मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
सूत्रेण सिद्धान्तमाह—अत आहेति । ननु पारतन्त्र्ये सति विरोधे मूलानुमानासम्भवे-
३४२ मीमांसादर्शनम् [ सू०
यद्वा यथा गाव्यादिशब्दानामवाचकत्वे प्रामाण्यस्यातिप्रसिद्धत्वादनादरे लौकिकानां
वाचकावाचकेषु समदृष्टित्वापत्तेस्तत्कथनं साधुशब्दाधिकरणे करिष्यते, तथा बाह्यत्वधर्मा-
धर्मनिबन्धनाप्रामाण्यस्याप्यतिप्रसिद्धत्वादनादरेणाकथने लौकिकानां मन्वादिनिबन्धनेषु
बाह्येषु च समदृष्टित्वापत्तेस्तत्कथनीयमित्युत्तरशेषः साधर्म्यदृष्टान्तः ।
यद्वा शोभादिविशेषवशेन कलिकालवशेन वाऽधर्मप्राबल्याद् बाह्येष्वेव श्रद्धाविशेषा-
पत्तेः श्रौतस्मार्त्तार्थस्यैव त्यागः प्रसज्येतेत्याह—शोभेति । सन्तु वा लौकिकाः परीक्षकाणा-
मपि सम्भवद्वेदसंयोगत्रैवर्णिकप्रणीतत्वाविशेषात्समदृष्टित्वापत्तिरित्याह—ब्राह्मणेति । बाह्य-
स्मृत्यप्रामाण्यस्यावश्यप्रतिपाद्यतामुपसंहरति—तेनेति ।
पूर्वपक्षमाह—महाजनेति । (आदिपदेनानुपलब्धिविरोधपरिहाराय मूलश्रुतेरपि द्वीपा-
न्तरवर्तित्वमुपादीयते) ननु विरोधे का गतिरित्याशङ्कयाह—तत्रेति । विरोधेऽप्युक्तेन
न्यायेन मूलश्रुत्यनुमानाविघाताद्व्यवस्था विकल्पो वा भविष्यतीत्याशयः । मूलानुमानस्य
चानुपलब्धिविरोधः । प्रत्यक्षश्रुतिमूलत्वपक्षे तु विरोधशङ्कव नास्तीत्याह—यैश्चेति ।
अस्मिन्पक्षे यस्मै यद्रोचते तत्प्रमाणीकुर्यादिति पूर्वोक्तं दूषणं परिहरन्नुपसंहरति-ततश्चेति ।
सूत्रेण सिद्धान्तमाह—अत आहेति । ननु पारतन्त्र्ये सति विरोधे मूलानुमानासम्भवे-
नानपेक्षत्वं स्यात्, वेदवत्तु स्वातन्त्र्यसम्भवे मूलानुमानासम्भवेऽपि न किंचिद् दूष्यतीत्या-
शङ्कयाह—पारतन्त्र्यं तावदिति । अतो वेदमूलत्वमात्रं निराकार्यम् । तच्चापसिद्धान्तापत्ते-
बौद्धादिभिर्वक्तुं न शक्यत इत्याह—वेदमूलत्वं पुनरिति । यदि तु तावदेकदेशी कश्चिदभ्यु-
पगच्छेत् तं प्रत्यनेन सूत्रेण निराकरोति -अन्यच्चेति । वेदविरुद्धस्यापि मन्वादिवाक्यस्य वेद-
मूलत्वाभ्युपगमान्न तेन वेदमूलत्वं निराकर्त्तुं शक्यमित्याशङ्क्य समस्तविद्यास्थानविरुद्धत्व-
मुक्तम् । ग्रन्थकाराणां वा अनेन सूत्रेण वेदविरोधोऽभिधीयत इत्याह —त्रयीमार्गेति । वेद-
विरुद्धाचरणानां तन्मूलोपदेशानुपपत्त्या वेदमूलानुमानस्य बाध इत्याशयः । वेदविरोधिभ्यश्च
सम्पर्कं वेदविरोधिनां वेदमूलोपदेशपरिग्रहानुपपत्तेर्वेदमूलानुमानस्य बाधकमित्याह—
त्रयी बाह्येभ्यश्चेति । चतुर्थवर्णः शूद्रः । निरवसितः वर्णाश्रमाचाररहितः । परिग्रही-
तॄणामपि वेदविरोधो वेदमूलानुमानस्य बाधकोऽनेन ग्रन्थेनोक्तो भवति । आत्मविरुद्धा-
चरितृत्वेन च शाक्यादेर्लोकहितैषित्त्वस्य दूरनिरस्तत्वात्तदुपदेशस्य प्रमाणमूलत्वानुमानं न
युक्तमित्याह—स्वधर्मेति । एतदेवाभियुक्तवचनेन द्रढयति—उक्तं चेति । मनोस्तु क्षत्रिय-
स्यापि प्रवर्त्तकत्वे 'यद्वै किंचिन्मनुरवदत्तद्भेषजमिति वेदानुज्ञातत्वादविरुद्धमित्याशयः ।
स्वधर्मातिक्रम एवालङ्काराभिमानादत्यन्तमूढत्वं प्रतीयत इत्याह — बुद्धादेः पुनरिति ।
तद्ग्रन्थपरिग्रहीतॄणामपि' न शूद्राय मतिं दद्यादित्यादिप्रतिषेधातिक्रमसामर्थ्येन ब्राह्मण-
निन्दाम् तत्कारित्वेन च शाक्यस्तुतिं कुर्वतामत्यन्तमूढत्वमाह—स किलेति । तद्ग्रन्थ-
विहिताचरितॄणां च वेदविरोधो वेदमूलत्वस्य बाधक इत्याह—तदनुशिष्टेति ।
षट्स्वप्यर्थेषु सूत्रं योजयति—तेनेति । बाह्यग्रन्थजातं वेदविरोधादनपेक्ष्यमिति-
प्रथमव्याख्यानेऽर्थः । ग्रन्थकारिणां वेदविरोधात्तत्कृतं ग्रन्थजातमनपेक्ष्यमिति द्वितीये परि-
४ | प्रथमाध्याये तृतीयपादः १४३
ग्रहीतॄणां वेदविरोधात्तेभ्यः समर्पकाणां ग्रन्थकारिणां सम्बन्धिग्रन्थजातमपेक्ष्यमिति तृतीये
परिग्रहीतॄणां वेदविरोधात्त्परिगृहीतं ग्रन्थजातमनपेक्ष्यमित्यर्थोक्ते चतुर्थे । ग्रन्थकारिणा-
मात्मविरुद्धाचरितृत्वात्तत्कृतं ग्रन्थजातमनपेक्ष्यमिति पञ्चमे । आचरितॄणां वेदविरोधात्त-
दनुस्मृतं ग्रन्थजातमनपेक्ष्यमिति षष्ठे ।
वेदविरोधाभावेऽप्यनुपलब्धिविरोधेन पठितश्रुत्यनुमानायोगान्नित्यत्वबाधापत्तेश्च प्रलीन-
शाखागतश्रुत्यनुमानायोगाद् बाह्यग्रन्थप्रामाण्यबाधमित्याह—न चेति । ननु मन्वादिस्मृति-
वद्विप्रकीर्णशाखागतश्रुतिमूलत्वेनानुपलब्धिविरोधपरिहारो भविष्यतीत्याशङ्क्य तासां
क्वचित्संवाददर्शनात् तद्दृष्टान्तेनान्यत्रापि वेदमूलत्वानुमानं युक्तमिति, इह तु क्वचिदपि
संवादाभावाद्दैषम्यमित्याह—न हीति । अहिंसादिवचनस्यापि विषयविशेषानवच्छिन्नस्य
विहितव्यतिरिक्तविषयहिंसादिनिषेधश्रुत्या संवादो नास्तीत्याशयः ।
ननु श्रुतिमूलत्वासम्भवेऽपि प्रमाणान्तरमूलत्वेन प्रामाण्योपपत्तेर्ग्रन्थप्रामाण्यबाधनं न
युक्तमित्याशङ्क्याह—मूलान्तरेति । अत्रैव हेतुदर्शनाच्चेतिसूत्रं योजयति—लोभादीति ।
किञ्चात्रोत्प्रेक्षणीयलोभादिविषयतया हेतुशब्दव्याख्यानेन युक्त एव हेतुशब्दाभिधेया धर्मा-
धर्मोपदेशमूलत्वेन तैरुपन्यस्ताः प्रत्यक्षं दृश्यन्ते इत्याह शाक्यादयश्चेति । ननु याज्ञ-
वल्क्यादिभिरपि ।
'यदुच्यते द्विजातीनां शूद्राद्यारोपसंग्रहः ।
न तन्मम मतं यस्मात्तत्रात्मा जायते स्वयम् ।।' या० स्मृ० अ० ५६
तेन पुनरित्यादिहेतुदर्शनपूर्वकं धर्माधर्मोपदेशनान्न तन्मात्रेण वेदमूलत्वनिराकरणं
युक्तमित्याशङ्क्य वेद एव द्विजातीनां निःश्रेयसकरः परः इत्यादिना तैः प्राधान्येन वेद-
मूलत्वाद्यभिधानात् तेन ह्यन्नं क्रियत इति वदर्थवादार्थं हेत्वभिधानं विज्ञायते । ननु
शाक्यादिभिर्वेदमूलत्वं क्वचिदुक्तमित्याह—न चेति । हेतुमूलत्वेनैव तर्हि प्रामाण्यं
भविष्यत्यत आह—हेतवश्चेति । हेत्वाभासाः-ते, न सम्यग्हेतव इति भावः । हेतुकत्वेन
वा शाक्यादीनामनपेक्ष्यत्वप्रतिपादनायैतत्सूत्रमित्यर्थान्तरन्यासेनाह—एत एव चेति ।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्वैडालव्रतिकांश्छठान् ।
हैतुकान्बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ।। मनु० अ० श्लो०
इति स्मरणाद्वाङ्मात्रेणापि येषामर्चनं न कार्यं ते शाक्यादय एवेत्यर्थः । पाखण्डित्वम्,
विकर्मस्थत्वं च प्रसङ्गादुक्तम्, हेतुदर्शनाच्चेति चकारसूचितं वा । अस्यैव सूत्रस्यान-
पेक्ष्यत्वहेतोर्वेदबाह्यत्वस्य कुदृष्टित्वस्य च दर्शनादिति चतुर्थं व्याख्यानमाह—एतदीयेति ।
स्वामिप्रेतं सिद्धान्तमुपसंहरति तस्मादिति ।
।। इति वार्तिकमतेन द्वितीयं बाह्यमताप्रामाण्यम् ।। ४ ।।
मा० प्र०—औदुम्बरीस्तम्भ के सम्पूर्ण वेष्टन को कहने वाली स्मृति का आशय
प्रदर्शन करते हुए सूत्रकार ने कहा कि सम्पूर्ण औदुम्बरी के वेष्टन करने पर बड़ा वस्त्र
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होगा और उससे उपकार होगा । इसी दृष्टि से किसी ऋत्विक् ने औदुम्बरी स्तम्भ प्रमाण
वस्त्र से उसका वेष्टन किया था और वही स्मृति हो गई, अतः, लोभ आदि दृष्ट कारणों के
आधार पर ही स्मृति होने से श्रुतिमूलक यह स्मृति नहीं है । यतः श्रुतिमूलक यह स्मृति
नहीं है, अतः यह आदरणीय नहीं है । फलतः यह स्मृति अप्रमाण है ।
'हेतुदर्शनाच्च' इस सूत्र का भाष्यकार ने स्वतन्त्र एक अधिकरण के रूप में व्याख्यान
किया है । यथाः-वैसर्जनहोमीयं वासः अध्वर्युर्गृह्णाति अर्थात् वैसर्जन नामक होम का
वस्त्र अध्वर्यु ग्रहण करे, इत्यादि स्मृति प्रमाण है या अप्रमाण है- इस प्रकार के संशय
में पूर्वपक्षी ने कहा कि प्रथम अधिकरण में कथित नियम के अनुसार ही यह स्मृति भी
प्रमाण होगी । इसी प्रस्तुत प्रसङ्ग में सिद्धान्ती ने कहा है कि-"'हेतुदर्शनात् च'" । इस
प्रकार का स्मृतिवचन प्रमाण नहीं । क्योंकि ऐसे स्थल में स्मृति का मूल लोभादि ही
हेतु के रूप में दृष्ट होता है । किसी ऋत्विक् के द्वारा लोभ आदि के कारण सभी वस्त्रों
का ग्रहण करने पर इस प्रकार की प्रथा का प्रचलन हुआ । अतः इस प्रकार की स्मृति
श्रुतिमूलक नहीं है, किन्तु लोभादिमूलक है, अतः यह श्रुतिमूलक न होने से अप्रमाण है ।
यह भी आशङ्का सङ्गत नहीं है कि एकत्र अप्रमाण होने पर सर्वत्र ही अप्रामाण्य होगा;
कारण, ऐसा मानने पर उत्सर्ग और अपवाद का नियम ही समाप्त हो जायेगा । सभी
शास्त्रों में सामान्य विधि और विशेष विधि है और सामान्य विधि विशेष विधि से बाधित
होती है । किन्तु ऐसा होने से ही क्या सामान्य विधि सर्वथा अप्रमाण हो जाती है ? अतः
विशेष विधि के द्वारा सामान्य विधि का बाध होने पर भी जैसे सामान्य शास्त्र का
अप्रामाण्य नहीं होता है वैसे ही किसी-किसी स्थल में स्मृति अप्रमाण होने पर भी उसका
सामान्यतः प्राप्त प्रामाण्य व्याहत नहीं होता है । वरन् वह प्रामाण्य अव्याहत ही रहता है ।
तन्त्रवार्तिक में इस सूत्र की व्याख्या भिन्न रूप से की गई है उनका कथन है कि-
"स्मृतीनां श्रुतिमूलत्वे दृढ़े पूर्वं निरूपिते ।
विरोधे सत्यपि ज्ञातुं शक्यं मूलान्तरं कथम् ॥"
पूर्व अधिकरण में वर्णित युक्तियों के द्वारा महाजन परिगृहीत स्मृतियों की
वेदमूलकता जब दृढ़ रूप से अवधारित है तब उसकी स्थल विशेष में अन्यमूलकता
स्वीकार करना उचित नहीं है, विभिन्न वेद शाखाओं में उपदिष्ट सामान्य आवश्यककर्तव्य
वचन का मनु आदि सर्वज्ञ महर्षियों के द्वारा स्मृति के रूप में स्वतन्त्र भाव से निबद्ध किया
गया है । क्योंकि, उसमें साधारण अनुष्ठेय अन्य शाखाओं में उपदिष्ट सभी विषयों की
अवगति होती है एवं शाखा के साङ्कर्य से सम्प्रदाय का भी उच्छेद नहीं होता है । ऐसी
स्मृति को स्थल विशेष में श्रुतिमूलक और स्थल विशेष में लोभादिपूर्ण कहना शोभा-
दायक नहीं है । यदि यह कहा जाय कि उन स्थलों में लोभादिरूप कारण का जब
अनुमान होता है तब अनुमित का पुनः अनुमान न होने से श्रुतिमूलकता या मूल प्रकृति
का अनुमान नहीं हो सकता है । ऐसी स्थिति में कहना है कि-
४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३४५
रागद्वेषमदोन्मादप्र मादालस्यलुब्धताः ।
क्व वा नोत्प्रेक्षितुं शक्याः स्मृता प्रामाण्यहेतवः ॥
का वा धर्मक्रिया यस्यां दृष्टो हेतुर्न युज्यते ।
कथञ्चिद् वा विरुद्धत्वं प्रत्यक्षश्रुतिभिः सह ॥
लोकायतिकमूर्खाणां नैवान्यत्कर्म विद्यते ।
यावत्, किञ्चिददृष्टार्थं तत् दृष्टार्थं हि कुर्वते ॥
वैदिकान्यपि कर्माणि दृष्टार्थान्येव ते विदुः ।
अर्थात् राग, द्वेष, मद, प्रमाद आलस्य एवं लुब्धता=लोभ आदि के स्थलों में जिसको
स्मृति के मूल की कल्पना कर विशेष स्मृतियों का अप्रामाण्य माना जाता है, किसी स्थल
में ही या उनको स्मृति का मूल मानकर स्मृति के अप्रामाण्य की कल्पना नहीं की जा
सकती है। क्योंकि, सभी स्मृति-वाक्य को राग, द्वेष लोभादिमूलक ही मानना पड़ेगा।
कारण, ऐसा कोई भी धर्म, कर्म नहीं है; जिसके द्वारा साध्य कोई न कोई लौकिक
प्रयोजन न रहे अर्थात् सभी धर्मों का साध्य कोई लौकिक प्रयोजन रहेगा ही और ऐसी
कोई स्मृति भी नहीं है जिसका किसी न किसी श्रुतिवाक्य से किसी न किसी अंश में
विरोध न हो। लोकायतिक एवं मूर्खों को इससे अतिरिक्त कोई काम भी नहीं है। उनको
जो भी अदृष्टार्थक कर्म है सभी को दृष्टार्थक अर्थात् ऐहिक प्रयोजन सम्पादक सिद्ध करना
है। जैसे होम लक्ष्यकर इस समय के चार्वाक कहते हैं कि इससे दूषित वायु नष्ट होती
है। इसीप्रकार जितने भी वैदिक कर्म समूह है उनको दृष्टार्थक अर्थात् लौकिक प्रयोजन
का सम्पादक मानते हैं। यदि स्मृति को लोभादि मूलक कहते हैं तो वेद में भी दक्षिणा-
दान, तुलापुरुषदान, महादान आदि जो कर्म हैं उनको भी स्मृति के समान लोभमूलक
कहा जा सकता है। इसकी पर्यालोचना कर कहा जा सकता है कि --
‘तस्माल्लोकायतस्थानां धर्मनाशनशालिनाम् ।
एवं मीमांसकैः कार्यं न मनोरथपूरणम् ॥
यच्चादौ श्रद्धया सिद्धं पुनर्न्यायेन साधितम् ।
आज्ञासिद्धप्रमाणत्वं पुराणादिचतुष्टयम् ॥
तत्तथैवानुमन्तव्यं कर्तव्यं नान्तराश्लथम् ॥”
आशय यह है कि - इस प्रकार से लोकायतमतावलम्बियों के मनोरथ को पूर्ण
करना मीमांसकों का कर्तव्य नहीं है। किन्तु पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र इन
स्मृतियों का प्रामाण्य उनके द्वारा उपदिष्ट विधि से ही सिद्ध है, इसलिए वैदिक पूर्व से
ही स्वाभाविक श्रद्धा से इन्हें स्वीकार करते हैं और यह युक्तियों से भी साधित है। इनका
प्रामाण्य इसी रूप में अर्थात् वेदमूलक ही सिद्ध करना उचित है, किन्तु मध्य में उसको
शिथिल करना उचित नहीं है अर्थात् स्मृति को स्थल विशेष में लोभादिमूलक