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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 804 में से

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पृष्ठ 535

१४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४८१
त्वेन न कल्प्यते, तथैवैतदपि आपौर्णमास्या अमावास्या नात्येति। आमावा-
स्यायाः पौर्णमासीत्येतदपि दर्शपूर्णमासविषयं न कल्पनीयमिति । तस्मादन्यदु-
दाहार्यम् ॥ १४ ॥
(इति षष्ठं कल्पसूत्राधिकरणम् ॥ ६ ॥)
भा० प्र०-प्रत्यक्ष पठित श्रुतियों के साथ कल्पसूत्रों के उपदिष्ट पदार्थों का विरोध
होने से कल्पसूत्र को अपौरुषेय नहीं माना जा सकता है। जैसे-कल्पसूत्रकार के मत में
सभी तिथियों में दर्शयाग किया जा सकता है।
पूर्व सूत्र की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है कि आचार्य का वचन प्रमाण है।
(आचार्यवचः प्रमाणम्) आचार्य के प्रति छात्रों का आदर भाव होना चाहिए क्योंकि
विनय सम्पन्न को ही गुरु के लिए छात्र बनाने का नियम है। "पौर्णमास्यां पौर्णमास्या
यजेत; अमावास्यायाममावस्यया" अर्थात् पौर्णमासी तिथि में पूर्णमास याग को एवं
अमावस्या तिथि में अमावश्या=दर्शयाग करें-इस प्रत्यक्ष श्रुति का विरोध है। कल्प
सूत्रों में उपलब्ध इन वचनों के आधार पर पौर्णमासी से पूर्व तक आमावस्या मानी
गई है-पौर्णमासेन हविषाऽपरपक्षमभियजेत । स यत्र क्व च पुराऽमावस्यया यजते
स्वस्थाने यज इति विद्यात् । आमावस्येन पूर्वंपक्षम् । स यत्र क्व च पुरा पौर्णमास्या
यजेत स्वस्थाने यज इति विद्यात् । (निदा० सू० २।५)
अमावास्यस्य कालात् पौर्णमासस्य कालो नातीयाद् आपोर्णमासादामावस्यस्य
(बौधा० श्रौ० सू० २८।१२)
आमावास्यायाः पौर्णमासं नात्येति, आपौर्णमास्या आमावास्यम् । (गो० गृ० २।९।१३)
इसी प्रकार कल्पसूत्रकार ने कहा है कि सभी हवि के लिए उपस्थापित द्रव्यों में अग्नि
के द्वारा संस्कार विशेष अर्थात् पर्यग्निकरण करना चाहिए। किन्तु श्रुति में पुरोडाश
का ही पर्यग्निकरण आवश्यक माना गया है-यही उपदिष्ट है। अतः कल्पसूत्र अपौरुषेय
न होने के कारण स्वतः प्रमाण नहीं है। श्रुतिमूलकता=वेदमूलकता ही कल्पसूत्र आदि
के प्रामाण्य का साधन है, अतः प्रत्यक्ष उपलब्ध श्रुतियों के साथ वेद कल्पसूत्र का
विरोध होने पर विरुद्ध कल्पसूत्रादि के विषय की समर्थक श्रुति (वेदवाक्य) जब तक
उपलब्ध नहीं होगी तब तक उस स्थल में अनुष्ठापकत्व रूप अप्रामाण्य ही रहेगा ।
"सर्वत्र"=कल्पसूत्रों में सभी तिथियों में, 'च'=एवम् "प्रयोगात्" = दर्शयाग के
अनुष्ठान का अभिधान होने से, "सन्निधानशास्त्रात् च"=सन्निहित शास्त्र अर्थात्
प्रत्यक्ष श्रुति कह रही है कि अमावस्या तिथि में दर्शयाग करना चाहिए, अतः आचार्य
का वचन प्रमाण नहीं है।
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