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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन]

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[चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन]

युधिष्ठिर उवाच

चक्रायुध नमस्तेऽस्तु देवेश गरुडध्वज ।
चान्द्रायणविधिं पुण्यमाख्याहि भगवन् मम ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**चक्रधारी देवेश्वर! आपको नमस्कार है। गरुडध्वज भगवन्! अब आप मुझसे चान्द्रायणकी परम पावन विधिका वर्णन कीजिये ॥

श्रीभगवानुवाच

शृणु पाण्डव तत्त्वेन सर्वपापप्रणाशनम् ।
पापिनो येन शुद्ध्यन्ति तत् ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥
**श्रीभगवान् बोले—**पाण्डुनन्दन! समस्त पापोंका नाश करनेवाले चान्द्रायण-व्रतका यथार्थ वर्णन सुनो। इसके आचरणसे पापी मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। उसे मैं तुम्हें पूर्णतया बताता हूँ ॥

ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वैश्यो वा चरितव्रतः ।
यथावत् कर्तुकामो वै तस्यैवं प्रथमा क्रिया ॥
शोधयेत् तु शरीरं स्वं पञ्चगव्येन यन्त्रितः ।
सशिरः कृष्णपक्षस्य ततः कुर्वीत वापनम् ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य—जो कोई भी चान्द्रायण-व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करना चाहते हों, उनके लिये पहला काम यह है कि वे नियमके अंदर रहकर पञ्चगव्यके द्वारा समस्त शरीरका शोधन करें। फिर कृष्णपक्षके अन्तमें मस्तकसहित दाढ़ी-मूँछ आदिका मुण्डन करावें ॥

शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा मौञ्जीं बध्नीत मेखलाम् ।
पालाशदण्डमादाय ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥
तत्पश्चात् स्नान करके शुद्ध हो श्वेत वस्त्र धारण करें, कमरमें मूँजकी बनी हुई मेखला बाँधे और पलाशका दण्ड हाथमें लेकर ब्रह्मचारीके व्रतका पालन करते रहें ॥

कृतोपवासः पूर्वं तु शुक्लप्रतिपदि द्विजः ।
नदीसंगमतीर्थेषु शुचौ देशे गृहेऽपि वा ॥
द्विजको चाहिये कि वह पहले दिन उपवास करके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको नदियोंके संगमपर, किसी पवित्र स्थानमें अथवा घरपर ही व्रत आरम्भ करे ॥

आघारावाज्यभागौ च प्रणवं व्याहृतीस्तथा ।
वारुणं चैव पञ्चैव हुत्वा सर्वान् यथाक्रमम् ॥
सत्याय विष्णवे चेति ब्रह्मर्षिभ्योऽथ ब्रह्मणे ।

विश्वेभ्यो हि च देवेभ्यः सप्रजापतये तथा ।।
षडुक्ता जुहुयात् पश्चात् प्रायश्चित्ताहुतिं द्विजः ।
पहले नित्य-नियमसे निवृत्त होकर एक वेदीपर अग्निकी स्थापना करे और उसमें क्रमशः आघार, आज्यभाग, प्रणव, महाव्याहृति और पञ्चवारुण होम करके सत्य, विष्णु, ब्रह्मर्षिगण, ब्रह्मा, विश्वेदेव तथा प्रजापति—इन छः देवताओंके निमित्त हवन करे। अन्तमें प्रायश्चित्त-होम करे ।।
अतः समापयेदग्निं शान्तिं कृत्वाथ पौष्टिकम् ।।
प्रणम्य चाग्निं सोमं च भस्म धृत्वा यथाविधि ।
नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरुणाय च ।
आदित्याय नमस्कृत्या ततः स्नायात् समाहितः ।।
फिर शान्ति और पौष्टिक कर्मका अनुष्ठान करके अग्निमें हवनका कार्य समाप्त कर दे। तत्पश्चात् अग्नि तथा सोमदेवताको प्रणाम करे और विधिपूर्वक शरीरमें भस्म लगाकर नदीके तटपर जा विशुद्धचित्त होकर सोम, वरुण तथा आदित्यको प्रणाम करके एकाग्र भावसे जलमें स्नान करे ।।
उत्तीर्योदकमाचम्य चासीनः पूर्वतोमुखः ।
प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रैरभिषेचनम् ।।
इसके बाद बाहर निकलकर आचमन करनेके पश्चात् पूर्वाभिमुख होकर बैठे और प्राणायाम करके कुशकी पवित्रीसे अपने शरीरका मार्जन करे ।।
आचान्तस्त्वभिवीक्षेत ऊर्ध्वबाहुर्दिवाकरम् ।
कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा कुर्याच्चैव प्रदक्षिणम् ।।
फिर आचमन करके दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यका दर्शन करे और हाथ जोड़कर खड़ा हो सूर्यकी प्रदक्षिणा करे ।।
नारायणं वा रुद्रं वा ब्रह्माणमथवापि वा ।
वारुणं मन्त्रसूक्तं वा प्राग्भोजनमथापि वा ।।
उसके बाद भोजनसे पूर्व ही नारायण, रुद्र, ब्रह्मा या वरुणसम्बन्धी सूक्तका पाठ करे ।।
वीरघ्नमृषथं वापि तथा चाप्यघमर्षणम् ।
गायत्रीं मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत् ततः ।
शतं वाष्टशतं वापि सहस्रमथवा परम् ।।
अथवा वीरघ्न, ऋषभ, अघमर्षण, गायत्री या मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले वैष्णव गायत्री-मन्त्रका जप करे। यह जप सौ बार या एक सौ आठ बार अथवा एक हजार बार करना चाहिये ।।
ततो मध्याह्नकाले वै पायसं यावकं हि वा ।

पाचयित्वा प्रयत्नेन प्रयतः सुसमाहितः ।।
तदनन्तर पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मध्याह्नकालमें यत्नपूर्वक खीर या जौकी लप्सी बनाकर तैयार करे ।।

पात्रं तु सुसमादाय सौवर्णं रजतं तु वा ।
ताम्रं वा मृन्मयं वापि औदुम्बरमथापि वा ।।
वृक्षाणां यज्ञियानां तु पर्णैरार्द्रैरकुत्सितैः ।
पुटकेन तु गुप्तेन चरेद् भैक्षं समाहितः ।।
अथवा सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलरकी लकड़ीका पात्र अथवा यज्ञके लिये उपयोगी वृक्षोंके हरे पत्तोंका दोना बनाकर हाथमें ले ले और उसको ऊपरसे ढक ले। फिर सावधानतापूर्वक भिक्षाके लिये जाय ।।

ब्राह्मणानां गृहाणां तु सप्तानां नापरं व्रजेत् ।
गोदोहमात्रं तिष्ठेत् तु वाग्यतः संयतेन्द्रियः ।।
सात ब्राह्मणोंके घरपर जाकर भिक्षा माँगे, सातसे अधिक घरोंपर न जाय। गौ दुहनेमें जितनी देर लगती है, उतने ही समयतक एक द्वारपर खड़ा होकर भिक्षाके लिये प्रतीक्षा करे, मौन रहे और इन्द्रियोंपर काबू रखे ।।

न हसेन्न च वीक्षेत नाभिभाषेत वा स्त्रियम् ।।
भिक्षा माँगनेवाला पुरुष न तो हँसे, न इधर-उधर दृष्टि डाले और न किसी स्त्रीसे बातचीत करे ।।

दृष्ट्वा मूत्रं पुरीषं वा चाण्डालं वा रजस्वलाम् ।
पतितं च तथा श्वानमादित्यमवलोकयेत् ।।
यदि मल, मूत्र, चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित मनुष्य तथा कुत्तेपर दृष्टि पड़ जाय तो सूर्यका दर्शन करे ।।

ततस्त्वावसथं प्राप्तो भिक्षां निक्षिप्य भूतले ।
प्रक्षाल्य पादावाजान्वोर्हस्तावाकूर्परं पुनः ।
आचम्य वारिणा तेन वह्निं विप्रांश्च पूजयेत् ।।
तदनन्तर अपने निवासस्थानपर आकर भिक्षापात्रको जमीनपर रख दे और पैरोंको घुटनोंतक तथा हाथोंको दोनों कोहनियोंतक धो डाले। इसके बाद जलसे आचमन करके अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करे ।।

पञ्च सप्ताथवा कुर्याद् भागान् भैक्ष्यस्य तस्य वै ।
तेषामन्यतमं पिण्डमादित्याय निवेदयेत् ।।
फिर उस भिक्षाके पाँच या सात भाग करके उतने ही ग्रास बना ले। उनमेंसे एक ग्रास सूर्यको निवेदन करे ।।

ब्रह्मणे चाग्नये चैव सोमाय वरुणाय च ।

विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो दद्यादन्नं यथाक्रमम् ॥
फिर क्रमशः ब्रह्मा, अग्नि, सोम, वरुण तथा विश्वेदेवोंको एक-एक ग्रास दे ॥
अवशिष्टमथैकं तु वक्त्रमात्रं प्रकल्पयेत् ।
अन्तमें जो एक ग्रास बच जाय, उसको ऐसा बना ले, जिससे वह सुगमतापूर्वक मुँहमें आ सके ॥
अङ्गुल्यग्रे स्थितं पिण्डं गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ।
अङ्गुलीभिस्त्रिभिः पिण्डं प्राश्नीयात् प्राङ्मुखः शुचिः ॥
फिर पवित्र भावसे पूर्वाभिमुख होकर उस ग्रासको दाहिने हाथकी अंगुलियोंके अग्रभागपर रखकर गायत्री-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे और तीन अंगुलियोंसे ही उसे मुँहमें डालकर खा जाय ॥
यथा च वर्धते सोमो ह्रसते च यथा पुनः ।
तथा पिण्डाश्च वर्धन्ते ह्रसन्ते च दिने दिने ॥
जैसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमें प्रतिदिन बढ़ता है और कृष्णपक्षमें प्रतिदिन घटता रहता है, उसी प्रकार ग्रासोंकी मात्रा भी शुक्लपक्षमें बढ़ती है और कृष्णपक्षमें घटती रहती है ॥*
त्रिकालं स्नानमस्योक्तं द्विकालमथवा सकृत् ।
ब्रह्मचारी सदा वापि न च वस्त्रं प्रपीडयेत् ॥
चान्द्रायण-व्रत करनेवालेके लिये प्रतिदिन तीन समय, दो समय अथवा एक समय भी स्नान करनेका विधान मिलता है। उसे सदा ब्रह्मचारी रहना चाहिये और तर्पणके पूर्व वस्त्र नहीं निचोड़ना चाहिये ॥
स्थाने न दिवसं तिष्ठेद् रात्रौ वीरासनं व्रजेत् ।
भवेत् स्थण्डिलशायी वाप्यथवा वृक्षमूलिकः ॥
दिनमें एक जगह खड़ा न रहे, रातको वीरासनसे बैठे अथवा वेदीपर या वृक्षकी जड़पर सो रहे ॥
वल्कलं यदि वा क्षौमं शाणं कार्पासिकं तथा ।
आच्छादनं भवेत् तस्य वस्त्रार्थं पाण्डुनन्दन ॥
पाण्डुनन्दन! उसे शरीर ढकनेके लिये वल्कल, रेशम, सन अथवा कपासका वस्त्र धारण करना चाहिये ॥
एवं चान्द्रायणे पूर्णे मासस्यान्ते प्रयत्नवान् ।
ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या दद्याच्चैव च दक्षिणाम् ॥
इस प्रकार एक महीने बाद चान्द्रायणव्रत पूर्ण होनेपर उद्योग करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे ॥
चान्द्रायणेन चीर्णेन यत् कृतं तेन दुष्कृतम् ।
तत् सर्वं तत्क्षणादेव भस्मीभवति काष्ठवत् ॥

चान्द्रायण-व्रतके आचरणसे मनुष्यके समस्त पाप सूखे काठकी भाँति तुरंत जलकर खाक हो जाते हैं ।।

ब्रह्महत्या च गोहत्या सुवर्णस्तेन्यमेव च ।
भ्रूणहत्या सुरापानं गुरोर्दारव्यतिक्रमः ॥
एवमन्यानि पापानि पातकीयानि यानि च ।
चान्द्रायणेन नश्यन्ति वायुना पांसवो यथा ॥
ब्रह्महत्या, गोहत्या, सुवर्णकी चोरी, भ्रूणहत्या, मदिरापान और गुरु-स्त्री-गमन तथा और भी जितने पाप या पातक हैं, वे चान्द्रायण-व्रतसे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे हवाके वेगसे धूल उड़ जाती है ।।

अनिर्देशाया गोः क्षीरमौष्ट्रमाविकमेव च ।
मृतसूतकयोश्चान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
जिस गौको ब्याये हुए दस दिन भी न हुए हों, उसका दूध तथा ऊँटनी एवं भेड़का दूध पी जानेपर और मरणाशौचका तथा जननाशौचका अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।।

उपपातकिंश्चान्नं पतितान्नं तथैव च ।
शूद्रस्योच्छेषणं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
उपपातकी तथा पतितका अन्न और शूद्रका जूठा अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

आकाशस्थं तु हस्तस्थमधःस्रस्तं तथैव च ।
परहस्तस्थितं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
आकाशमें लटकते हुए वृक्ष आदिके फलोंको, हाथपर रखे हुए, नीचे गिरे हुए तथा दूसरेके हाथपर पड़े हुए अन्नको खा लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करे ।।

अथाग्रे दिधिषोरन्नं दिधिषूपपतेस्तथा ।
परिवेत्तूस्तथा चान्नं परिवित्तान्नमेव च ॥
कुण्डान्नं गोलकान्नं च देवलान्नं तथैव च ।
तथा पुरोहितस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
बड़ी बहिनके अविवाहित रहते पहले विवाह कर लेनेवाली छोटी बहिनका तथा अपने भाईकी विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवालेका एवं बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाले छोटे भाईका और अविवाहित बड़े भाईका अन्न, कुण्डका, गोलकका और पुजारीका अन्न तथा पुरोहितका अन्न भोजन कर लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।।

सुरासवं विषं सर्पिर्लाक्षा लवणमेव च ।
तैलं चापि च विक्रीणन् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

मदिरा, आसव, विष, घी, लाख, नमक और तेलकी बिक्री करनेवाले ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रत करना आवश्यक है ।।
एकोद्दिष्टं तु यो भुङ्क्ते जनमध्यगतोऽपि यः ।
भिन्नभाण्डेषु यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
जो द्विज एकोद्दिष्ट श्राद्धका अन्न खाता है और अधिक मनुष्योंकी भीड़में भोजन करता है तथा फूटे बर्तनोंमें खाता है, उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।।
यो भुङ्क्तेऽनुपनीतेन यो भुङ्क्ते च स्त्रिया सह ।
कन्यया सह यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
जो उपनयन-संस्कारसे रहित बालक, कन्या और स्त्रीके साथ (एक पात्रमें) भोजन करता है, वह ब्राह्मण चान्द्रायण-व्रत करे ।।
उच्छिष्टं स्थापयेद् विप्रो यो मोहाद् भोजनान्तरे ।
दद्याद् वा यदि वा मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
जो मोहवश अपना जूठा दूसरेके भोजनमें मिला देता है अथवा मोहके कारण दूसरेको देता है, उस ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
तुम्बकोशातकं चैव पलाण्डुं गृञ्जनं तथा ।
छत्राकं लशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
यदि द्विज तुम्बा और जिसमें केश पड़ा हो, ऐसा अन्न तथा प्याज, गाजर, छत्राक (कुकुरमुत्ते) और लहसुनको खा ले तो उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।।
उदक्यया शुना वापि चाण्डालैर्वा द्विजोत्तमः ।
दृष्टमन्नं तु भुञ्जानो द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
यदि ब्राह्मण रजस्वला स्त्री, कुत्ते अथवा चाण्डालके द्वारा देखा हुआ अन्न खा ले तो उस ब्राह्मणको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
एतत् पुरा विशुद्धयर्थमृषिभिश्चरितं व्रतम् ।
पावनं सर्वभूतानां पुण्यं पाण्डव चोदितम् ।।
पाण्डुनन्दन! पूर्वकालमें ऋषियोंने आत्मशुद्धिके लिये इस व्रतका आचरण किया था, यह सब प्राणियोंको पवित्र करनेवाला और पुण्यरूप बताया गया है ।।
यथोक्तमेतद् यः कुर्याद् द्विजः पापप्रणाशनम् ।
स दिवं याति पूतात्मा निर्मलादित्यसंनिभः ।।
जो द्विज इस पूर्वोक्त पापनाशक व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पवित्रात्मा तथा निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी होकर स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

* अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको एक ग्रास और द्वितीयाको दो ग्रास भोजन करना चाहिये। इसी तरह पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास भोजन करके कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे चतुर्दशीतक प्रतिदिन एक-एक ग्रास कम करना चाहिये। अमावस्याको उपवास करनेपर इस व्रतकी समाप्ति होती है। यह एक प्रकारका चान्द्रायण है। स्मृतियोंमें इसके और भी अनेकों प्रकार उपलब्ध होते हैं।