सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2211, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2211

मदिरा, आसव, विष, घी, लाख, नमक और तेलकी बिक्री करनेवाले ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रत करना आवश्यक है ।।
एकोद्दिष्टं तु यो भुङ्क्ते जनमध्यगतोऽपि यः ।
भिन्नभाण्डेषु यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
जो द्विज एकोद्दिष्ट श्राद्धका अन्न खाता है और अधिक मनुष्योंकी भीड़में भोजन करता है तथा फूटे बर्तनोंमें खाता है, उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।।
यो भुङ्क्तेऽनुपनीतेन यो भुङ्क्ते च स्त्रिया सह ।
कन्यया सह यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
जो उपनयन-संस्कारसे रहित बालक, कन्या और स्त्रीके साथ (एक पात्रमें) भोजन करता है, वह ब्राह्मण चान्द्रायण-व्रत करे ।।
उच्छिष्टं स्थापयेद् विप्रो यो मोहाद् भोजनान्तरे ।
दद्याद् वा यदि वा मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
जो मोहवश अपना जूठा दूसरेके भोजनमें मिला देता है अथवा मोहके कारण दूसरेको देता है, उस ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
तुम्बकोशातकं चैव पलाण्डुं गृञ्जनं तथा ।
छत्राकं लशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
यदि द्विज तुम्बा और जिसमें केश पड़ा हो, ऐसा अन्न तथा प्याज, गाजर, छत्राक (कुकुरमुत्ते) और लहसुनको खा ले तो उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।।
उदक्यया शुना वापि चाण्डालैर्वा द्विजोत्तमः ।
दृष्टमन्नं तु भुञ्जानो द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
यदि ब्राह्मण रजस्वला स्त्री, कुत्ते अथवा चाण्डालके द्वारा देखा हुआ अन्न खा ले तो उस ब्राह्मणको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
एतत् पुरा विशुद्धयर्थमृषिभिश्चरितं व्रतम् ।
पावनं सर्वभूतानां पुण्यं पाण्डव चोदितम् ।।
पाण्डुनन्दन! पूर्वकालमें ऋषियोंने आत्मशुद्धिके लिये इस व्रतका आचरण किया था, यह सब प्राणियोंको पवित्र करनेवाला और पुण्यरूप बताया गया है ।।
यथोक्तमेतद् यः कुर्याद् द्विजः पापप्रणाशनम् ।
स दिवं याति पूतात्मा निर्मलादित्यसंनिभः ।।
जो द्विज इस पूर्वोक्त पापनाशक व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पवित्रात्मा तथा निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी होकर स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)