्देशादिनियमादतः ।
तत्संयुक्तं प्रमाणं स्याद्यद्वाक्यमनुमीयते ॥ १५ ॥ ६५१
भा० प्र० -- धर्मसूत्र और गृह्यसूत्र एवं देशाचार के विषय में प्रामाण्य के निर्णय
की दृष्टि से इस अधिकरण की अवतरणा की गयी है—इसको देशाचारों में श्रुतिकल्पना-
धिकरण या होलाकाधिकरण कहा जा जाता है । सामवेदी गौतम धर्मसूत्र एवं गोभिल-
गृह्यसूत्र, बह्वृच=ऋग्वेदी वशिष्ठस्मृति, वाजसनेयी=शुक्ल यजुर्वेदी आपस्तम्ब और
बौधायनप्रणीत स्मृति के अनुसार अपना आचार-व्यवहार करते हैं । इसी प्रकार पूर्व
देशों में रहने वाले होलाका=होली करते हैं, दाक्षिणात्य के आचार के अनुसार आह्ली-
नैवुक=करञ्ज, अर्क आदिवृक्षरूप स्थावर देवता की पूजा करते हैं । करञ्जादिपूजनात्मक-
माह्लीनैवुकमिति । (मीमांसाकौस्तुभ १।३।१५) “स्वस्वकुलागतं करञ्जादिस्थावरदेवता
पूजनमाह्लीनैवुकशब्देनोच्यते" 'मीमांसान्यायमालाविस्तरे' । आचार्य उदयन ने कहा
१५ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४८५
है कि गोबर के द्वारा निर्मित प्रतिमा का दुर्वा आदि से पूजाकर उसके साथ बन्धुत्व की
कल्पना ही आह्लीनैवुक है—यह कतिपय व्यक्तियों का मत है । अन्य आचार्यों की दृष्टि में
मङ्गलवार को दही के मन्थन को आह्लीनैवुक कहा जाता है । कतिपय आचार्यों ने प्रतिदिन
एक मुट्ठी चावल को एक महीने तक पात्र में डालकर उससे घी में एक पूआ बनाकर
देवता के पूजन को आह्नीनैवुक माना है (गोमयमयीं देवतां दूर्वादिभिरभ्यर्च्य ज्ञातित्व-
कल्पनमाह्लीनैवुकमित्येके मङ्गलवारे दधिमन्थनमित्यन्ये । प्रतिदिनं तण्डुलमुष्टिं मासमेकं
भाण्डे निक्षिप्य घृतेन तेनापूपकं देवतापूजनमित्यपरे) [न्यायतात्पर्यपरिशुद्धि पृ० २९२]
इस अवसर पर 'उद्वृषभयज्ञ' आदि उदोच्य=उत्तरदेश में रहने वालों के लिए अनुष्ठान
के योग्य है।
उत्तरापथ में रहने वाले व्यक्ति ज्येष्ठमास की पूर्णिमा को अनेक वृषमोंका पूजन
कर उनकी दौड़ कराते हैं—इसी को उद्वृषभ कहा जाता है। राजस्थान, बिहार आदि
स्थानों में दिवाली के बाद गोवर्धन की पूजा के दिन यह प्रचलित है। सम्प्रति इसकी
छाया मात्र गोपों एवं ब्राह्मणों के द्वारा सुरक्षित है। कृषक गण बैलों को खिला पिलाकर
इस दिन पूजा करते हैं। अनेक रङ्गों से इनकी सींग रंगी जाती है तथा पूजा की जाती
है । (ज्येष्ठमासस्य पौर्णमास्यां बलीवर्दानभ्यर्च्य धावयन्ति सोऽयमुद्वृषभयज्ञ इति ।)
[न्यायमालाविस्तर १।३।१९] इसी प्रकार शिखाकर्म में भी कोई एक शिख कोई दो
शिख आदि ।
इन शिष्टाचारों या कुलाचारों से श्रुति का अनुमान किया जाता है। मूलभूत
श्रुतियों ने ही इस प्रकार विशेष-विशेष स्थानों में विशेष-विशेष सम्प्रदायों के द्वारा
अनुष्ठेय को कर्तव्य मानकर उपदेश किया है । आचार के द्वारा जब श्रुति का अनुमान
किया जाता है, आचार ही जब श्रुति के अनुमान के लिए साधन है=हेतु है। ऐसी
स्थिति में अनुमेय श्रुति हेतुविशिष्ट होगी, क्योंकि, जहाँ हेतु रहता है, वहाँ साध्य रहता
ही है—यही नियम है। जैसे जहाँ धूम रहेगा उस स्थान विशेष में साध्य वह्नि रहेगी,
वहाँ वह्नि का अनुमान होगा। इस प्रकार ये आचार विशेष-विशेष स्थान में वहाँ के
व्यक्तियों के लिए ही कर्तव्य है—वह अन्य स्थान के व्यक्तियों के लिए कर्तव्य नहीं है।
इसी लिए सामवेदी आदि के लिए ही गौतमादि स्मृति के आचार मान्य होंगे अन्य
व्यक्तियों के किए मान्य नहीं होंगे। इसी प्रकार होलाकादि आचार पूर्व देशीय से
अतिरिक्त के लिए कर्तव्य नहीं है। क्योंकि, मूलभूत श्रुति में इस प्रकार की विधि
ही उचित है। जैसे—राजसूय यज्ञ क्षत्रियों के लिए ही कर्तव्य है, एवं वैश्य स्तोम वैश्य
के लिए ही अनुष्ठेय है—यह पूर्व पक्ष है।
“अनुमानव्यवस्थानात्”=जिसके द्वारा अनुमित होता है अर्थात् स्मृति और श्रुति
के साधन या कारण स्वरूप शिष्ट जनों के द्वारा स्वीकृत देशाचार की व्यव्स्था या नियम
होने से “प्रमाणम्”=आचार का मूलभूत अनुमित श्रुतिरूप प्रमाण” तत्संयुक्त=देश
४८६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
आदि सम्बद्ध, स्यात् = होगा । क्योंकि, देश विशेष से आबद्ध शिष्टाचार के द्वारा ही उसके
मूलभूत श्रुतिरूप प्रमाण का अनुमान होता है, इस लिए वह प्रमाण स्वरूप श्रुति भी
देश सम्बद्ध ही होगी अर्थात् विशेष-विशेष आचार उस विशेष देश के लिए ही कर्तव्य
होगा, अन्यत्र के लिए नहीं ॥ १५ ॥
अपि वा सर्वधर्मः स्यात् तन्न्यायत्वाद्विधानस्य ॥१६॥ सि०
शा० भा०—अपि वेति पक्षव्यावृत्तिः । एवंजातीयकः सर्वधर्मः स्यात् ।
कुतः ? तन्न्यायत्वाद् विधानस्य । विधीयतेऽनेनेति विधानं शब्दः । सोऽनु
मीयते स्मृत्या । न च तस्याकृतिवचनता न्याय्या, न च व्यक्तिवचनता । न च
सर्वेषामनुष्ठातृणां यदेकं सामान्यम्, तस्य वाचकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति, योऽनु-
मीयते । तस्मात् सर्वधर्मता विधेर्न्याय्या । कुतः ? पदार्था कर्तव्या इति
प्रमाणमस्ति, व्यवस्थायां तु न किञ्चित्प्रमाणमस्ति ॥ १६ ॥ अथ¹ यदुक्तं यथा
शिखाकल्पो व्यवतिष्ठत² इति ।
भा० वि०—एवं छन्दोगवह्वृचादिपरिगृहीतगौतमवसिष्ठादिस्मृतिविहितानां
तान् प्रत्येव धर्मत्वं प्राच्याद्यनुष्ठीयमानहोलाकाद्याचाराणां तान्प्रत्येवेति
व्यवस्थितत्वे धर्माणां प्राप्ते सिद्धान्तमाह—अपि वेति । व्यवस्थितत्वपक्ष-
व्यावृत्त्यर्थमाह—अपि वेति । होलाकादिः सर्वधर्मः स्यादिति सिद्धान्तप्रतिज्ञां
विवृणोति—एवं जातीयक इति ।
ननु व्यवस्थितलिङ्गदर्शनेन तथाविधलिङ्गानुमानात् तदधीनं धर्मत्वमपि
व्यवस्थितमेव न्याय्यमिति शङ्कते—कुत इति । व्यवस्थितलिङ्गदर्शनेन ह्यनु-
मीयमाना श्रुतिर्व्यवस्थितकर्तृविशेषणवाच्युपपद्युक्तैवानुमातव्या, न च तत्संभव-
तीति वक्तुं सूत्रावयवमवतारयति—तन्न्यायत्वादिति । तस्य सर्वधर्मत्वस्य
न्यायो यस्मिन् विधान इति व्यधिकरणबहुव्रीहिः, तन्न्यायत्वं विधानस्य
दर्शयितुं विधानशब्दार्थं तावदाह—विधीयत इति । विधीयतेऽनुष्ठीयतेऽंशत्रय-
विशिष्टा भावनानेनेति वाच्यं विधानशब्दार्थ इत्यर्थः । ततः किमित्याशङ्क्य
तन्न्यायत्वं दर्शयति—सोऽनुमीयत इति । स्मृत्याचारेण वेत्यर्थः, तथापि कथं
सर्वधर्मत्वसाधकन्यायोपेतत्वं विधानस्येत्याशङ्क्य असति कर्तृविशेषोपादने
विधिनेव सर्वधर्मत्वसिद्धेः विशेषणस्य चाकृत्यादिरूपस्यासंभवादित्याह—न
तस्येति । विधानान्तर्गततया प्रकृतस्योपपदस्य तस्येति परामर्शः, व्यक्तिवचनत्वे
त्वेकपुरुषव्यक्त्यधिकारमेव होलाकादीति व्यक्त्यन्तरस्याननुष्ठानप्रसङ्ग इति भावः ।
१. ब. अथ यथा शिखा । २. क. व्यवतिष्ठते ।
१६ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४८७
नन्वस्तु ब्राह्मणत्वाद्याकृतिवाचित्वमुपपद्येति तत्राह-न चेति । सर्वेषा-
मनुष्ठातृणामिति । अनुष्ठातृणामेव तेषां च सर्वेषामित्यर्थः ब्राह्मणत्वादीनां
चातथाभावादिति भावः । अधिकारवाच्युपपदाभावे फलितमाह-तस्मादिति ।
विधेरिति । निरुपपदविध्यनुमानादित्यर्थः, यद्येवं सर्वधर्मत्वं कथं तर्हि व्यवस्थाया
अनुष्ठानमिति चोदयति-कुत इति । परिहरति-पदार्था इति । सर्वधर्मतायां
प्रमाणसद्भावाद् व्यवस्थितौ तदभावाच्चालस्यं भ्रान्तिर्वानुष्ठानव्यवस्थाकारण-
मित्यर्थः ।
ननु कथं व्यवस्थितौ प्रमाणभावः ? शिखाकल्पादिवदाचारादिव्यवस्थायापि
व्यवस्थितमूलश्रुत्यनुमानादित्युकमनुवदति-अथेति ।। १६ ।।
सिद्धान्तः
त० वा०--अपि वा सर्वधर्मः स्यादित्यत्रोत्तरमुच्यते ।
तन्न्यायत्वाद्विधानस्य शक्तगात्राधिकारिणः ॥ ६५२
इह स्मृतीराचारांश्चोपलभ्य मूलश्रुतिष्वनुमीयमानासु कारणानुविधायिकार्य-
न्यायेनावश्यमुप लभ्यमानकार्यानुरूपकारणानुमानैर्भवितव्यमिति, भावनानाम-
विशेषव्यवच्छिन्नयागदानहोमोपवासादिधात्वर्थविशेषस्वर्गादिफलकारकेतिकर्तव्य -
ताविषयस्तावदनुमातव्याः । एवं वर्जनीयेष्वपि देहेन्द्रियमनोद्वारव्यवहारेषु प्रतिषेध्य-
क्रियाकारकं नरकाद्यनिष्टफलप्रतिषेधक शब्दानुमानमवश्यंभावि । तावता च
योग्यत्वमात्रविषयत्वान्न दिग्देशपरिच्छिन्न कर्तृविशेषाधिकारनियतप्रतिपत्तिलाभः ।
कुतः--त्रिधैव ज्ञायते कर्ता विशेषेण प्रतिक्रियम् ।
योग्यत्वाप्रतिषिद्धत्वविशेषोपपदान्वयैः ॥ ६५३
तदिह विहितानुष्ठानयोग्यता तावत्समस्तार्यावर्तनिवासिवर्णाश्रमाणा मन्धव-
धिरजडमूकादिवर्जमविशिष्टा । वर्जनीययोग्यत्वमपि यथोपलभ्यमानं द्वित्रिचतुर्वर्णा-
श्रममात्रसम्बद्धं वा तदभ्यधिकदर्शनानुमितसमस्तम्लेच्छादिविषयं वा विज्ञायते ।
न त्वत्रोपपदं किञ्चिद्यथाचारानुसारि यत् ।
अनुमीयेत देशस्थदृष्टकर्तृविशेषणम् ॥ ६५४
येऽपि च प्रतिषिध्येरन्देशान्तरनिवासिनः ।
तद्वाच्यपि पदं किञ्चिदनुमातुं न शक्यते ॥ ६५५
योग्यत्वेनाविशेषप्रवृत्तोऽप्यधिकारः केनचित्कर्तृविशेषणपदेन राजा राजसूयेन,
वैश्यो वैश्यस्तोमेनेत्यादिवद्विशेष्येत । न चात्र दृश्यमानाचरितृवाचि किंचिदेक-
मनेकं सम्भावयितुं शक्यम् ।
कुतः—सर्वं नामपदं तावद्व्यक्त्याकृतिनिबन्धनम् ।
यद्यदेवानुमीयेत नैकार्थमपि तद्भवेत् ॥ ६५६
न तावत्प्राच्यत्वदाक्षिणात्यत्वादिजातिः प्रतीच्योदीच्यादिव्यक्तिव्यावृत्ता
सर्वप्राच्यादिव्यक्तिष्वनुगता काचिदुपपद्यते । यद्वचनमुपपदं होलाकाद्यधिकारं
विशिष्यात् । यास्तु मनुष्यत्व-ब्राह्मणत्वादिजातयः तेषु विद्यन्ते, ताः सर्वदेशवासि-
व्यक्तिष्वविशिष्टा इति, नाऽऽचारानुरूपविशेषणसमर्थत्वेन ज्ञायन्ते ।
व्यक्तिवाचि तु यन्नाम तदेकत्रैव वर्तते ।
देवदत्तादिवत्तेन न सिध्येत् कर्तृनैकता ॥ ६५७
न ह्यनन्तभेदानां प्राच्यादिपुरुषव्यक्तीनां व्यस्तसमस्तानां सम्बन्धानुभवा-
सम्भवादेकमभिधानमवकल्पते ।
एतेन गुणक्रियाजातिविशिष्टपुरुषव्यक्तिवचनत्वं प्रत्युक्तम् । न हि काश्चिदपि
गुणक्रियाजातिव्यक्तयः प्रतिदेशव्यवस्थितपुरुषव्यक्त्युपलक्षणयोग्याः संभाव्यन्ते ।
सर्वत्र तत्रापि व्यावृत्त्यविशेषात्१ ।
व्यक्त्याकृतिविनिर्मुक्तः पदार्थो न च विद्यते ।
यमाश्रित्य प्रवृत्तं स्यादधिकारिविशेषणम् ॥ ६५८
कस्यचिन्मतस्योपन्यासः
एतदेव प्रतिपादयन् भाष्यकार आह । शक्तमात्रपुरुषाधिकारप्रवृत्तविधान-
विशेषणं येनोपपदेनानुमीयमानेन क्रियते ‘न तस्याऽऽकृतिवचनता न्याय्या, न
व्यक्तिवचनते’ति । न ह्येते होलाकाद्याः कांचिदाकृतिमनुविधीयन्ते, न व्यक्तिम् ।
न हि यावत्सु पुरुषेष्वेतेऽवस्थिताः तावतामेकेनापि व्यपदेशेनोपसंग्रहः संभवति ।
केषांचित्तस्याऽऽकृतिवचनता न्याय्या, न व्यक्तिवचनतेति ग्रन्थस्तेषामभिप्रायः ।
यथैव ‘जातिं तु बादरायणोऽविशेषात् ६-१-८’ इति सूत्रकारः स्वर्गकामपदं
यौगिकमप्युद्दिश्यमानपुंस्त्वविशेषणासंभवात्फलार्थिमात्रमनुष्यजातिविषयोपपत्तेश्च
सामर्थ्याक्षिप्तजातिमात्राधिकारं वक्ष्यति ।
तथेहापि फलार्थित्वकर्तृशक्त्यावबोधनात् ।
देशधर्मेषु सर्वेषु नरजातेरधिक्रिया ॥ ६५९
कश्चित्पुनराख्यातशब्दार्थमुपवर्णयन्निमं ग्रन्थपाठं दूषयित्वा, अपूर्वमेव समर्थ-
यमानः सूत्रगतयावच्छ्रुतविधानशब्दजनितभ्रान्तिर्विधिभावनयोश्च भेदमपश्यन्तु-
१ क. व्यावृत्तेरिति पाठः ॥
१६ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४८९
भयस्वरूपनिरूपणपर्य्यनुयोगत्रासाद्भावार्थाधिकरणसिद्धान्तं विनाशयन्नेवमाह भाव
इति वाऽनाख्येयः स्वधर्मेणान्यदतः शब्दज्ञानात्कारकवदिति । तेन यः कश्चिदा-
ख्यातप्रत्ययार्थतत्त्वं जिज्ञासमानः पृच्छति ? कः पुनरयं भावः भावना चेति ?
तं प्रत्यनन्यशब्दाख्येयत्वात् केवलप्रत्ययप्रयोगदर्शनाभावाच्च सर्वधात्वर्थ-
सामान्यवचनकरोतिपरलिङाद्युच्चारणमात्रेणैवोत्तरं दास्यते कुर्याच्छब्द इत्यर्थः ।
सर्वश्चाऽऽख्यायमानोऽर्थ आकृतिरूपेण वाऽऽख्यायेत व्यक्तिरूपेण वा । व्यक्त्या-
कृतिगोचरातिक्रान्तिश्च किलाऽऽख्यातशब्देनोपायरहितत्वादनाख्येयोऽस्यार्थ इति ।
तदेव किलानेनापि ग्रन्थेनोक्तं भाष्यकारेण न तस्याऽऽकृतिवचनता न्याय्या, न
व्यक्तिवचनतेति । विधानशब्दो हि सूत्रे पूर्वं प्रकृतः तमेव तच्छब्देन निर्दिश्य
व्यक्त्याकृतिवचनत्वादपनयति ।
कुर्यादित्युरुयमानो हि करोमीति प्रपद्यते ।
न विधेर्भावनाया वा सामान्यव्यक्तिरूपताम् ॥ ६६०
तन्निराकरणम्
तदिदमसंबद्धमेवानुपपत्तिकं च श्रुतिसामान्यमात्रेणान्यार्थमेव सचतुःशृ-
ङ्गादिमन्त्रवद्भाष्यकाराभिप्रेतार्थत्यागेन स्वप्रज्ञाविलसितं प्रकाशयताऽन्यस्मिन्ने-
वार्थे योजितम् । देशाचारसर्वधर्मोपपत्तिविचारणार्थोऽयं ग्रन्थः । स यदि
पूर्वकृतया व्याख्ययोपपदनिराकरणविषयत्वेन वर्ण्यते, तत एतत्सूत्रव्याख्यानेन न
संबध्यते यथोक्तन्यायमार्गेण । यदि तु तत्परित्यागेनाऽऽख्यातप्रत्ययार्थानामना-
ख्येयत्वापत्तिमेव व्यक्त्याकृतिरहितार्थत्वेन वर्ण्येत् ततोऽत्यन्तासंबन्धानुपयुज्य-
माननिरुपपत्तिकार्थत्वेन हेय एव स्यात् ।
तथा हि-यस्मादाख्यातशब्दस्य न व्यक्त्याकृतिवाचिता ।
तस्मात्तद्विहितं कर्म सर्वार्थमिति विस्मयः ॥ ६६१
यदि नाम लिङादिप्रत्ययो भावनाया विधेर्वा व्यक्तिमाकृतिं वा वदेत् ततो
होलाकादयः प्रतिनियतदेशधर्माणो भवेयुः । यतस्तु व्यक्त्याकृतिविनिर्मुक्तोऽव्यपदे-
श्योऽर्थः तस्मात्तद्विहितधात्वर्थविषयः सर्वपुरुषधर्म इत्येवं नीयमानमसंबद्धोदाहरणे
ज्येष्ठमेव स्यात् ।
अनाख्येयत्वमुक्त्वा च पर्यायैः स्वविकल्पितैः ।
अन्वाख्यानं कृतं तच्च पूर्वोक्तेन विरुध्यते ॥ ६६२
विध्युपदेशकत्र्तव्यताभावनाशब्दानां ह्यत्यन्ताभूतमेव बहुभाषित्वाख्यापना-
परपर्य्यायत्वमध्यारोप्यऽऽचक्षाणेन स्वयमनाख्येयत्वमतीव स्थापितम् ।