महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
[अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन]
[अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन]
युधिष्ठिर उवाच
कथं तद् ब्राह्मणैर्देव होतव्यं क्षत्रियैः कथम् ।
वैश्यैर्वा देवदेवेश कथं वा सुहुतं भवेत् ॥
युधिष्ठिरने पूछा— देवदेवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको किस प्रकार हवन करना चाहिये? और उनके द्वारा किस प्रकार किया हुआ हवन शुभ होता है? ॥
कत्यग्नयः किमात्मानः स्थानं किं कस्य वा विभो ।
कतरस्मिन् हुते स्थानं कं व्रजेदग्निहोत्रिकः ॥
विभो! अग्निके कितने भेद हैं? उनके पृथक्-पृथक् स्वरूप क्या हैं? किस अग्निका कहाँ स्थान है? अग्निहोत्री पुरुष किस अग्निमें हवन करके किस लोकको प्राप्त होता है? ॥
अग्निहोत्रनिमित्तं च किमुत्पन्नं पुरानघ ।
कथमेवाथ हूयन्ते प्रीयन्ते च सुराः कथम् ॥
निष्पाप! पूर्वकालमें अग्निहोत्र किसके निमित्तसे उत्पन्न हुआ था? देवताओंके लिये किस प्रकार हवन किया जाता है और कैसे उनकी तृप्ति होती है? ॥
विधिवन्मन्त्रवत् कृत्वा पूजितास्त्वग्नयः कथम् ।
कां गतिं वदतां श्रेष्ठ नयन्ति ह्यग्निहोत्रिणः ॥
प्रवक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! विधिके अनुसार मन्त्रोंसहित पूजा की जानेपर तीनों अग्नियाँ अग्निहोत्रीको किस प्रकार किस गतिको प्राप्त कराती हैं? ॥
दुर्हुताश्चापि भगवन्नविज्ञातास्त्रयोऽग्नयः ।
किमाहिताग्नेः कुर्वन्ति दुश्शीर्णा वापि केशव ॥
भगवन्! केशव! यदि तीनों अग्नियोंके स्वरूपको न जानकर उनमें अविधिपूर्वक हवन किया जाय अथवा उनकी उपासनामें त्रुटि रह जाय तो वे त्रिविध अग्नि अग्निहोत्रीका क्या अनिष्ट करते हैं? ॥
उत्सन्नाग्निस्तु पापात्मा कां योनिं देव गच्छति ।
एतत् सर्वं समासेन भक्त्या ह्युपगतस्य मे ।
वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ सर्वाधिक नमोऽस्तु ते ॥
देवेश्वर! जिसने अग्निका परित्याग कर दिया हो, वह पापात्मा किस योनिमें जन्म लेता है? ये सारी बातें संक्षेपमें मुझे सुनाइये; क्योंकि मैं भक्तिभावसे आपकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, सबसे महान् हैं; अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु राजन् महापुण्यमिदं धर्मामृतं परम् ।
यत् तु तारयते युक्तान् ब्राह्मणानग्निहोत्रिणः ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! इस महान् पुण्यदायक और परम धर्मरूपी अमृतका वर्णन सुनो। यह धर्मपरायण अग्निहोत्री ब्राह्मणोंको भवसागरसे पार कर देता है।।
ब्रह्मत्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते।
सृष्टोऽग्निर्मुखतः पूर्वं लोकानां हितकाम्यया।।
महातेजस्वी महाराज! मैंने सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्मस्वरूपसे सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की और लोगोंकी भलाईके लिये अपने मुखसे सर्वप्रथम अग्निको प्रकट किया।।
यस्मादग्रे स भूतानां सर्वेषां निर्मितो मया।
तस्मादग्नीत्यभिहितः पुराणज्ञैर्मनीषिभिः।।
इस प्रकार अग्नि-तत्त्व मेरे द्वारा सब भूतोंके पहले उत्पन्न किया गया है, इसलिये पुराणोंके ज्ञाता मनीषी विद्वान् उसे अग्नि कहते हैं।।
यस्मात् तु सर्वकृत्येषु पूर्वमस्मै प्रदीयते।
आहुतिर्दीप्यमानाय तस्मादग्नीति कथ्यते।।
समस्त कार्योंमें सबसे आगे प्रज्वलित आगमें ही आहुति दी जाती है, इसलिये यह अग्नि कहा जाता है।।
यस्माच्च तु नयत्यग्रां गतिं विप्रान् सुपूजितः।
तस्माच्च नयनाद् राजन् देवेष्वग्नीति कथ्यते।।
राजन्! यह भलीभाँति पूजित होनेपर ब्राह्मणोंको अग्र्यगति (परमपद)-की प्राप्ति कराता है, इसलिये भी देवताओंमें अग्निके नामसे विख्यात है।।
यस्माच्च दुर्हुतः सोऽयमलं भक्षयितुं क्षणात्।
यजमानं नरश्रेष्ठ क्रव्यादोऽग्निस्ततः स्मृतः।।
सर्वभूतात्मको राजन् देवानामेष वै मुखम्।
नरोत्तम! यदि इसमें विधिका उल्लङ्घन करके हवन किया जाय तो यह एक क्षणमें ही यजमानको खा जानेकी शक्ति रखता है, इसलिये अग्निको क्रव्याद कहा गया है। राजन्! यह अग्नि सम्पूर्ण भूतोंका स्वरूप और देवताओंका मुख है।।
तेन सप्तर्षयः सिद्धाः संयतेन्द्रियबुद्धयः।
गता ह्यमरसायुज्यं ते ह्यग्न्यर्चनतत्पराः।।
अतः इन्द्रियों और मन-बुद्धिपर संयम रखनेवाले सिद्ध सप्तर्षिगण अग्निकी आराधनामें तत्पर रहनेके कारण ही देवताओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं।।
अग्निहोत्रप्रकारं च शृणु राजन् समाहितः।
त्रयाणां गुणनामानि वह्नीनामुच्यते मया।।
राजन्! अब एकाग्रचित्त होकर अग्निहोत्रका प्रकार सुनो। अब मैं तीनों अग्नियोंके गुणके अनुसार नाम बता रहा हूँ।।
गृहाणां हि पतित्वं हि गृहपत्यमिति स्मृतम्।
गृहपत्यं तु यस्यासीत् तत् तस्माद् गार्हपत्यता ।।
गृहोंका आधिपत्य ही गृहपत्य माना गया है। यह गृहपत्य जिस अग्निमें प्रतिष्ठित है, वही 'गार्हपत्य अग्नि' के नामसे प्रसिद्ध है ।।
यजमानं तु यस्मात् तु दक्षिणां तु गतिं नयेत् ।
दक्षिणाग्निं तमाहुस्ते दक्षिणायतनं द्विजाः ।।
जो अग्नि यजमानको दक्षिण मार्गसे स्वर्गमें ले जाता है, उस दक्षिणमें रहनेवाले अग्निको ब्राह्मणलोग 'दक्षिणाग्नि' कहते हैं ।।
आहुतिः सर्वमाख्याति हव्यं वै वहनं स्मृतम् ।
सर्वहव्यवहो वह्निर्गतश्चाहवनीयताम् ।।
'आहुति' शब्द सर्वका वाचक है और हवन नाम ही है हव्यका। सब प्रकारके हव्यको स्वीकार करनेवाला वह्नि 'आहवनीय अग्नि' कहलाता है ।।
ब्रह्मा च गार्हपत्योऽग्निस्तस्मिन्नेव हि सोऽभवत् ।
दक्षिणाग्निस्त्वयं रुद्रः क्रोधात्मा चण्ड एव सः ।।
गार्हपत्य अग्नि ब्रह्माका स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्माजीसे ही उसका प्रादुर्भाव हुआ है और यह दक्षिणाग्नि रुद्रस्वरूप है, क्योंकि वह क्रोधरूप और प्रचण्ड है ।।
अहमाहवनीयोऽग्निराहोमाद् यस्य वै मुखे ।
होमके आरम्भसे लेकर अन्ततक जिसके मुखमें आहुति डाली जाती है, वह आहवनीय अग्नि स्वयं मैं हूँ ।।
पृथिवीमन्तरिक्षं च दिवमृषिगणैः सह ।
जयत्याहवनीयं यो जुहुयाद् भक्तिमान् नरः ।।
जो मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे प्रतिदिन आहवनीय अग्निमें हवन करता है, वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष और ऋषियों-सहित स्वर्गलोकपर भी अधिकार प्राप्त कर लेता है ।।
आभिमुख्येन होमस्तु यस्य यज्ञेषु वर्तते ।
तेनाप्याहवनीयत्वं गतो वह्निर्महाद्युतिः ।।
यज्ञोंमें सब ओरसे अग्निके मुखमें हवन किया जाता है, इसलिये वह अत्यन्त कान्तिमान् अग्नि 'आहवनीय' संज्ञाको प्राप्त होता है ।।
आहोमादग्निहोत्रेषु यज्ञैर्वा यत्र सर्वशः ।
यस्मात् तस्मात् प्रवर्तन्ते ततो ह्याहवनीयता ।।
अग्निहोत्र अथवा अन्यान्य यज्ञोंमें होमके आरम्भसे ही अग्निके भीतर सब प्रकारसे आहुति डाली जाती है, इसलिये भी उसे आहवनीय कहते हैं ।।
आध्यात्मिकं चाधिदैवमाधिभौतिकमेव च ।
एतत् तापत्रयं प्रोक्तमात्मवद्भिर्र्नराधिप ।।
नरेश्वर! आत्मवेत्ता विद्वानोंने आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—ये तीन प्रकारके दुःख बतलाये हैं ।।
यस्माद् वै त्रायते दुःखाद् यजमानं हुतोऽनलः ।
तस्मात् तु विधिवत् प्रोक्तमग्निहोत्रमिति श्रुतौ ।।
विधिवत् होम करनेपर अग्नि इन तीनों प्रकारके दुःखोंसे यजमानका त्राण करता है, इसलिये उस कर्मको वेदमें अग्निहोत्र नाम दिया गया है ।।
तदग्निहोत्रं सृष्टं वै ब्राह्मणा लोककर्तृणा ।
वेदाश्चाप्यग्निहोत्रं तु जज्ञिरे स्वयमेव तु ।।
विश्वविधाता ब्रह्माजीने ही सबसे पहले अग्निहोत्रको प्रकट किया। वेद और अग्निहोत्र स्वतः उत्पन्न हुए हैं ।।
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ।
रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ।।
वेदाध्ययनका फल अग्निहोत्र है (अर्थात् वेद पढ़कर जिसने अग्निहोत्र नहीं किया, उसका वह अध्ययन निष्फल है)। शास्त्रज्ञानका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्र है तथा धनकी सफलता दान और उपभोग करनेमें है ।।
त्रिवेदमन्त्रसंयोगादग्निहोत्रं प्रवर्तते ।
ऋग्यजुः सामभिः पुण्यैः स्थाप्यते सूत्रसंयुतैः ।।
तीनों वेदोंके मन्त्रोंके संयोगसे अग्निहोत्रकी प्रवृत्ति होती है। ऋक्, यजुः और सामवेदके पवित्र मन्त्रों तथा मीमांसासूत्रोंके द्वारा अग्निहोत्र-कर्मका प्रतिपादन किया जाता है ।।
वसन्ते ब्राह्मणस्य स्यादाधेयोऽग्निर्नराधिप ।
वसन्तो ब्राह्मणो ज्ञेयो वेदयोनिः स उच्यते ।।
नरेश्वर! वसन्त-ऋतुको ब्राह्मणका स्वरूप समझना चाहिये तथा वह वेदकी योनिरूप है, इसलिये ब्राह्मणको वसन्त-ऋतुमें अग्निकी स्थापना करनी चाहिये ।।
अग्न्याधेयं तु येनाथ वसन्ते क्रियतेऽनघ ।
तस्य श्रीर्ब्रह्मवृद्धिश्च ब्राह्मणस्य विवर्धते ।।
निष्पाप! जो वसन्त-ऋतुमें अग्न्याधान करता है, उस ब्राह्मणकी श्रीवृद्धि होती है तथा उसका वैदिक ज्ञान भी बढ़ता है ।।
क्षत्रियस्याग्निराधेयो ग्रीष्मे श्रेष्ठः स वै नृप ।
येनाधानं तु वै ग्रीष्मे क्रियते तस्य वर्धते ।
श्रीः प्रजाः पशवश्चैव वित्तं तेजो बलं यशः ।।
राजन्! क्षत्रियके लिये ग्रीष्म-ऋतुमें अग्न्याधान करना श्रेष्ठ माना गया है। जो क्षत्रिय ग्रीष्म-ऋतुमें अग्नि-स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, पशु, धन, तेज, बल और
यशकी अभिवृद्धि होती है ।।
शरदृतौ तु वैश्यस्य ह्याधानीयो हुताशनः ।
शरद्रात्रं स्वयं वैश्यो वैश्ययोनिः स उच्यते ।।
शरत्कालकी रात्रि साक्षात् वैश्यका स्वरूप है, इसलिये वैश्यको शरद्-ऋतुमें अग्निका आधान करना चाहिये; उस समयकी स्थापित की हुई अग्निको वैश्य योनि कहते हैं ।।
शरद्याधानमेवं वै क्रियते येन पाण्डव ।
तस्यापि श्रीः प्रजायुश्च पशवोऽर्थश्च वर्धते ।।
पाण्डुनन्दन! जो वैश्य शरद्-ऋतुमें अग्निकी स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, आयु, पशु और धनकी वृद्धि होती है ।।
रसाः स्नेहास्तथा गन्धा रत्नानि मणयस्तथा ।
काञ्चनानि च लौहानि ह्यग्निहोत्रकृतेऽभवन् ।।
सब प्रकारके रस, घी आदि स्निग्ध पदार्थ, सुगन्धित द्रव्य, रत्न, मणि, सुवर्ण और लोहा—इन सबकी उत्पत्ति अग्निहोत्रके लिये ही है ।।
आयुर्वेदो धनुर्वेदो मीमांसा न्यायविस्तरः ।
धर्मशास्त्रं च तत्सर्वमग्निहोत्रकृते कृतम् ।।
अग्निहोत्रको ही जाननेके लिये आयुर्वेद, धनुर्वेद, मीमांसा, विस्तृत न्याय-शास्त्र और धर्मशास्त्रका निर्माण किया गया है ।।
छन्दः शिक्षा च कल्पश्च तथा व्याकरणानि च ।
शास्त्रं ज्योतिर्निरुक्तं चाप्यग्निहोत्रकृते कृतम् ।।
छन्द, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्यौतिषशास्त्र और निरुक्त भी अग्निहोत्रके लिये ही रचे गये हैं ।।
इतिहासपुराणं च गाथाश्चोपनिषत् तथा ।
आथर्वणानि कर्माणि चाग्निहोत्रकृते कृतम् ।।
इतिहास, पुराण, गाथा, उपनिषद् और अथर्ववेदके कर्म भी अग्निहोत्रके लिये ही हैं ।।
तिथिनक्षत्रयोगानां मुहूर्तकरणात्मकम् ।
कालस्य वेदनार्थं तु ज्योतिर्ज्ञानं पुरानघ ।।
निष्पाप! तिथि, नक्षत्र, योग, मुहूर्त और करणरूप कालका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें ज्योतिष-शास्त्रका निर्माण हुआ है ।।
ऋग्यजुःसाममन्त्राणां श्लोकतत्त्वार्थचिन्तनात् ।
प्रत्यापत्तिविकल्पानां छन्दोज्ञानं प्रकल्पितम् ।।
ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंके छन्दका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तथा संशय और विकल्पके निराकरणपूर्वक उनका तात्त्विक अर्थ समझनेके लिये छन्दःशास्त्रकी रचना की गयी है ।।
वर्णाक्षरपदार्थानां संधिलिङ्गं प्रकीर्तितम् ।
नामधातुविवेकर्थ पुरा व्याकरणं स्मृतम् ॥
वर्ण, अक्षर और पदोंके अर्थका, संधि और लिङ्गका तथा नाम और धातुका विवेक होनेके लिये पूर्वकालमें व्याकरणशास्त्रकी रचना हुई है ।।
यूपवेद्यध्वरार्थं तु प्रोक्षणश्रपणाय तु ।
यज्ञदैवतयोगर्थं शिक्षाज्ञानं प्रकल्पितम् ॥
यूप, वेदी और यज्ञका स्वरूप जाननेके लिये, प्रोक्षण और श्रपण (चरु पकाना) आदिकी इतिकर्तव्यताको समझनेके लिये तथा यज्ञ और देवताके सम्बन्धका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शिक्षा नामक वेदांगकी रचना हुई है ।।
यज्ञपात्रपवित्रार्थं द्रव्यसम्भारणाय च ।
सर्वयज्ञविकल्पाय पुरा कल्पं प्रकीर्तितम् ॥
यज्ञके पात्रोंकी शुद्धि, यज्ञसम्बन्धी सामग्रियोंके संग्रह तथा समस्त यज्ञोंके वैकल्पिक विधानोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें कल्पशास्त्रका निर्माण किया गया है ।।
नामधातुविकल्पानां तत्त्वार्थनियमाय च ।
सर्ववेदनिरुक्तानां निरुक्तमृषिभिः कृतम् ॥
सम्पूर्ण वेदोंमें प्रयुक्त नाम, धातु और विकल्पोंके तात्त्विक अर्थका निश्चय करनेके लिये ऋषियोंने निरुक्तकी रचना की है ।।
वेद्यर्थं पृथिवी सृष्टा सम्भारार्थं तथैव च ।
इध्मार्थमथ यूपार्थं ब्रह्मा चक्रे वनस्पतिम् ॥
यज्ञकी वेदी बनाने तथा अन्य सामग्रियोंको धारण करनेके लिये ब्रह्माजीने पृथ्वीकी सृष्टि की है। समिधा और यूप बनानेके लिये वनस्पतियोंकी रचना की है ।।
गावो यज्ञार्थमुत्पन्ना दक्षिणार्थं तथैव च ।
सुवर्णं रजतं चैव पात्रकुम्भार्थमेव च ॥
गौएँ यज्ञ और दक्षिणाके लिये उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि गोघृत और गोदक्षिणाके बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं होता। सुवर्ण और चाँदी—ये यज्ञके पात्र और कलश बनानेका काम लेनेके लिये पैदा हुए हैं ।।
दर्भाः संस्तरणार्थं तु रक्षसां रक्षणाय च ।
पूजनार्थं द्विजाः सृष्टास्तारका दिवि देवताः ॥
कुशोंकी उत्पत्ति हवनकुण्डके चारों ओर फैलाने और राक्षसोंसे यज्ञकी रक्षा करनेके लिये हुई है। पूजन करनेके लिये ब्राह्मणोंको, नक्षत्रोंको और स्वर्गके देवताओंको उत्पन्न किया गया है ।।
क्षत्रियाः रक्षणार्थं तु वैश्या वार्त्तानिमित्ततः ।
शुश्रूषार्थं त्रयाणां वै शूद्राः सृष्टाः स्वयम्भुवा ॥
सबकी रक्षाके लिये क्षत्रिय-जातिकी सृष्टि की गयी है। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य आदि जीविकाका साधन जुटानेके लिये वैश्योंकी उत्पत्ति हुई है और तीनों वर्णोंकी सेवाके लिये ब्रह्माजीने शूद्रोंको उत्पन्न किया है॥
यथोक्तमग्निहोत्राणां शुश्रूषन्ति च ये द्विजाः।
तैर्दत्तं सहुतं चेष्टं दत्तमध्यापितं भवेत्॥
जो द्विज विधिपूर्वक अग्निहोत्रका सेवन करते हैं, उनके द्वारा दान, होम, यज्ञ और अध्यापन—ये समस्त कर्म पूर्ण हो जाते हैं॥
एवमिष्टं च पूर्तं च यद् विप्रैः क्रियते नृप।
तत् सर्वं सम्यगाहृत्य चादित्ये स्थापयाम्यहम्॥
राजन्! इसी प्रकार ब्राह्मणोंके द्वारा जो यज्ञ करने, बगीचे लगाने और कुएँ खुदवाने आदिके कार्य होते हैं, उन सबके पुण्यको लेकर मैं सूर्यमण्डलमें स्थापित कर देता हूँ॥
मया स्थापितमादित्ये लोकस्य सुकृतं हि तत्।
धारयेद् यत् सहस्रांशुः सुकृतं ह्यग्निहोत्रिणाम्॥
मेरे द्वारा आदित्यमें स्थापित किये हुए संसारके पुण्य और अग्निहोत्रियोंके सुकृतको सहस्रों किरणोंवाले सूर्यदेव धारण किये रहते हैं॥
तस्मादप्रोषितैर्नित्यमग्निहोत्रं द्विजातिभिः।
होतव्यं विधिवद् राजन्नूर्ध्वमिच्छन्ति ये गतिम्॥
इसलिये राजन्! जो द्विज परदेशमें न रहते हों और ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन विधिपूर्वक अग्निहोत्र करना चाहिये॥
आत्मवन्नावमन्तव्यमग्निहोत्रं युधिष्ठिर।
न त्याज्यं क्षणमप्येतदग्निहोत्रं युधिष्ठिर॥
महाराज युधिष्ठिर! अग्निहोत्रको अपने आत्माके समान समझकर कभी भी उसका अपमान या एक क्षणके लिये भी त्याग नहीं करना चाहिये॥
बालाहिताग्नयो ये च शूद्रान्नाद् विरताः सदा।
क्रोधलोभविनिर्मुक्ताः प्रातःस्नानपरायणाः।
यथोक्तमग्निहोत्रं वै जुह्वते विजितेन्द्रियाः॥
आतिथेयाः सदा सौम्या द्विकालं मत्परायणाः।
ते यान्त्यपुनरावृत्तिं भित्त्वा चादित्यमण्डलम्॥
जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्रका सेवन करते और शूद्रके अन्नसे सदा दूर रहते हैं, जो क्रोध और लोभसे रहित हैं, जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके जितेन्द्रियभावसे विधिवत् अग्निहोत्रका अनुष्ठान करते हैं, सदा अतिथिकी सेवामें लगे रहते हैं तथा शान्तभावसे रहकर दोनों समय मेरे परायण होकर मेरा ध्यान करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर मेरे परम धामको प्राप्त होते हैं, जहाँसे पुनः इस संसारमें नहीं लौटना पड़ता॥
श्रुतिं केचिन्निन्दमानाः श्रुतिं दूष्यन्त्यबुद्धयः ।
प्रमाणं न च कुर्वन्ति ये यान्तीहापि दुर्गतिम् ।।
इस संसारमें कुछ मूर्ख मनुष्य श्रुतिपर दोषारोपण करते हुए उसकी निन्दा करते हैं तथा उसे प्रमाणभूत नहीं मानते, ऐसे लोगोंकी बड़ी दुर्गति होती है ।।
प्रमाणमितिहासं च वेदान् कुर्वन्ति ये द्विजाः ।
ते यान्त्यमरसायुज्यं नित्यमास्तिक्यबुद्धयः ।।
परंतु जो द्विज नित्य आस्तिक्यबुद्धिसे युक्त होकर वेदों और इतिहासोंको प्रामाणिक मानते हैं, वे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)