सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

सूत्रमित्यपेक्षायाम् ॥२५॥

५७६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
पूर्वं प्रत्ययादिति पूर्वपक्षभाष्येणार्थापत्तिः सर्वेषां वाचकत्वे प्रमाणमुक्तेत्यभिप्रेत्य,
अन्यथाप्युपपत्तिलक्षणदूषणाभिधानार्थत्वेनैतत्सूत्रं व्याख्यातम् । इदानीमनुमानोपन्यासार्थं
तद्भाष्यमित्यभिप्रेत्यानैकान्तिकत्वलक्षणहेतुदूषणप्रतिपादनार्थत्वेनैतत्सूत्रं व्याचष्टे—किं
चेति । अनेन च देवदत्तादिशब्दे बालैः प्रयुक्तेऽप्यपटुकारणत्वेन प्रयत्ननिष्पत्तेस्सत्तादिरूपेण
नाशात् कठोरबुद्धिभिरपि बालप्रयुक्तशब्दानुकरणप्रयत्ननिष्पत्तेस्सत्तादिरूपेण नाशादपराध-
भागित्वं दृष्टम् । ततश्च प्रत्ययादितिभाष्योक्तस्य शब्दश्रवणानन्तरभाष्यर्थप्रत्ययलक्षणस्य
वाचकत्वहेतोः, तदुपलक्षितस्य चार्थविषयशब्दप्रयोगलक्षणस्यानैकान्तिकतेति सूत्रं
योजितम् । श्लोकं व्याचष्टे—तत्तेति । गाव्यादिशब्दैरप्यनैकान्तिकाविमौ हेतू इत्याह—
अपभ्रंशाश्चेति । ननु तेषामपि पक्षत्वान्न विपक्षतेत्याशङ्कयाह—कतिषुचिदेवेति ।
एवमपराधभागिन्यवाचकेऽपि शब्दे हेतोर्दर्शनादनैकान्तिकत्वभूतमपशब्दापराधप्रतिपाद-
नार्थमेव तत्—सूत्रमित्युक्तम् । हेतोरेव चानेकान्तिकत्वलक्षणपराधभागित्वम् अनेन सूत्रेणो-
च्यत इत्याह—ततश्चेति । एवमपि सूत्रयोजना सम्भवतीत्यपिशब्दार्थः ।
यद्वा यथा शब्दे अन्ययोच्चारणादपभ्रंशलक्षणापराधभागित्वम्, तथा हेतोरनैकान्ति-
कत्वाद्धेत्वाभासत्वलक्षणापराधभागित्वमित्येवमनैकान्तिकत्वप्रतिपादनार्थंयैतत्सूत्रं योज्य-
मित्याह—अन्यथेति । एवमपि सूत्रयोजना सम्भवतीति चशब्दार्थः । सन्देहापादनार्थत्वं
सूत्रस्योक्तमुपसंहरति—तस्मादिति । नन्वत्र सर्वेषां वा शब्दानां वाचकत्वमेकस्यैव चेति
एवं द्वावेव पक्षौ । तत्र सर्ववाचकत्वपक्षे सन्देहापादनेन निरस्ते, पारिशेष्यादेकस्यैव
वाचकतेति निर्णयसिद्धेरन्येन निर्णयाभिधानमयुक्तमित्याशङ्कयाह--संशयेति । किन्तदुत्तर-
सूत्रमित्यपेक्षायाम् ॥२५॥
भा० प्र०—पूर्वपक्षियों ने कहा कि गो शब्द के समान ही गावी, गोणी आदि
शब्द भी अनादिवाचक है, ऐसा स्वीकार किये बिना व्यवहार की उपपत्ति नहीं हो
सकती है । इसके समाधान में यह कहा गया है कि शब्दों का सर्वथा साधु रूप से
उच्चारण करने के लिए विशेष प्रयत्न आवश्यक है, क्योंकि नाभि प्रदेश से उत्थित,
वक्षः स्थल में विस्तार प्राप्त नाद (शब्द) का कण्ठ आदि स्थलों के संस्पर्श से विशेष-
विशेष आकार में अभिव्यक्त करने के लिए अतिशय प्रयत्न आवश्यक है, उसमें कुछ
भी त्रुटि होने पर शब्द दुष्ट हो जाता है अर्थात् जिस रूप में उच्चारण करने की इच्छा
रहती है, उसन भिन्न प्रकार में उच्चारण होता है । एक ही शब्द अनादि काल से चला
आ रहा है । विशेष वक्ता के उच्चारण के दोष से उसमें विकृति हो जाती है और
भिन्न रूप में उसका उच्चारण होता है, उस शब्द को जिसने उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त
किया है, उसका एवं उस सम्प्रदाय के अन्य लोगों के द्वारा भी उस विकृत रूप में ही
प्रयोग चलने लगता है । इस प्रकार की उपपत्ति दृष्टविरुद्ध न होने से अर्थापत्ति प्रमाण
के आधार पर सभी शब्दों को साधु मानना यह सङ्गत नहीं है । क्योंकि, अन्यथा
उपपत्ति होने पर अर्थापत्ति नहीं मानी जाती है । इसलिए गो, गावी, गोता आदि

२५ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५७७
शब्दों में एक ही को अनादि मानकर साधु और अन्य शब्दों के अनादि न होने से उनको
असाधु या अपभ्रंश माना जाता है।
पतञ्जलि ने महाभाष्य में कहा है कि एक ही शब्द के अनेक अपभ्रंश हैं, जैसे—
गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि । प्राचीन आचार्यों की यह उक्ति एवं शब्द और
अर्थ का अनादि वाच्यवाचकताविषयक युक्ति के अनुसार यही निश्चित होता है कि एक
शब्द साधु है अर वह अनादि है। किसी ने उसका संस्कार कर दिया है—इसलिए वह
संस्कृत=साधु हो गया है, ऐसी बात नहीं है। अनादि वाचक एक साधु शब्द ही मनुष्य
सुलभ अशक्ति के कारण अनेक आकार में परिवर्तित हो गया है और इन्हीं शब्दों ने
प्राकृत आदि भाषाओं में स्थान लाभ किया है। अतः प्राकृत आदि भाषा भी साधु
संस्कृत भाषा है, इसलिए इस भाषा की प्राचीनता में यह अकाट्य युक्ति है।
आशय यह है कि धर्म में वेद ही प्रमाण है। शब्द के प्रामाण्य का आप्त से कथित
होना ही है। वेद अपौरुषेय है, ऐसी स्थिति में आप्त प्रणीत न होने से अनाप्त वाक्य के
समान वे भी अप्रमाण रहेंगे। किन्तु वेद की अपौरुषेयता भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि
पद और पदार्थ के सम्बन्ध से एवं वाक्य और वाक्यार्थ के सम्बन्ध से वेद की पौरुषेयता
ही अनुमित होती है। क्योंकि शब्द और अर्थ का उसकी उत्पत्ति के बाद ही किसी
पुरुष के द्वारा—यह शब्द इस अर्थ का वाचक है या यह वस्तु इस शब्द की वाच्य है—इस
रूप में सङ्केत की कल्पना करने के बाद शब्द का प्रयोग हो सकता है। क्योंकि सङ्केत-
हीन शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता है। पद-पदार्थ के सम्बन्ध के समान ही वाक्य
और वाक्यार्थ का सम्बन्ध भी स्वाभाविक नहीं है, वह भी पुरुष के द्वारा कल्पित है।
क्योंकि पदार्थ ही वाक्यार्थ नहीं है। किसी विशेष अर्थ को व्यक्त करने के लिए ही
कतिपय पदसमूहों को परस्पर सम्बद्ध कर प्रयोग किया जाता है। अतः इस अर्थ के
पदसमष्टिरूप वाक्य का सम्बन्ध, वह भी पुरुष के द्वारा किया गया, कल्पित ही मानना
पड़ेगा, अतः वेद का वाक्य और वाक्यार्थ भी पुरुष के द्वारा निर्मित ही सिद्ध करता है।
वेद को आप्तों के द्वारा निर्मित होना मीमांसकों ने स्वीकार नहीं किया है, ऐसी स्थिति
में इसे अनाप्त वाक्य ही मानना पड़ेगा।
इसके समाधान में मीमांसकों ने कहा है कि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध स्वाभाविक
है। 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे
तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्' (मी० सू० १।१।५) इस सूत्र में औत्पत्तिक शब्द का
अर्थ स्वाभाविक होता है, उत्पत्ति शब्द का अर्थ लक्षण के द्वारा स्वभाव होता है।
वाचक शब्द और वाच्य अर्थ दोनों ही नित्य हैं। अतः उसका स्वभाव भी नित्य है।
इसलिए इन दोनों का सम्बन्ध भी स्वाभाविक अर्थात् नित्य या अकृत अर्थात् अपौरुषेय है।
शब्द को नित्य नहीं मानने पर अर्थ की प्रतीति उपपन्न नहीं होगी। शब्द का
उच्चारण ही अर्थप्रतीति का साधन है, उच्चारण स्वयं फल नहीं है। अतः, अर्थ की
३७

५७८ मीमांसादर्शनम् [ सू०

प्रतीति ही शब्द के उच्चारण का प्रधान उद्देश्य है। यह अर्थप्रतीति यदि शब्दोच्चारण
के द्वारा सम्पन्न न हो तो शब्द का उच्चारण निरर्थक हो जायगा । अतः प्रधानीभूत
अर्थ की प्रतीति में जिससे बाधा न हो इस प्रकार के धर्म की कल्पना ही युक्ति सङ्गत
है। नित्यता और अनित्यता शब्द का धर्म है। शब्द यदि अनित्य रहेगा तो अर्थ की
प्रतीति सम्भव नहीं है। क्योंकि, सम्बन्ध के ज्ञान के बिना केवल शब्द के श्रवणमात्र से
अर्थ का बोध नहीं हो सकता है। क्षणिक वस्तु के सम्बन्ध से ही बोध नहीं हो सकता है।
क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से ही सम्बन्ध की प्रतीति होती है। दो-तीन बार ज्ञान के
बिना अन्वय व्यतिरेक सम्भव नहीं है। क्षणिक वस्तु का एक बार से अधिक ग्रहण सम्भव
ही नहीं है। विभिन्न शब्दों के ग्रहण से अर्थप्रतीति से सम्बन्ध की प्रतीति हो ही
नहीं सकती है। क्योंकि प्रत्येक शब्द भिन्न है, अतः एक के ज्ञान से अन्य का सम्बन्ध
ज्ञान कैसे हो सकता है-? क्योंकि ऐसा मानने पर गो शब्द से अश्व का बोध भी होने
लगेगा। सादृश्यनिबन्धन सम्बन्ध के बोध की सम्भावना नहीं है, अनेक अवयवों की एक
रूपता को ही सादृश्य कहा जाता है। वर्ण निरवयव हैं, अतः उनका सादृश्य सम्भव
नहीं है। यदि किसी एक शब्द का सम्बन्ध गृहीत होता तो सादृश्यनिबन्धन अर्थबोध
हो सकता था, किन्तु सभी शब्द क्षणिक हैं अर्थात् एक क्षण से अधिक काल तक स्थायी
नहीं हैं, ऐसी स्थिति में कोई भी अर्थ किसी को कभी भी ज्ञानगोचर नहीं हो सकता है।
जिसका अर्थ किसी भी समय ज्ञान का विषय नहीं होता है उस शब्द को अर्थयुक्त भी
नहीं कहा जा सकता है। अतः शब्द को क्षणिक मानने पर सभी शब्द अर्थहीन रहेंगे,
ऐसी स्थिति में किसी से भी सादृश्य निबन्धन अर्थप्रतीति होती है-यह मानने पर
एक ही शब्द का अर्थवत्त्व और निरर्थकत्व, मुख्यत्व, गौणत्व इस प्रकार विरुद्ध भाव
की स्थिति माननी पड़ेगी।
शब्द को क्षणिक मानकर सादृश्यनिबन्धन अर्थप्रतीति मानने पर शब्दज्ञान अर्थात्
शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है-इसको भ्रम ही मानना होगा ! क्योंकि शाला शब्द
का श्रवण कर उसका अर्थ गृह न समझकर सादृश्य निबन्धन यदि माला समझा जाय तो
वाष्प को धूम समझने के समान यह भी भ्रम ही होगा ! यदि यह कहा जाय कि शाला
और माला शब्द में भेद होने से पूर्वोक्त अर्थबोध को भ्रम ही मानना पड़ेगा, ऐसी स्थिति
में यह कहा जा सकता है कि अभेद में सादृश्य नहीं होता है। सादृश्य स्थल में किसी
प्रकार का भेद अवश्य ही रहता है। यदि ऐसा न हो तो पूर्व शब्द और पूर्व उच्चारित
शब्द के अभिन्न होने पर शब्द नित्य ही रहेगा, यदि यह कहा जाय कि गावी आदि
अपभ्रंश शब्द से सादृश्यवश जो अर्थ की प्रतीति होती है, उसको भ्रम नहीं कहा जाता
है, अतः अन्य स्थल में भी यही होगा। उस स्थल में गो शब्द के उच्चारण की ही
इच्छा रहती है, किन्तु प्रथम वक्ता की अशक्ति के कारण विकृति होने से ऐसा उच्चारण
होता है, अतः उन स्थलों में भी गो शब्द ही अर्थ का बोधक है। वस्तुतः ऐसे स्थलों में

२५ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५७९
बाधक ज्ञान के रहने पर भी शब्द की यथार्थवाचकता भ्रान्त रहती है। किन्तु ऐसा
होने से सभी शब्दों की भ्रान्तवाचकता नहीं मानी जा सकती है। जहाँ बाधक ज्ञान
रहता है, वहीं वाच्य ज्ञान को भ्रम माना जाता है। यथायथ उच्चारित शब्द की
वाचकता में बाधक किसी के न रहने एवं सभी व्यक्तियों के सम्मुख एक रूप होने से
उसको भ्रम नहीं कहा जा सकता है, एक ही समय शब्द का उच्चारण, ज्ञान एवं
अर्थबोध नहीं हो सकता है, क्योंकि यह परम्परा कथन, युक्ति और अनुभव से सिद्ध है—
इसलिए भी शब्द क्षणिक नहीं है। यदि यह कहा जाय कि शब्द कुछ समय रहकर
विनष्ट हो जाता है, अतः सम्बन्धज्ञानपूर्वक अर्थबोध हो सकता है, किन्तु ऐसी स्थिति में
शब्द यदि कुछ देर तक रहता है, तब सदा क्यों नहीं रहेगा ? जिसके विनाश का कारण
रहता है, उसकी उत्पत्ति होती है या नहीं—इसका परिज्ञान भले ही न हो किन्तु
विनाश तो मानना ही पड़ेगा। जैसे—प्रागभाव उत्पत्तिरहित होने पर भी नाशक कारण
होने से उसका ध्वंस प्राप्त होता है। किन्तु शब्द का नाशक कोई कारण नहीं है, अतः
शब्द का नाश नहीं माना जाता है, या जिन पदार्थों की उत्पत्ति कारण सापेक्ष होती है,
अर्थात् समवायी, असमवायी कारणों के रहने के कारण होती है वहाँ समवायी या
असमवायी कारण के विनाश से उसका विनाश भी होता है। जैसे—तन्तु वस्त्र का
समवायी कारण है, अतः तन्तु का नाश एवं तन्तुसंयोग के नाश से अर्थात् समवायी
कारण वस्त्र का ध्वंस होता है, किन्तु शब्द का समवायी या असमवायी कारण नहीं है—
इसीलिए शब्द निरवयव है।
अस्तु, शब्द की अनित्यत्वरूप धर्म की कल्पना करने पर प्रधानीभूत अर्थप्रतीतिरूप
फल की बाधा होने से वैसे धर्म की कल्पना अनुचित है, कारण वैसा धर्म ही कल्पनीय
है; जो प्रधान में बाधा उत्पन्न नहीं करता है। शब्द के नित्यत्व और विनाशित्व इन दो
धर्मों में उसी धर्म को मानना उचित है, जिससे प्रधानभुत अर्थप्रतीतिरूप फल में बाधा
न हो। अङ्ग के अङ्गत्व की रक्षा के लिए प्रधानीभूत फल में बाधा करना उचित नहीं है।
शब्द अर्थबोध का अङ्ग या साधन है, नित्यता और अनित्यता शब्द का अङ्ग है। शब्द
को विनाशी अर्थात् अनित्य कहा जाय तो प्रधान फल का बाध ही होगा। अतः शब्द
के नित्य न होने पर प्रधान फल अर्थप्रतीति की अन्यथा उपपत्ति नहीं हो सकती है,
अतः शब्द को नित्य ही मानना होगा। अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा शब्द भी नित्यता
सिद्ध होती है। श्लोकवार्तिक में शब्द की नित्यता का विस्तृत विश्लेषण उपलब्ध है,
जिसका विवरण भूमिका के द्वारा प्राप्त करें।
यह आशङ्का की गई है कि गो शब्द के समान गावी, गोणी, आदि शब्द भी
अनादि वाचक है, यह मानना पड़ेगा, अन्यथा व्यवहार की उपपत्ति नहीं हो सकती
है। इस प्रसङ्ग में यह कहा जा सकता है कि व्यवहार की उपपत्ति अन्यथा भी
हो सकती है। शब्द का उचित रूप में सुष्ठु उच्चारण के लिए विशेष प्रयत्न आवश्यक

५८० मीमांसादर्शनम् [ सू०
है, क्योंकि नाभि से उत्थित वक्षःस्थल में विस्तार प्राप्त नाद का कण्ठ आदि स्थलों से
संस्पर्श कर विशेष आकार में अभिव्यक्त करने के लिए प्रयत्न आवश्यक है और जिस रूप
में उच्चारण करना चाहता है, उससे भिन्न रूप में ही उच्चारण हो जाता है। इसलिए
एक ही शब्द अनादिकाल से आ रहा है। किन्तु वक्ता विशेष के उच्चारण के दोष से
उसमें विकार आ जाता है और उसका भिन्न रूप में उच्चारण होने लगता है। उस व्यक्ति
विशेष के सम्पर्क से उस सम्प्रदाय के अन्य व्यक्ति भी उस विकृत उच्चारण के अनुसार
ही प्रयोग करते हैं, और इस प्रकार की उपपत्ति दृष्ट उच्चारण के अनुरूप ही है।
अतः दृष्ट विरुद्ध न होने से अर्थापत्ति प्रमाण के आधार पर जो सभी शब्दों को साधु
मानने की युक्ति समीचीन नहीं है। अन्यथा उपपन्न होने पर अर्थापत्ति प्रमाण के आधार
पर किसी की साधुता का स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अतः गो, गावी आदि
शब्दों में एक ही अनादि है, और वही साधु है, अतिरिक्त शब्द अनादि न होने से अपभ्रंश
या असाधु हैं। अनादि वाचक शब्द ही अशक्ति के कारण अनेक आकारों में परिवर्तित
हो गये हैं, और ये ही प्राकृत आदि में प्रयुक्त होते हैं। अतः प्राकृत भाषा के प्रयुक्त
शब्द ही साधु एवं संस्कृत की अपेक्षा प्राचीन है—यह कथन युक्तियुक्त नहीं है।
‘शब्दे अपराधस्य भागित्वम्’ शब्द में अपराधभागिता अर्थात् दुष्टता होती है।
‘प्रयत्ननिष्पत्तेः’ क्योंकि प्रयत्न के सहयोग से उसका उच्चारण होता है। शब्द का
उच्चारण प्रयत्न सापेक्ष है, अतः शब्द में अपराधभागिता अर्थात् दुष्टता सिद्धान्त सिद्ध है।
आशय यह है कि आलस्य, प्रमाद आदि के द्वारा शब्द जिस प्रकार यत्नपूर्वक
उच्चारण करना चाहिए, वैसा उच्चारण करने में असमर्थ होने पर गावी आदि उच्चारण
होता है, और इस उच्चारण से अपभ्रंश की परम्परा के क्रम में एक शब्द के अनेक
अपभ्रंश हो जाते हैं ॥ २५ ॥
अन्यायश्चानेकशब्दत्वम् ॥ २६ ॥
शा० भा०—न चैष न्यायो यत्सदृशाः शब्दा एकमर्थमभिनिविशमानाः सर्वे-
विच्छिन्नपारम्पर्या एवेति प्रत्ययमात्रदर्शनादभ्युपगम्यते, सादृश्यात्साधु-
शब्देऽप्यवगते, प्रत्ययोऽवकल्प्यते¹। तस्मादमीषामेकोऽनादिः। अन्येऽपभ्रंशाः।
हस्तः करः पाणिरित्येवमादिषु त्वभियुक्तोपदेशादनादिरमीषामर्थेन सम्बन्ध
इति ॥ २६ ॥ सिद्धान्ते युक्तिः ॥
भा० वि०—सूत्रं व्याचष्टे—न चैष न्याय इति। घटः कलशः कुम्भः इत्यादि
व्यवच्छेत्तुं सदृशा इत्युक्तं शालामालेत्यादिव्यवच्छेदाय—एकमर्थमिति। कथ-
१ ब. वकल्पते।