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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2208, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2208

पाचयित्वा प्रयत्नेन प्रयतः सुसमाहितः ।।
तदनन्तर पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मध्याह्नकालमें यत्नपूर्वक खीर या जौकी लप्सी बनाकर तैयार करे ।।

पात्रं तु सुसमादाय सौवर्णं रजतं तु वा ।
ताम्रं वा मृन्मयं वापि औदुम्बरमथापि वा ।।
वृक्षाणां यज्ञियानां तु पर्णैरार्द्रैरकुत्सितैः ।
पुटकेन तु गुप्तेन चरेद् भैक्षं समाहितः ।।
अथवा सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलरकी लकड़ीका पात्र अथवा यज्ञके लिये उपयोगी वृक्षोंके हरे पत्तोंका दोना बनाकर हाथमें ले ले और उसको ऊपरसे ढक ले। फिर सावधानतापूर्वक भिक्षाके लिये जाय ।।

ब्राह्मणानां गृहाणां तु सप्तानां नापरं व्रजेत् ।
गोदोहमात्रं तिष्ठेत् तु वाग्यतः संयतेन्द्रियः ।।
सात ब्राह्मणोंके घरपर जाकर भिक्षा माँगे, सातसे अधिक घरोंपर न जाय। गौ दुहनेमें जितनी देर लगती है, उतने ही समयतक एक द्वारपर खड़ा होकर भिक्षाके लिये प्रतीक्षा करे, मौन रहे और इन्द्रियोंपर काबू रखे ।।

न हसेन्न च वीक्षेत नाभिभाषेत वा स्त्रियम् ।।
भिक्षा माँगनेवाला पुरुष न तो हँसे, न इधर-उधर दृष्टि डाले और न किसी स्त्रीसे बातचीत करे ।।

दृष्ट्वा मूत्रं पुरीषं वा चाण्डालं वा रजस्वलाम् ।
पतितं च तथा श्वानमादित्यमवलोकयेत् ।।
यदि मल, मूत्र, चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित मनुष्य तथा कुत्तेपर दृष्टि पड़ जाय तो सूर्यका दर्शन करे ।।

ततस्त्वावसथं प्राप्तो भिक्षां निक्षिप्य भूतले ।
प्रक्षाल्य पादावाजान्वोर्हस्तावाकूर्परं पुनः ।
आचम्य वारिणा तेन वह्निं विप्रांश्च पूजयेत् ।।
तदनन्तर अपने निवासस्थानपर आकर भिक्षापात्रको जमीनपर रख दे और पैरोंको घुटनोंतक तथा हाथोंको दोनों कोहनियोंतक धो डाले। इसके बाद जलसे आचमन करके अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करे ।।

पञ्च सप्ताथवा कुर्याद् भागान् भैक्ष्यस्य तस्य वै ।
तेषामन्यतमं पिण्डमादित्याय निवेदयेत् ।।
फिर उस भिक्षाके पाँच या सात भाग करके उतने ही ग्रास बना ले। उनमेंसे एक ग्रास सूर्यको निवेदन करे ।।

ब्रह्मणे चाग्नये चैव सोमाय वरुणाय च ।